शिव मंदिर, जिसका रास्ता गूगल भी भटक जाता है:महाराणा प्रताप ने बनवाया था, फिसलन भरी पगडंडी, 50 घंटे पैदल चली भास्कर टीम, लेपर्ड-भालू का डर

Actionpunjab
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जमीन से 5300-5400 फीट ऊंचाई पर स्थित माउंट आबू का जबकेश्वर महादेव मंदिर। बिना जलाभिषेक किए अन्न-जल ग्रहण न करने वाले महाराणा प्रताप ने 450 साल पहले इस मंदिर के शिवलिंग की स्थापना की थी। इस मंदिर तक पहुंचना भी कड़ी तपस्या है। क्योंकि यहां पहुंचते-पहुंचते गूगल भी रास्ता भटक जाता है। गुरुशिखर से 25 किलोमीटर का दुर्गम सफर, जहां न कार जा सकती है न बाइक। फिसलन भरी चट्‌टानी पगडंडी, जहां पैदल चलना भी जोखिम भरा है। अंधेरी गुफाएं। हर पल लेपर्ड और भालू का खतरा। भास्कर रिपोर्टर मनीष व्यास और कैमरामैन मुकेश कुमावत ने महाशिवरात्रि पर आपको इस मंदिर के दर्शन कराने के लिए 25 किमी की पैदल यात्रा की। सफर आसान नहीं था। रास्ता भटके। पानी खत्म हो गया। कदम-कदम पर सन्नाटे को चीरती जंगली जानवरों की आवाज ने डराया। 50 किलोमीटर (गुरुशिखर से जबकेश्वर महादेव और वापस गुरुशिखर तक का रास्ता) का ये जोखिम भरा सफर करने में 50 घंटे लग गए। आप भी इस सफर के साथ कीजिए जबकेश्वर महादेव के दर्शन… भास्कर टीम ट्रेन से रात 2 बजे आबू रोड रेलवे स्टेशन पहुंची। 4 घंटे इंतजार के बाद सुबह 6 बजे माउंट आबू के लिए टैक्सी मिली। वहां से स्कूटी किराए पर लेकर गुरुशिखर पहुंचे। आगे का रास्ता पैदल तय करना था ऐसे में स्कूटी पार्किंग में लगाई और जबकेश्वर मंदिर के लिए रवाना हो गए। कठिन रास्ता था ऐसे में हमने गुरुशिखर से ही खाने का सामान और पानी की दो बोतल ले ली। अब तक सुबह के 9 बज गए थे। जबकेश्वर महादेव मंदिर जाने के लिए पहले पहाड़ी पर बसे उतरज और फिर शेरगांव पहुंचना था। हमने उतरज गांव जाने वाली पथरीली पगडंडी पर चलना शुरू किया। रास्ता ढलान और फिसलन भरा था। जंगली जानवरों का खतरा भी था। रास्ते में 4-5 अंधेरी गुफाओं से होकर गुजरना पड़ा। डेढ़ घंटे में हम 3 किमी का सफर तय कर पाए। एक गुफा में ऊपर-नीचे बनी 2 कुटिया दिखी। पास में ही केदारनाथ मंदिर था। यहां थोड़ी देर रुके। आधा घंटा और चलने के बाद उतरज गांव पहुंचे। अब तक सुबह के 11.30 बज गए थे। गलत पगडंडी चुनी और भटक गए रास्ता गांव में थोड़ी देर एक चट्टान पर बैठकर रेस्ट किया। गांव की एक महिला से जबकेश्वर का रास्ता पूछा। उन्होंने बताया जबकेश्वर जाने के लिए आपको यहां से या शेरगांव से कोई लोकल गाइड ले जाना पड़ेगा। थोड़ा आगे चले तो बद्रीनाथ मंदिर दिखाई दिया। वहां बाहर 2 बुजुर्ग एक मैदान में मवेशी चरा रहे थे। रास्ता पूछने पर बोले-सामने दिख रही नदी पार करते ही खजूर के पेड़ हैं। वही पगडंडी है, जो शेरगांव तक जाती है। हमने नदी पार की। खजूर के पेड़ के आगे पहुंचे तो वहां 1 नहीं 2 पगडंडियां थी। एक पगडंडी ज्यादा साफ थी। हम उधर ही बढ़ चले। 