3 घंटे पहले
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रामायण में श्रीराम और रावण के बीच युद्ध चल रहा था। रावण के कई योद्धा मारे जा चुके थे। अंत में रावण ने शक्तिशाली भाई कुंभकर्ण को जगाने का निर्णय लिया।
कुंभकर्ण ब्रह्मा जी के वरदान से 6 महीने तक लगातार सोता रहता था और फिर केवल एक दिन के लिए जागता था। रावण ने उसे नींद से जगाया और युद्ध की स्थिति बताई। जैसे ही कुंभकर्ण नींद से जागा, उसने सबसे पहले रावण से युद्ध की वजह पूछी। जब रावण ने सीता हरण की बात बताई तो कुंभकर्ण ने इस बात का विरोध किया।
कुंभकर्ण ने रावण को समझाते कहा कि भाई, तुमने जो किया, वह अधर्म है। श्रीराम कोई साधारण मानव नहीं हैं। उनका साथ देने वाले लक्ष्मण और हनुमान जैसे बलशाली और धर्मपरायण योद्धा हैं। तुमने पूरी लंका को संकट में डाल दिया है।
रावण ने कुंभकर्ण की ये बातें सुनीं तो उसने सोचा कि ये तो ज्ञान की बातें कर रहा है, रावण को लगा कि कुंभकर्ण कहीं उसके खिलाफ न हो जाए। रावण ने तुरंत ही कुंभकर्ण के सामने मांसहार और शराब रखवा दिए। कुंभकर्ण ने मांस खाया, शराब पी और कुछ ही पलों में उसकी सोच बदल गई।
अब वही कुंभकर्ण, जो अभी तक ज्ञान की बातें कर रहा था, रावण के पक्ष में युद्ध करने को तैयार हो गया।
युद्ध में जब कुंभकर्ण का सामना विभीषण से हुआ। विभीषण श्रीराम के पक्ष में था। विभीषण ने कहा कि मैंने भाई रावण को बहुत समझाया था, लेकिन जब उसने मेरी नहीं मानी और मुझे लात मारकर निकाल दिया तो मैंने श्रीराम की शरण ले ली।
कुंभकर्ण ने जवाब दिया कि भाई, तूने ये अच्छा किया। तूने धर्म का रास्ता चुना, लेकिन मैं अब ऐसा नहीं कर सकता। मैंने मांस-मदिरा का सेवन कर लिया है। अब मेरे मन पर रावण छा गया है। मैं जानता हूं कि मैं गलत कर रहा हूं, फिर भी मैं रावण के लिए युद्ध करूंगा।
प्रसंग से सीखें जीवन प्रबंधन के 3 सूत्र
- ज्ञान होना काफी नहीं है, विवेक भी जरूरी है – कुंभकर्ण के पास धर्म का ज्ञान था, लेकिन मांस और शराब के सेवन ने उसकी बुद्धि को दूषित कर दिया। बुरे चीजें और बुरी संगत इंसान को उसकी सही सोच से भटका देती है।
- बुरी संगत और बुरी आदतें विवेक को कमजोर करती हैं – कुंभकर्ण ने विभीषण के सामने स्वीकार किया कि उसे सही-गलत का पता है, लेकिन रावण की संगत और नशे ने उसके फैसले को प्रभावित कर दिया।
- स्वतंत्र निर्णय की क्षमता को नष्ट कर देती हैं बुरी चीजें – जब हम बुरी आदतों या बुरे लोगों के प्रभाव में होते हैं, तो हमारा मैं दब जाता है। निर्णय हमारी मर्जी से नहीं, बल्कि बुरे प्रभावों से प्रभावित होकर लिए जाते हैं।
अपने विवेक को कैसे मजबूत बनाएं?
- सत्संग सुनें और अच्छे लोगों के साथ रहें – हर दिन थोड़ा समय ऐसे लोगों या किताबों के साथ बिताएं जो आपको ऊर्जावान और सही दिशा देने वाले हों।
- बुरी आदतों से दूर रहें – चाहे वो नशा हो, गुस्सा हो, या आलस, इनसे बचने की कोशिश करें। ये धीरे-धीरे आपके विचारों को प्रभावित करते हैं।
- स्वस्थ दिनचर्या बनाएं – नींद, भोजन, व्यायाम और मेडिटेशन आपकी मानसिक शक्ति को बनाए रखते हैं।
- मन की आवाज सुनें – जब भी कोई निर्णय लें, खुद से पूछें कि क्या ये सच में सही है? अगर काम सही न हो तो आगे न बढ़ें।