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आर्थिक तंगी की मार झेल रहे परिवार ने मृत्युभोज में ‘घी के मालपुए’ नहीं बनवाए। सादा खाना खिलाया। इससे समाज के लोग इतने नाराज हुए कि इनका हुक्का-पानी बंद करने का फरमान सुना दिया। इस गरीब परिवार का समर्थन करने वाले 42 अन्य परिवारों पर भी यही तुगलकी फरमान लागू किया गया। अब परिवारों को न दुकानदार राशन दे रहा है, न ही कुएं से पानी नहीं भरने दिया जा रहा है। यहां तक कि रिश्तेदारी में आने-जाने पर भी रोक है। पंचों के फरमान की अनदेखी करने पर 11 हजार रुपए और पूरे समाज को सामूहिक भोजन (जीमण) का दंड देना होगा। यह पूरा मामला सिरोही के बरलूट थाना इलाके के मंडवारिया गांव का है। पीड़ित परिवारों ने अब जिला कलेक्टर से शिकायत की है। अब सिलसिलेवार समझते हैं पूरा मामला… सादा भोजन नागवार गुजरा, पंचों ने समाज से बाहर किया पीड़ित परिवारों ने बताया कि गांव में 5 जून को सदाराम पुत्र बलवाजी का निधन हो गया था। 17 जून को हुए मृत्युभोज में परिवार की माली हालत ठीक न होने के कारण घी के मालपुआ नहीं बनाए जा सके। बेहद सादा भोजन कराया गया। इस बात से समाज के एक दर्जन से अधिक पंच इस कदर नाराज हुए कि उन्होंने अगले ही दिन 18 जून को फरमान सुनाकर इस परिवार सहित कुल 43 समर्थक परिवारों को समाज से बाहर कर दिया। जीना हुआ दूभर, बच्चे भूखे सोने को मजबूर बहिष्कार की मार झेल रहे परिवारों का जीना मुश्किल हो गया है। गांव के दुकानदार उन्हें राशन का सामान नहीं दे रहे हैं। खेत मालिक उन्हें मजदूरी पर नहीं रख रहे हैं। हद तो यह है कि इन परिवारों को गांव के सार्वजनिक कुएं से पानी तक भरने नहीं दिया जा रहा है। राशन न मिलने के कारण घरों में बच्चे भूखे सो रहे हैं। शादी-ब्याह और रिश्तों पर भी पहरा पंचों की बंदिशें यहीं नहीं रुकीं। पीड़ित परिवारों के घरों में मेहमानों के आने और उनके किसी रिश्तेदारी में जाने पर भी पूरी तरह रोक लगा दी गई है। पीड़ित गोपाल बताते हैं- मेरी बुआ की लड़की की 20 जून को शादी थी। पंचों के डर से मैं शादी में नहीं गया। फरमान है कि यदि कोई जाएगा तो उसे 11 हजार रुपए और पूरे समाज को सामूहिक भोजन (जिम) का दंड देना होगा।
अन्य पीड़ित भोगीलाल ने बताया- मेरे भाई दिनेश की 24 जून को शादी थी। ननिहाल वालों ने दंड और मालपुए की मांग के डर से पीले चावल (निमंत्रण) लेने से ही इनकार कर दिया। इसके चलते शादी में कोई शामिल नहीं हुआ। पीड़ितों की जुबानी तेजाराम- पंचों ने कहा कि हमने सादा भोजन खिलाकर समाज की नाक कटा दी। अब गांव में हमसे कोई बात नहीं करता। कुएं से पानी नहीं लेने दे रहे। गोपाल- पंचों के फरमान का ऐसा डर है कि मैं बुआ की लड़की की शादी तक में नहीं गया। भोगीलाल- मेरे भाई की शादी में कोई रिश्तेदार नहीं आया। ननिहाल वालों ने डर से पीले चावल (निमंत्रण) लेने से ही इनकार कर दिया। कमला देवी- हमारी बहू-बेटियों से गांव में कोई बोलता तक नहीं। घी के मालपुआ नहीं बनाए तो क्या हम इंसान नहीं रहे? ये कैसा इंसाफ है? थाने में सुनवाई नहीं, अब कलेक्टर से गुहार पीड़ितों ने 20 जून को बरलूट थाने में नामजद रिपोर्ट दी थी। आरोप है कि पुलिस ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। इससे परेशान होकर गुरुवार को सभी 43 परिवारों के लोग सिरोही कलेक्ट्रेट पहुंचे और जिला कलेक्टर को ज्ञापन सौंपकर न्याय की गुहार लगाई।
उधर, बरलूट थाने के जांच अधिकारी रमेश कुमार ने कहा- परिवाद हमारे पास आया है। जांच चल रही है। यह मामला कोई पुरानी रंजिश का लग रहा है। क्या कहता है कानून? राजस्थान सामाजिक बहिष्कार निषेध अधिनियम 2019 के तहत किसी भी व्यक्ति या परिवार का सामाजिक, आर्थिक या व्यावसायिक बहिष्कार करना गैर-कानूनी और गंभीर अपराध है। जाति, धर्म या रीति-रिवाज के नाम पर हुक्का-पानी बंद करना, सार्वजनिक स्थानों या कुओं से पानी रोकने पर 7 साल तक की सजा और भारी जुर्माने का प्रावधान है।
मृत्युभोज में घी के मालपुए नहीं बनवाने पर हुक्का-पानी बंद:43 परिवारों को दुकानों से राशन नहीं मिल रहा, कुएं से पानी नहीं दे रहे
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