जल, फूल, पत्ती, दूध और अन्य सामग्री के अर्पण के चलते मूर्ति के चेहरों से केमिकल हटना शुरू हो गया।
आंखों में स्क्रैच, नाक उखड़ी, चेहरे के एक हिस्से में लंबी लकीर…यह सबकुछ आपको पशुपतिनाथ की करीब 1200 साल पुरानी प्रतिमा में दिख जाएगा। प्रतिमा में जहां भी वज्र लेपन और केमिकल लगाया गया था, समय के साथ उसमें गैप आने लगा है।
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लेप के निकलने से मंदसौर के मंदिर में स्थापित अष्टमुखी भगवान पशुपतिनाथ की मूर्ति के चेहरों की खूबसूरती बिगड़ रही है। प्रशासन अब इसे फिर से संवारने की तैयारी में है, इसके लिए सर्वे भी हुआ है।
पशुपतिनाथ महादेव का यह अष्टमुखी स्वरूप दुनिया में अपनी तरह का इकलौता है। नेपाल के काठमांडू का पशुपतिनाथ मंदिर अलग परंपरा और शैली से जुड़ा है, लेकिन मंदसौर का पशुपतिनाथ शिव का आठ मुख वाला स्वरूप इतिहास, रिसर्च और स्थानीय मान्यता के आधार पर एक अद्वितीय धर्मस्थल माना जाता है।
मंदिर के पुजारी के मुताबिक, 19 जून 1940 को शिवना नदी के गर्भ से एक शिलाखंड मिला। इस पर उभरी आकृतियों में भगवान शिव का रूप नजर आया। यह देखकर ग्रामीणों ने पूजा शुरू कर दी। बाद में जब इसे शिल्पियों ने परखा, तो पता चला कि यह किसी प्राचीन काल की अधूरी परंतु अत्यंत दुर्लभ प्रतिमा है। मान्यता है कि यह शिलाखंड दुनिया की एकमात्र अष्टमुखी पशुपतिनाथ प्रतिमा है।
दैनिक भास्कर की टीम ने मंदिर पहुंचकर प्रतिमा से केमिकल निकलने की पड़ताल की। पढ़िए, रिपोर्ट…

1940 में शिवना नदी से ये शिलाखंड मिला था, जिस पर भगवान पशुपतिनाथ की प्रतिमा उभरी थी।
दो दशक तक चली स्वरूप देने की प्रक्रिया मंदिर के पुजारी ने बताया कि शिवलिंग के अंतिम रूप, मंदिर की संरचना और पूजा-पद्धति को स्वरूप देने की प्रक्रिया करीब दो दशक तक चलती रही। 27 नवंबर 1961 को स्वामी प्रत्यक्षानंद जी ने इसकी वैदिक प्राण प्रतिष्ठा की।
फिर साल 2005 में प्रतिमा के एक मुख को दुरुस्त करना पड़ा था। 2008 में पत्थरों पर केमिकल लगाना पड़ा। वहीं, 2009-10 में मूर्ति के कई हिस्सों में वज्रलेप हुआ। अब 16 साल बाद फिर से वही हालात बने हैं।
दरअसल, अष्टमुखी शिवलिंग जब शिवना नदी में मिला था, तब चार चेहरे हूबहू अपने रूप में थे लेकिन अन्य चेहरे पानी में लंबे समय तक रहने के कारण धुंधले पड़ गए थे। तब 25 करोड़ की लागत से तैयार हो रहे पशुपतिनाथ लोक और मूर्ति की मंदिर में स्थापना के पहले इन चेहरों को केमिकल और वज्र लेप लगाकर संवारा गया था।
लेकिन, साल दर साल मूर्ति पर जल, फूल, पत्ती, दूध और अन्य सामग्री के अर्पण के चलते चेहरों से केमिकल हटना शुरू हो गया।
अष्टमुखी होने का धार्मिक और शिल्पगत महत्व पुरातत्व विभाग के मुताबिक जहां सामान्य शिवलिंग निराकार या लिंगाकार होते हैं, मंदसौर का शिवलिंग 8 मुखों वाला है। इस स्वरूप को भारतीय शिल्प शास्त्र में अष्टमुखी महेश्वर कहा जाता है। इसका प्रत्येक मुख एक भाव का प्रतीक है-
- सृजन (उत्सर्जन भाव)
- संरक्षण (धैर्य भाव)
- संहार (उग्र भाव)
- तांडव (वीर्य भाव)
- योगी भाव
- ध्यानस्थ शिव
- अघोर मुख
- सौम्य और करुणामय शिव
देश में और कहीं नहीं ऐसी मूर्ति इतिहासकार बताते हैं कि मूर्ति का शिल्प गुप्तकालीन शैली से प्रेरित है, जिसमें बहुमुखी शिव की परंपरा मिलती है। लेकिन इतने बड़े आकार, एक ही पत्थर में उकेरे गए और नदी से प्राप्त हुए अष्टमुखी स्वरूप का उदाहरण भारत में कहीं और नहीं है।

मंदिर परिसर का विकास तीन चरणों में हुआ शोधकर्ताओं के अनुसार, यह मूर्ति अधूरी अवस्था में किसी प्राचीन स्थल से शिवना नदी में पहुंची होगी। संभवतः बाढ़ या भू-स्खलन की वजह से ऐसा हुआ होगा। यह सिद्धांत उसके शिल्प और समय-रेखा के अध्ययन पर आधारित है।
1940 से 60 के दौरान मंदिर का निर्माण शुरू हुआ। इसके बाद 1980 से 90 के दशक में घाट, सीढ़ियां, मंडप और प्रवेश मार्ग विकसित हुए। 2010 के बाद से मंदिर का नवीनीकरण, रोशनी और सुरक्षा व्यवस्था विकसित की गई।

बंगाल से आकर जांच कर चुकी टीम इंदौर के पुरातत्ववेत्ता प्रवीण श्रीवास्तव ने कहा- किसी भी चीज का क्षरण होना एक प्राकृतिक व स्वाभाविक प्रक्रिया है। पत्थर पुराना है। पहले भी इस शिवलिंग पर काम हो चुका है, जो केमिकल लगाए थे, उसकी कैपेसिटी खत्म हो गई है। अब दोबारा मजबूती देने के लिए वज्र लेप करने की रूप रेखा तैयार हुई है। रिपोर्ट बनाकर सबमिट की है। बंगाल से आए पुरातत्व विभाग के अधिकारी सैंपल लेकर गए हैं।
कलेक्टर अदिति गर्ग का कहना है कि प्रतिमा में वज्र लेप की व्यवस्था की जा रही है। आर्कियोलोजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की टीम ने यहां आकर सर्वेक्षण किया है। मूर्ति का मूल स्वरूप बना रहे, इसके लिए उन्होंने कुछ सुझाव दिए हैं।
कलेक्टर गर्ग ने कहा कि मूर्ति पर वज्र लेप का काम शुरू होने वाला है। पशुपतिनाथ लोक परिसर का काम भी पूरा होने को है।
