Today is Gopashtami, the festival of worship of Lord Krishna and cows, significance of gopashtami, Lord Krishna puja vidhi | भगवान श्रीकृष्ण और गायों की पूजा का पर्व गोपाष्टमी आज: बाल गोपाल ने कार्तिक शुक्ल अष्टमी से शुरू किया गायों को चराने का काम, जानिए गोपाष्टमी से परंपराएं

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8 घंटे पहले

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आज (29 अक्टूबर) गोपाष्टमी है। कार्तिक शुक्ल अष्टमी पर गौ पूजा का ये पर्व मनाया जाता है। मान्यता है कि द्वापर युग में बाल कृष्ण ने इसी तिथि से ब्रज क्षेत्र में गौचारण यानी गायों को चराने का काम शुरू किया था।

गोपाष्टमी से जुड़ी परंपराएं : उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के मुताबिक, गोपाष्टमी गौ माता और बाल गोपाल की पूजा करने का पर्व है। इस दिन भक्त गौशाला में गाय और बछड़े की पूजा करते हैं। गायों को स्नान कराते हैं, सजाते हैं और चारा खिलाते हैं। गौमाता की परिक्रमा की जाती है। इस दिन ग्वालों को दान देना और उन्हें नए वस्त्र भेंट करना चाहिए। आमतौर पर ये पर्व किसानों के लिए एक महापर्व की तरह होता है। किसान अपनी गाय, बछड़े और बैलों की विशेष पूजा करते हैं, उन्हें सजाते हैं।

ऐसे कर सकते हैं गाय और गाय के बछड़े की पूजा

गाय और बछड़े को स्नान कराना चाहिए। उनके सींगों को हल्दी, कुमकुम और फूलों से सजाएं।

गाय और बछड़े को वस्त्र, चुनरी चढ़ाएं, इनके पैरों में घुंघरू बांधें। चावल चढ़ाएं। धूप, दीप जलाएं आरती करें।

गौमाता को हरा चारा, हरा मटर, गुड़, गेहूं और रोटी और खीर खिलाएं। गाय की परिक्रमा करें।

गौ माता से जुड़ी मान्यताएं

गायों के चरणों की रज माथे पर लगाने से सौभाग्य में वृद्धि होती है। इस दिन गौशाला में चारा, अनाज, धन, वस्त्र आदि का दान करना चाहिए।

गाय में तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं का वास है। इसलिए गौ-पूजन करने से सभी देवी-देवता प्रसन्न होते हैं और सभी पापों का नाश होता है।

जहां गौ माता निवास करती हैं, वहां पवित्रता और सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है। गोपाष्टमी पर गौ सेवा करने से परिवार में सुख-शांति, स्वास्थ्य, लाभ और दीर्घायु की प्राप्ति होती है। ये पर्व पशुओं के संरक्षण, दया और सेवा करने का संदेश देता है।

गोपाष्टमी की कथाएं

गोपाष्टमी से जुड़ी दो कथाएं सबसे ज्यादा प्रचलित हैं-

  • पहली कथा – बाल कृष्ण ने कार्तिक शुक्ल अष्टमी को पहली बार गौ-चारण लीला (गाय चराना) की थी। इससे पहले वे केवल बछड़े चराते थे। जब वे 6 वर्ष के हुए, तब माता यशोदा और नंद बाबा से गाय चराने की अनुमति मांगी। इसके बाद इस तिथि से भगवान ग्वाल-बालों के साथ गायों को चराने लगे। इसी कारण उन्हें गोविंद और गोपाल नाम से भी पुकारा जाने लगा। ये पर्व श्रीकृष्ण के गौ प्रेम को दर्शाता है।
  • दूसरी कथा – कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से सप्तमी तक भगवान श्रीकृष्ण ने गोकुल और ग्वालों की रक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर धारण किया था, ताकि वे देवराज इंद्र द्वारा की जा रही भयंकर वर्षा से सभी को बच सकें। आठवें दिन यानी कार्तिक शुक्ल अष्टमी पर इंद्र का अहंकार भंग हुआ और वे भगवान की शरण में आए। तब कामधेनु गाय ने भगवान कृष्ण का अभिषेक किया था और उन्हें गोविंद नाम दिया।

अब जानिए श्रीकृष्ण की पूजा विधि…

  • गोपाष्टमी पर गौ-पूजन के साथ-साथ भगवान श्रीकृष्ण की भी पूजा करनी चाहिए। घर के मंदिर में पूजा का संकल्प लें। भगवान श्रीकृष्ण के बाल गोपाल स्वरूप और राधा रानी की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
  • श्रीकृष्ण को पंचामृत से स्नान कराएं। पंचामृत दूध, दही, घी, मिश्री और शहद मिलाकर बनाएं। नए वस्त्र पहनाएं, चंदन या अष्टगंध का तिलक लगाएं। पुष्पमाला, तुलसी पत्र अर्पित करें।
  • धूप-दीप जलाकर आरती करें। भगवान को माखन-मिश्री, फल चढ़ाएं। भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी की आरती करें।
  • पूजा में ॐ नमो भगवते वासुदेवाय या कृं कृष्णाय नम: मंत्र का जाप करें। पूजा के अंत में जानी-अनजानी गलतियों के लिए क्षमा याचना करें। इसके बाद प्रसाद बांटें और खुद भी लें।

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