JNU के प्रॉस्पेक्टस के सेक्शन V में डिप्रिवेशन पॉइंट्स का प्रावधान है। इसके तहत ऐसे उम्मीदवारों को अतिरिक्त अंक दिए जाते हैं, जिनके पिछले शैक्षणिक संस्थान भौगोलिक रूप से पिछड़े या वंचित क्षेत्रों में स्थित रहे हैं।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) की 2026-27 की प्रवेश प्रक्रिया कानूनी पेंच में फंस गई है। दिल्ली हाईकोर्ट ने विश्वविद्यालय को फिलहाल ‘डिप्रिवेशन पॉइंट्स’ (वंचना अंक) के आधार पर प्रवेश प्रक्रिया को आगे बढ़ाने से रोक दिया है। कोर्ट ने सवाल उठाया कि क्या जेएनयू एक बार आयोजित हो चुकी कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट (CUET) के स्कोर में बाद में एक्स्ट्रा अंक जोड़ सकता है।
ANI के मुताबिक न्यायमूर्ति जस्मीत सिंह ने कहा कि पहली बार में यह व्यवस्था प्रवेश परीक्षा की निष्पक्षता और उसकी मूल भावना को प्रभावित करती नजर आती है। अदालत ने जेएनयू को निर्देश दिया है कि अगली सुनवाई तक डिप्रिवेशन पॉइंट्स के आधार पर न तो प्रवेश को अंतिम रूप दिया जाए और न ही इस व्यवस्था के तहत आगे की कोई कार्रवाई की जाए।
क्या हैं डिप्रिवेशन पॉइंट्स?
JNU के प्रॉस्पेक्टस के सेक्शन V में डिप्रिवेशन पॉइंट्स का प्रावधान है। इसके तहत ऐसे उम्मीदवारों को अतिरिक्त अंक दिए जाते हैं, जिनके पिछले शैक्षणिक संस्थान भौगोलिक रूप से पिछड़े या वंचित क्षेत्रों में स्थित रहे हैं। मौजूदा JNU नियमों के अनुसार, किसी उम्मीदवार को अधिकतम 12 डिप्रिवेशन पॉइंट्स मिल सकते हैं। प्रत्येक डिप्रिवेशन पॉइंट को 3 अंकों के बराबर माना जाता है। इस तरह किसी उम्मीदवार के CUET स्कोर में अधिकतम 36 अतिरिक्त अंक जुड़ सकते हैं। यही व्यवस्था अब अदालत में चुनौती का विषय बनी है।
अमित मेहरा ने दाखिल की याचिका
बता दें कि इस मामले में अमित मेहरा नामक एक छात्र ने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर कर JNU की इस नीति को चुनौती दी। याचिका में तर्क दिया गया कि CUET जैसी राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा में उम्मीदवार द्वारा प्राप्त अंकों में बाद में डिप्रिवेशन पॉइंट्स जोड़ने से पूरी चयन प्रक्रिया प्रभावित होती है। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति जस्मीत सिंह की पीठ के समक्ष हुई। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने प्रथम दृष्टया JNU प्रशासन की दलीलों से असहमति जताई।
कोर्ट ने CUET स्कोर में बदलाव पर उठाया सवाल
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि डिप्रिवेशन पॉइंट्स का इस्तेमाल करके JNU ने प्रभावी रूप से CUET परीक्षा में उम्मीदवारों द्वारा प्राप्त अंकों को बदल दिया या उनमें संशोधन किया है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि यदि किसी विश्वविद्यालय को इस तरह राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगी परीक्षा में प्राप्त अंकों को अपनी व्यवस्था के माध्यम से बदलने की अनुमति दे दी जाए, तो प्रतियोगी परीक्षा की मूल प्रकृति और उसकी पारदर्शिता प्रभावित होगी। अदालत के अनुसार, ऐसी स्थिति में कोई भी विश्वविद्यालय अपने नियमों के जरिए प्रतियोगी परीक्षा में प्राप्त अंकों में बदलाव कर सकता है, जो प्रतियोगी परीक्षा की मूल अवधारणा के विपरीत होगा।
JNU ने क्या दलील दी?
सुनवाई के दौरान JNU प्रशासन ने अपनी डिप्रिवेशन पॉइंट्स नीति का बचाव किया। विश्वविद्यालय की ओर से कहा गया कि इस व्यवस्था का उद्देश्य दूरदराज और विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों से आने वाले छात्रों को पर्याप्त अवसर देना है। JNU ने इस संबंध में अपने 1966 के अधिनियम और अकादमिक काउंसिल द्वारा स्वीकृत प्रावधानों का हवाला दिया। विश्वविद्यालय ने अदालत को यह भी बताया कि डिप्रिवेशन पॉइंट्स के आधार पर कई उम्मीदवारों को पहले ही ऑफर लेटर जारी किए जा चुके हैं।
क्यों लगाई गई अंतरिम रोक?
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि अगर दाखिले की प्रक्रिया को पूरी तरह आगे बढ़ने दिया गया और बाद में अदालत यह निष्कर्ष निकालती है कि डिप्रिवेशन पॉइंट्स के जरिए अतिरिक्त अंक देना कानूनी रूप से सही नहीं था, तो ऐसी स्थिति पैदा हो सकती है जिसे बाद में ठीक करना मुश्किल होगा। इसी संभावना को देखते हुए अदालत ने अंतरिम आदेश जारी किया है। इसके तहत अगली सुनवाई तक JNU को डिप्रिवेशन पॉइंट्स के आधार पर दाखिले अंतिम रूप देने से रोक दिया गया है। साथ ही, इस आधार पर आगे की कोई कार्रवाई भी नहीं करने का निर्देश दिया गया है।
24 अगस्त को अगली सुनवाई
अब इस मामले की अगली सुनवाई 24 अगस्त 2026 को निर्धारित की गई है। फिलहाल कोर्ट का आदेश अंतरिम है, इसलिए डिप्रिवेशन पॉइंट्स की व्यवस्था को लेकर अंतिम फैसला अभी नहीं आया है। अगली सुनवाई में अदालत इस मामले पर आगे विचार करेगी।