2-3 किमी चलते रहे। आगे घना जंगल आ गया। एक किमी और चले तो रास्ता बंद हो गया। चारों और गुफाएं और कंटीली झाड़ियां ही झाड़ियां थी। काफी प्रयास के बाद भी रास्ता नहीं मिला। दोपहर के ढाई बज गए थे। दोनों बोतलों का पानी भी खत्म हो गया था। एहसास हो गया था कि रास्ता भटक गए हैं। लौटने का फैसला किया, लेकिन पीछे मुड़े तो समझ नहीं आ रहा था कि किधर जाएं। हर दिशा में एक जैसी झाड़ियां, पत्थर और गुफाएं थीं। दो तीन बार प्रयास किया, लेकिन घूम-फिरकर हम एक ही जगह पहुंच रहे थे। इसी बीच जंगली जानवरों की आवाजें डरा रही थीं। शाम ढलने से पहले वहां से निकलना था। क्योंकि अंधेरे जंगल में रहना खतरनाक साबित हो सकता था। पुजारी ने मदद के लिए अपने साढू को भेजा मोबाइल में नेटवर्क भी नहीं था। ऐसे में पास की एक चट्‌टान पर चढ़कर कोशिश की। वहां नेटवर्क मिला तो बद्रीनाथ मंदिर के पुजारी शैतान सिंह को कॉल किया। शैतान सिंह को आपबीती बताई तो उन्होंने बताया कि आपने गलत पगडंडी ले ली। हमने रिक्वेस्ट की तो उन्होंने अपने हमनाम साढू शैतान सिंह को वहां भेजने की बात की। हम मान गए। करीब एक घंटे बाद शैतान सिंह वहां पहुंचे। उन्होंने हमें पानी पिलाया और कहा- जल्दी वापस चलना होगा। हम बुरी तरह से थके हुए थे, पर धीरे-धीरे उसके पीछे-पीछे चल पड़े। एक घंटे बाद बद्रीनाथ मंदिर पहुंचे। वहां थोड़ा रेस्ट करने के बाद उतरज गांव में शैतान सिंह के घर पर पहुंच गए। खाना खाकर वहीं सो गए। सुबह 8 बजे जागे। शैतानसिंह की पत्नी ने चाय दी। चाय पीकर शैतानसिंह को गाइड के तौर पर अपने साथ लेकर शेरगांव और वहां से जबकेश्वर महादेव के लिए रवाना हो गए। इस बार हम सही पगडंडी पर थे, लेकिन रास्ता अब भी चुनौतियों से भरा था। हमारे सामने एक खतरनाक पहाड़ी नाला और डरावनी गुफाएं थी। यहां पहुंचकर याद आया कि हम पानी की बोतल लाना भूल गए हैं। शैतान सिंह ने बताया- चिंता की बात नहीं है। आगे कुएं और नदी आएंगे, वहां पानी मिल जाएगा। भैरव गुफा : जहां महाराणा प्रताप रहे थे करीब 5 किलोमीटर चलने के आगे का रास्ता खड़ी चढ़ाई का था। सांसें फूल रही थी। ऐसे में बार-बार रेस्ट कर रहे थे। घने जंगल के बीच में जंगली मुर्गे झाड़ियों में इधर से उधर भाग रहे थे। शैतान सिंह ने बताया इस इलाके में कई बार भालू और लेपर्ड भी आ जाते हैं। यहां से काफी देर ऊपर ही ऊपर पहाड़ पर चलने के बाद हमारे सामने एक बड़ी सी गुफा थी। गुफा को पत्थरों से बंद किया गया था। हालांकि कुछ जगहों से पत्थर गिर गए थे। शैतान सिंह ने बताया ये गुफा एक समय मेवाड़ के महाराणा प्रताप का आश्रय स्थल रही थी। आपातकाल में इसी गुफा में महाराणा प्रताप अपने परिवार और विश्वासपात्रों के साथ रहे थे। यहीं उनका रसद रहता था। इसका नाम भैरव गुफा