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- Lord Krishna And The Conch Shell Worship In The Month Of Margashirsha, Significance Of Agahan Month In Hindi, Marshirsh Month Puja Vidhi
9 घंटे पहले
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आज (7 नवंबर) मार्गशीर्ष मास का दूसरा दिन है। ये महीना 4 दिसंबर तक रहेगा। मार्गशीर्ष को अगहन मास भी कहते हैं। अगहन मास धर्म-कर्म के साथ ही सेहत के नजरिए से भी बहुत खास है। इन दिनों में रोज सुबह जल्दी उठना चाहिए, ध्यान और योग-प्राणायाम करना चाहिए। स्नान के बाद सूर्य को जल चढ़ाएं, श्रीकृष्ण के मंत्र कृं कृष्णाय नम: का जप करते हुए पूजा-पाठ करें।
उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के मुताबिक, मार्गशीर्ष मास श्रीकृष्ण का ही स्वरूप है। श्रीमद् भागवत गीता में श्रीकृष्ण ने स्वयं मार्गशीर्ष को अपना स्वरूप बताया है। इस महीने में किए गए पूजा-पाठ, योग-प्राणायाम से धर्म लाभ के साथ ही सकारात्मकता और शांति मिलती है।
अगहन (मार्गशीर्ष) मास की खास बातें
- इस महीने से शीत ऋतु का असर बढ़ने लगता है। ठंडी हवाएं चलती हैं और आसमान साफ रहता है।
- सुबह की सूर्य किरणें अच्छी लगने लगती हैं। वर्षा के बाद वातावरण में जो नमी रहती है, वह समाप्त हो जाती है।
- अगहन मास में सुबह जल्दी उठकर सैर करना स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभदायक होता है। इसलिए इस समय अधिकतर लोग प्रातः भ्रमण की आदत अपनाते हैं।
- इस महीने सुबह की धूप में बैठने से शरीर को विटामिन D प्राप्त होता है, जिससे रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और मौसमी बीमारियों से सुरक्षा मिलती है।
- इस महीने तेल मालिश की भी परंपरा है। सर्दी के मौसम में नियमित तेल मालिश करने से त्वचा का रूखापन दूर होता है और शरीर में नमी संतुलित बनी रहती है।
अगहन महीने में शंख पूजा करने की परंपरा
- इस महीने में श्रीकृष्ण और उनके शंख की पूजा खासतौर पर करनी चाहिए। साधारण शंख को श्रीकृष्ण के पांचजन्य शंख का स्वरूप मानकर उसकी पूजा करनी चाहिए। जानिए शंख पूजा की विधि और मंत्र..
- घर के मंदिर में बाल गोपाल के साथ गौमाता की प्रतिमा और शंख रखें। साधारण शंख को श्रीकृष्ण के पांचजन्य शंख का स्वरूप मानें।
- इन तीनों का जल और पंचामृत से अभिषेक करें। पंचामृत दूध, दही, घी, मिश्री और शहद मिलाकर बनाया जाता है।
- भगवान को वस्त्र अर्पित करें। कुमकुम, चंदन से तिलक करें। हार-फूल चढ़ाएं। भोग लगाएं। धूप-दीप जलाकर आरती करें।
- पूजा में कृष्ण मंत्र कृं कृष्णाय नम: का जप करें। इसके बाद शंख के मंत्र का भी जप करें।
शंख पूजा मंत्र – त्वं पुरा सागरोत्पन्न विष्णुना विधृत: करे।
निर्मित: सर्वदेवैश्च पाञ्चजन्य नमोऽस्तुते।।
तव नादेन जीमूता वित्रसन्ति सुरासुरा:।
शशांकायुतदीप्ताभ पाञ्चजन्य नमोऽस्तुते।।

पांचजन्य शंख से जुड़ी मान्यताएं
श्रीकृष्ण के पास एक दिव्य शंख था, जिसका नाम पांचजन्य है। मान्यता है कि पांचजन्य शंख की उत्पत्ति समुद्र मंथन से हुई थी। ये 14 रत्नों में से छठा रत्न है, जिसे भगवान विष्णु ने धारण किया था।
एक अन्य कथा है कि भगवान श्रीकृष्ण को ये शंख उस समय मिला था, जब वे अपने गुरु सांदीपनि के पुत्र को वापस लेने समुद्र में गए थे। सांदीपनि के पुत्र को शंखासुर नाम के असुर ने समुद्र में कैद कर रखा था। श्रीकृष्ण ने उस दैत्य का वध किया और उसके खोल (जो एक शंख था) को प्राप्त किया, जिसका नाम बाद में पांचजन्य रखा गया। श्रीकृष्ण ने गुरु के पुत्र को यमलोक से वापस लाए थे।
पांचजन्य को विजय और यश का प्रतीक माना जाता है। माना जाता है कि महाभारत युद्ध में श्रीकृष्ण ने कई बार इस शंख को बजाया था। पांचजन्य भगवान विष्णु की चार प्रमुख चीजों शंख, चक्र, गदा और पद्म में से एक है।