396 साल बाद खगोलीय संयोग:15 जून को सोमवती अमावस्या और मिथुन संक्रांति, स्नान-दान का अक्षय पुण्य देने वाला योग; अब बनेगा 301 साल बाद

Actionpunjab
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धार्मिक और खगोलीय लिहाज से 15 जून, सोमवार को एक महासंयोग बन रहा है। इस दिन ज्येष्ठ अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) का आखिरी दिन है। साथ ही सोमवती अमावस्या और मिथुन संक्रांति भी रहेगी। पंचांग गणना में एक ही दिन सोमवार, अमावस्या, सूर्य संक्रांति और अधिकमास का संयोग सदियों में एकाध बार ही देखने को मिलता है। इस दिन, सुबह 8:23 तक सोमवती अमावस्या और संक्रांति का स्नान और दान के लिए संकल्प लेना महापुण्यदायी रहेगा। सनातन परंपरा में अमावस्या पितरों के लिए, सोमवार शिव पूजा के लिए, अधिक मास विष्णु पूजा के लिए और संक्रांति सूर्य आराधना का खास दिन होता है। इस दिन पीपल और शिव पूजा के लिए भी विशेश शुभ दिन रहेगा। पुराणों के मुताबिक, इस दिन किए गए अनुष्ठान और स्नान- दान का पुण्य फल अक्षय होता है। यानी कभी नष्ट नहीं होता 396 साल पहले बना था ऐसा योग, अब 2327 में आएगा नजर
ज्योतिषाचार्य डॉ. गणेश मिश्र ने बताया कि पंचांग गणना के अनुसार, सोमवती अमावस्या तभी बनती है जब सोमवार को अमावस्या तिथि सूर्योदय के समय मौजूद हो। वहीं मिथुन संक्रांति तब होती है जब सूर्य वृष राशि से निकलकर मिथुन राशि में प्रवेश करता है। निरयन सूर्य, अमावस्या तिथि और सोमवार के सूर्योदय नियम के आधार पर की गई गणितीय गणना बताती है कि यह संयोग इससे पहले 10 जून 1630 को बना था। यानी पूरे 396 साल बाद वर्ष 2026 में यह दुर्लभ अवसर दोबारा आया है। अब इसके बाद ऐसा ही संरेखण अगले 301 सालों बाद, यानी 20 जून 2327 को देखने को मिलेगा। अमावस्या और मिथुन संक्रांति: पंचांग और आधुनिक खगोल विज्ञान का सटीक गणित अंतरिक्ष में इस तरह बनती है अमावस्या
जब अंतरिक्ष में चंद्रमा, पृथ्वी और सूर्य के ठीक बीच में आता है तो सूर्य की पूरी रोशनी चंद्रमा के उस हिस्से पर पड़ती है जो पृथ्वी के पीछे होता है, जबकि पृथ्वी की तरफ वाला चंद्रमा का हिस्सा पूरी तरह अंधेरे में रहता है और हमें आसमान में चांद दिखाई नहीं देता।
ज्योतिष के अनुसार जब अंतरिक्ष में चक्कर काटते हुए सूर्य और चंद्रमा के बीच 12 डिग्री का अंतर आता है, तो एक तिथि बदल जाती है। इस तरह सूर्य-चंद्रमा की बीच का अंतर बढ़ते-बढ़ते 360 डिग्री के बाद दोबारा 0 डिग्री हो जाता है तो अमावस्या तिथि होती है। सूर्य का राशि परिवर्तन, वृष से मिथुन राशि में प्रवेश
धरती सूर्य का चक्कर लगाती है, लेकिन जमीन से देखने पर हमें आसमान में सूर्य का एक गोल रास्ता दिखाई देता है, जिसे वैज्ञानिक भाषा में क्रांतिवृत्त कहते हैं। खगोलविदों ने सूर्य के इस पूरे रास्ते को 12 बराबर भागों यानी राशियों में बांटा है। जब सूर्य इस तय रास्ते पर आगे बढ़ते हुए वृष राशि को पार करके अगली राशि, मिथुन में प्रवेश करता है, तो इसी बदलाव को संक्रांति कहते हैं। 15 जून को दोपहर करीब 12:49 पर यही खगोलीय घटना होगी। जब सूर्य वृष राशि को छोड़कर मिथुन राशि की सीमा में प्रवेश करेगा तब मिथुन संक्रांति का योग बनेगा। ग्रंथों में प्रमाण: स्कंद पुराण और गीता में है इसका महत्व स्नान-दान और पितरों की तृप्ति का दिन: स्कंद पुराण के सोमवती तीर्थ प्रसंग में लिखा है कि सोमवार और अमावस्या का संयोग होने पर पवित्र नदियों में स्नान, दान, जप और होम करना चाहिए। इसी प्रसंग में पितरों को तिल मिले जल और पिंड से तृप्त करने का विशेष विधान बताया गया है।
पीपल पूजा: सोमवती अमावस्या पर पीपल की परिक्रमा का बड़ा महत्व है। भगवद्गीता के 10वें अध्याय के 26वें श्लोक में भगवान कृष्ण ने कहा है कि मैं वृक्षों में मैं अश्वत्थ (पीपल) हूँ। इसके अलावा स्कंद पुराण के अश्वत्थ माहात्म्य में भी इस पेड़ की पवित्रता और उसमें त्रिदेवों के वास का जिक्र मिलता है। इस दिन क्या करें: स्नान-दान और सूर्य अर्घ्य देने का पर्व

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