राजस्व न्यायालयों में देरी पर डॉ. उठवाल चिंतित:अधिकारियों-कर्मचारियों की जवाबदेही तय करने की मांग

Actionpunjab
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सम्भल में वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. अमित कुमार उठवाल ने राजस्व न्यायालयों में मामलों के निस्तारण में हो रही देरी पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ जवाबदेही तय कर विभागीय कार्रवाई की मांग की है। यह बात उन्होंने शुक्रवार को आयोजित एक प्रेस वार्ता में कही। डॉ. उठवाल ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल द्वारा 3 जून 2026 को जारी निर्देशों का स्वागत किया। इन निर्देशों में प्रदेश के सभी जनपद न्यायाधीशों को बार एसोसिएशनों के कार्य बहिष्कार के मामलों में जवाबदेही तय करने को कहा गया है। उन्होंने इसी तर्ज पर राजस्व न्यायालयों की कार्यप्रणाली की भी समीक्षा की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता-2006 में विभिन्न प्रकार के मामलों के निस्तारण के लिए समय-सीमा निर्धारित है, लेकिन अधिकांश मामलों में इसका पालन नहीं हो रहा है। उदाहरण के लिए, नामांतरण के प्रकरण, जिन्हें 45 दिनों के भीतर निस्तारित किया जाना चाहिए, कई बार दो-दो माह तक दर्ज ही नहीं होते। वहीं, धारा 24, 30, 31 और 32 से संबंधित मामलों में कानूनगो स्तर से रिपोर्ट न्यायालय तक पहुंचने में छह से दस माह का समय लग जाता है। कर्मचारियों के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई की जानी चाहिए डॉ. उठवाल ने यह भी आरोप लगाया कि बहस पूरी होने के बाद कई मामलों में आदेश सुरक्षित रख लिए जाते हैं, लेकिन महीनों तक निर्णय जारी नहीं किए जाते। इसके अतिरिक्त, समय पर परवाने दर्ज न होना, रियल टाइम खतौनियों में काश्तकारों के अंश गलत दर्ज होना और खतौनी पर दर्ज आदेशों का समय पर क्रियान्वयन न होना जैसी समस्याएं भी आम हैं। उन्होंने कहा कि इन कमियों के लिए किसी अधिकारी या कर्मचारी की जवाबदेही तय न होने से पूरी व्यवस्था प्रभावित हो रही है। उन्होंने मांग की है कि प्रत्येक जनपद में वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों और वरिष्ठ अधिवक्ताओं की एक संयुक्त समिति गठित की जाए। यह समिति राजस्व न्यायालयों से संबंधित शिकायतों की सुनवाई कर आवश्यक कार्रवाई की संस्तुति करेगी। डॉ. उठवाल ने जोर देकर कहा कि निर्धारित समय-सीमा में मामलों का निस्तारण न करने वाले अधिकारियों और आदेशों का समय पर अनुपालन न कराने वाले कर्मचारियों के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई की जानी चाहिए। उनका मानना है कि इससे किसानों और वादकारियों को सस्ता, सुलभ और समयबद्ध न्याय मिल सकेगा।

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