है। यहां तक मुगलों का पहुंचना असंभव था। सुरक्षा के लिए ही गुफा के चारों तरफ दीवार बनाई गई थीं, जो अब टूट रही हैं। गुफा में जाने और बाहर निकलने का रास्ता भी पीछे से था। उसने हमें वो भी दिखाया। इतिहासकार डॉ. चंद्रशेखर कहते हैं कि अरावली की पहाड़ियों में आबू पर्वत और इसके जंगलों वाले क्षेत्र में महाराणा प्रताप के रहने के ऐतिहासिक प्रमाण मौजूद हैं। इस दौरान प्रताप के शेरगांव में भी पहुंचने और वहां की गुफाओं को उपयोग में लेने के प्रमाण हैं। कालांतर में वहां के लोगों ने इसे भैरव गुफा के नाम से कर दिया होगा l मूलतः यह अरावली पर्वत माला के दर्रे और गुफाएं हैं l इनका उपयोग प्रताप ने अटाविक (छापामार) युद्ध प्रणाली को सफल बनाने में किया था l थोड़ी देर बाद हम भैरव गुफा से रवाना हो गए। काफी देर चढ़ाई के बाद बड़ी-बड़ी चट्टानें दिखाई दी। सर्दी के बावजूद हम पसीने में तरबतर थे। 15 मिनट वहीं रेस्ट किया। फिर आगे बढ़े। 2.5 घंटे तक चलने के बाद एक बड़ी सी गुफा दिखाई दी। शैतान सिंह ने बताया कि ये स्थानीय देवी का धाम हैं। शेरगांव के लोग अक्सर जब गाय-भैंस चराने जंगल में आते हैं तो इस देवी की पूजा करते हैं। शेरगांव से बाहर चट्‌टानी मैदान पर 2 मंदिर यहां से आधे घंटे और चलने के बाद हम पहाड़ी की चोटी पर पहुंच गए। चोटी पर बड़ा चट्टानी मैदान था। नीचे झील बह रही थी। सामने की तरफ छोटे-छोटे इक्का-दुक्का कच्चे घर और खेत नजर आ रहे थे। यहां शैतान सिंह ने बताया कि हम अब शेरगांव के बाहर हैं। आगे बढ़ने पर दो मंदिर थे। एक चामुंडा माता और दूसरा हनुमानजी का। दर्शन करके आगे के सफर पर निकले। थोड़ा और आगे चले तो एक वीरान गांव था। ज्यादातर घरों में ताले लगे थे। शैतान सिंह ने बताया- अब इस गांव में कोई नहीं रहता। लोग अब सामने की पहाड़ी से नीचे अपने खेतों में रहते हैं। शैतान सिंह ने बताया- आगे का रास्ता और मुश्किल होने वाला है। वजनी और गैर जरूरी सामान यही छोड़ दो। पत्थरों के नीचे छिपा देंगे। हमने पूछा- सामान चोरी हो गया तो? शैतानसिंह ने हंसकर जवाब दिया- यहां कोई नहीं आता। हमने बैग वगैरह वहीं छोड़ दिए। अब हमें फिसलन भरे पथरीले रास्तों से नीचे घने जंगल में उतरना था। हम शैतान सिंह के पीछे-पीछे चलते गए। आगे रास्ते में कंटीली झाड़ियां और संकरा उतार था। इसे हमने बड़ी सावधानी से पार किया। मिल गई मंजिल : पहाड़ों के बीच जबकेश्वर महादेव मंदिर करीब आधे घंटे चलने के बाद सामने एक शानदार नजारा था। घने और ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों के बीच एक आश्रमनुमा जगह, जहां दो छोटे-छोटे मंदिर। पास ही एक कुटिया बनी हुई थी। शैतान सिंह ने बताया- हम जबकेश्वर पहुंच गए। थोड़ी देर में हम जबकेश्वर महादेव मंदिर के बाहर खड़े थे। अंदर पहुंचे तो गेट के बिल्कुल सामने एक मंदिर वहीं दाहिनी और भी एक