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नागौर शहर में सरकारी और प्रतिबंधित भूमि पर नियम विरुद्ध तरीके से पट्टे जारी करने के बहुचर्चित मामले में जांच प्रक्रिया अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। जिला कलेक्टर अरुण कुमार पुरोहित के निर्देश पर गठित तीन सदस्यीय उच्च स्तरीय जांच समिति ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट कोतवाली पुलिस को सुपुर्द कर दी है। इस जांच रिपोर्ट के सामने आने के बाद नगर परिषद के संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों में हड़कंप मच गया है। मामले की गंभीरता को देखते हुए एसपी मृदुल कच्छावा ने पूर्व में ही कलेक्टर को पत्र लिखकर प्रशासन से जांच में पूर्ण सहयोग की अपेक्षा की थी, जिसके बाद उपखण्ड अधिकारी गोविन्द सिंह भींचर की अध्यक्षता में आयुक्त नगर परिषद और तहसीलदार की समिति ने रिकॉर्ड खंगालकर यह रिपोर्ट तैयार की है।
राजकीय भूमि पर अवैध कब्जे का खेल पूरे मामले की जड़ें साल 2023 से जुड़ी हैं जब तत्कालीन नायब तहसीलदार परसाराम ने कोतवाली थाने में नगर परिषद के कार्मिकों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई थी। रिपोर्ट के अनुसार, जांच में सामने आया है कि जिन 16 पट्टों को लेकर विवाद है, वे भूमि नगर परिषद के अधिकार क्षेत्र में न होकर शुद्ध रूप से राजस्थान सरकार के खाते में दर्ज थी। आरोप है कि परिषद के पास स्वयं के नक्शे, सीमांकन और रेवेन्यू स्टाफ उपलब्ध होने के बावजूद जानबूझकर राजकीय संपत्ति को नुकसान पहुँचाने के उद्देश्य से ये अनाधिकृत पट्टे जारी किए गए। स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि सरकारी भूमियों और प्रतिबंधित क्षेत्रों को निजी लाभ के लिए खुर्द-बुर्द करने का यह एक बड़ा प्रशासनिक घालमेल है।
27 पट्टों की सूची और 16 का रहस्य इस प्रकरण में पट्टों की संख्या को लेकर शुरू से ही ऊहापोह की स्थिति बनी रही। तहसीलदार की ओर से पूर्व में 8 मार्च को जिला कलेक्टर को 27 पट्टों की एक सूची सौंपी गई थी, लेकिन दर्ज हुई एफआईआर में केवल 16 पट्टों का ही उल्लेख किया गया। शेष 11 पट्टों के संबंध में राजस्व विभाग का कहना है कि वे वर्तमान में विचाराधीन हैं और उन पर भी जांच की प्रक्रिया सतत जारी है। विभाग ने स्पष्ट किया है कि डोर-टू-डोर सर्वे और रिकॉर्ड के भौतिक सत्यापन के बाद ही फर्जीवाड़े की पूरी परतें खुल सकीं। राजस्थान नगरपालिका अधिनियम 2009 की धारा 69(क) के तहत जारी किए गए इन पट्टों की अब बारीकी से पुलिस जांच की जा रही है।
निरस्त होंगे पट्टे और नहीं मिलेगा अपील का मौका प्रशासनिक अधिकारियों ने संकेत दिए हैं कि यदि जांच में पट्टे पूरी तरह अवैध पाए जाते हैं, तो राजस्थान नगरपालिका अधिनियम-2009 की धारा 73(ख) के प्रावधानों के तहत इनका रिव्यू किया जाएगा। इस विशेष कानूनी प्रावधान के तहत दोषी पाए जाने पर पट्टों को तत्काल प्रभाव से निरस्त करने का अधिकार है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस धारा के अंतर्गत की गई निरस्तीकरण की कार्रवाई के खिलाफ पट्टा धारक किसी भी न्यायालय में अपील नहीं कर सकेंगे। वर्तमान में कोतवाली पुलिस पत्रावलियों का अध्ययन कर रही है और जल्द ही इस मामले में संलिप्त दोषियों की धरपकड़ शुरू हो सकती है।