वॉशिंगटन डी सीकुछ ही क्षण पहले
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प शुक्रवार को आर्मेनिया और अजरबैजान के नेताओं से व्हाइट हाउस में मुलाकात करेंगे। ट्रम्प ने इस मुलाकात को दोनों देशों के बीच शांति समिट बताया।
जिसका मकसद दोनों देशों के बीच 37 साल पुराने संघर्ष को समाप्त करना है। आर्मेनिया के प्रधानमंत्री निकोल पशिनयान और अजरबैजान के राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव व्हाइट हाउस में एक आधिकारिक शांति समझौते पर भी हस्ताक्षर कर सकते हैं।
इसके साथ ही ट्रम्प ने कहा दोनों देशों के साथ आर्थिक अवसरों को बढ़ाने के लिए द्विपक्षीय समझौते भी किए जाएंगे। ट्रम्प अब तक दुनियाभर में 6 जंग खत्म करवाने का दावा कर चुके हैं।

अजरबैजानी राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव (दाएं) और आर्मेनियाई प्रधानमंत्री निकोल पशिनयान (बाएं) 10 जुलाई को अबू धाबी में शांति बातचीत के लिए मिले थे।
ट्रम्प का 6 देशों के बीच जंग रुकवाने का दावा
भारत-पाकिस्तान: दोनों देशों के बीच मई 2025 में पहलगाम में आतंकी हमले के बाद संघर्ष हुआ। इस हमले में 26 लोग मारे गए थे।
इजराइल-ईरान: ये जंग 13 जून 2025 को शुरू हुआ जब इजराइल ने ईरान के प्रमुख सैन्य और परमाणु सुविधाओं पर हमला किया। ये जंग 12 दिनों तक चला।
थाईलैंड-कंबोडिया: 24 जुलाई 2025 को प्रसात ता मुएन थॉम मंदिर के पास सीमा विवाद के कारण सैन्य झड़प शुरू हुई, जिसमें 33 लोगों की मौत हुई।
रवांडा- कांगो: 2023 से 2025 तक एम23 विद्रोही समूह के कारण पूर्वी कांगो में झड़पें होती रहती हैं।
सर्बिया-कोसावो: 2023 में कोसोवो के बनज्स्का में सर्बियाई हमलावरों और कोसोवो पुलिस के बीच हिंसक झड़प से जंग शुरू हुई थी।
मिस्र-इथियोपिया: 2020 से 2025 से नील नदी पर ग्रैंड इथियोपियन रेनेसां डैम (GERD) के पानी के उपयोग को लेकर विवाद चल रहा है। जुलाई 2024 में मिस्र की सैन्य तैनाती बढ़ी।
ट्रम्प बोले- पूरी दुनिया के लिए ऐतिहासिक दिन
ट्रम्प ने अपने ट्रुथ सोशल प्लेटफॉर्म पर कहा-
ये दोनों देश लंबे समय से युद्ध में हैं, जिसमें हजारों लोगों की जान गई। कई नेताओं ने इस युद्ध को खत्म करने की कोशिश की, लेकिन अब तक सफलता नहीं मिली। मेरे प्रशासन ने दोनों पक्षों के साथ लंबे समय तक बातचीत की है।
ट्रम्प ने इसे आर्मेनिया, अजरबैजान, अमेरिका और पूरी दुनिया के लिए ऐतिहासिक दिन बताया। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के साथ आर्थिक अवसरों को बढ़ाने के लिए द्विपक्षीय समझौते भी किए जाएंगे।
ट्रम्प ने कहा कि यह शिखर सम्मेलन दक्षिण काकेशस क्षेत्र की संभावनाओं को पूरी तरह खोलने में मदद करेगा।
1988-1994: दोनों देशों के बीच मस्जिदों-चर्चों को लेकर विवाद बढ़ा
1920 के दशक में, सोवियत संघ ने आर्मेनिया और अजरबैजान पर कब्जा कर लिया था। 1980 के दशक के दौरान सोवियत संघ का शासन कमजोर हुआ।
इसके बाद 1988 में नागोर्नो-कराबाख की संसद ने आर्मेनिया के साथ जाने का फैसला किया। इससे इलाके में रहने वाले अजरबैजानी लोगों के बीच गुस्सा बढ़ गया। दोनों समुदायों के बीच 1991 में हिंसक झड़पें तेज हो गई।
आर्मेनियाई लोग ईसाई हैं, जबकि अजरबैजानी तुर्किक मूल के मुस्लिम हैं। इन धार्मिक और सांस्कृतिक अंतरों ने दोनों समुदायों के बीच अविश्वास और टकराव को बढ़ाया। दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर सांस्कृतिक विरासत और मस्जिदों-चर्चों को नुकसान नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाया।

कई बार शांति बातचीत नाकाम हुई
दोनों देशों के बीच शांति के लिए कई बार बातचीत हुई, लेकिन अभी तक कोई बड़ा समझौता नहीं हो सका। अजरबैजान ने शांति समझौते से पहले आर्मेनिया से अपनी संविधान में बदलाव करने की मांग की थी, जिसमें कराबाख पर क्षेत्रीय दावों को हटाने की बात शामिल है।
जुलाई में अबू धाबी में और मई में अल्बानिया में दोनों नेताओं की मुलाकात हुई थी, लेकिन कोई ठोस नतीजा नहीं निकला। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा ने भी दोनों देशों से शांति समझौते पर जल्द हस्ताक्षर करने की अपील की थी।
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