मंदिर बना था। खाली पड़ी जगह में एक धूनी बनी हुई थी। दाहिनी तरफ का मंदिर शिवालय था, जिसके बाहर पानी का कुंड था। सामने कच्चे चबूतरे पर हरी नारायण भगवान का मंदिर था। हमने हाथ-पैर धोए और भगवान हरिनारायण के दर्शन किए। शिवालय के बाहर पहुंचे। इसकी दीवार पर एक जगह लिखा था ‘श्री महाराणा प्रताप सिंह जी’। शिवालय के बाहर एक कुंड था। शैतान ने हमें बताया कि ये गंगा कुंड हैं, जो हमेशा पानी से भरा रहता है। इसी कुंड के पास में बाहर दो शिवलिंग थे। शिवालय में घुसते ही दीवार पर शिलालेख लगा था। शिलालेख पर लिखा था… ॐ नम शिवाय यह मंदिर श्री महाराणा प्रताप सिंहजी की ओर से निर्मित 450 सौ वर्ष प्राचीन(पुराना) स्थान है। यहां पर राणा प्रताप ने उबरा खाकर तपस्या की थी और आपातकाल व्यतीत किया था। तत्पश्चात टूट-फूट होने पर स्वामी श्रीसेवानन्द‌जी महाराज ने इस मंदिर का जीर्णोद्वार करवाया। स्वामी श्री सेवानंद जी महाराज श्री जबकेश्वर आश्रम, आबू पर्वत, विक्रम संवत 2026 महाराणा प्रताप ने की थी शिवलिंग की स्थापना मंदिर के अंदर भगवान शिव, मां पार्वती, भगवान गणेश और रिद्धि-सिद्धि की मूर्तियां थीं। दरवाजे पर नंदी विराजमान थे। वहीं मंदिर के गृभगृह में शिवलिंग था। शैतान सिंह ने बताया कि महाराणा प्रताप ने इस शिवलिंग की स्थापना की थी। उनका संकल्प था कि वो कभी भगवान शिव का जलाभिषेक किए बिना अन्न-जल ग्रहण नहीं करते थे। ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार आपातकाल में महाराणा प्रताप दो साल तक शेरगांव के जंगलों में रहे थे। लोकोक्तियों के अनुसार इसी जगह पर महाराणा प्रताप को झपके भर (क्षण भर) के लिए महादेव दर्शन की अनुभूति हुई थी। ऐसे में उन्होंने यहां अपने हाथों से शिवलिंग की स्थापना की। इसी मंदिर में एक दीवार पर महाराणा प्रताप की तस्वीर भी लगी हुई थी। हमने शिवालय में साफ-सफाई की और पूजा-अर्चना कर जलाभिषेक किया। शिवालय के बाहर हनुमानजी की मूर्ति थी। हमने उन्हें भी नमन किया। होली के चौथे दिन भरता है मेला शैतान सिंह ने बताया कि इस शिवालय में रोजाना कोई नहीं आता हैं। हालांकि होली के चौथे दिन यहां मेला भरता है। मेले में शेरगांव व उतरज के लोग आते हैं। पूजा-पाठ करते हैं और खीर और हलवा बनाकर भगवान को भोग लगाते हैं। दोपहर के 3 बज गए थे। हमने मंदिर में धोक लगाई और वापसी का सफर शुरू किया। एक बार फिर ऊंची-ऊंची पहाड़ियों और जंगली रास्तों को पार करते हुए शाम 7.30 बजे उतरज गांव पहुंचे। यहां से हमें आगे गुरुशिखर के लिए अकेले जाना था, जो अंधेरे में बहुत मुश्किल था। ऐसे में रात उतरज में ही गुजारी। अगली सुबह 8 बजे उतरज से गुरुशिखर के लिए रवाना हो गए। सुबह 11 बजे हम गुरुशिखर पहुंच गए। इसी के साथ पूरा हो गया जबकेश्वर महादेव का सफर।

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