Traditions and rituals associated with Akshaya Navami, amla navami significance in hindi, rituals about akshya navami in hindi | अक्षय नवमी से जुड़ी परंपराएं और पूजा विधि: तिथियों की घट-बढ़ की वजह से दो दिन रहेगी अक्षय नवमी, ये है आंवले की पूजा करने का पर्व

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8 घंटे पहले

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आज (30 अक्टूबर) सुबह करीब 10 बजे तक कार्तिक शुक्ल अष्टमी है और इसके बाद नवमी तिथि शुरू हो जाएगी। कार्तिक शुक्ल नवमी को अक्षय और आंवला नवमी कहा जाता है। ये तिथि कल (31 अक्टूबर) सुबह करीब 10 बजे तक रहेगी। कुछ पंचांग में 30 को और कुछ में 31 को अक्षय नवमी बताई गई है। इस दिन आंवले के पेड़ की पूजा करने की परंपरा है।

उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के मुताबिक, अक्षय शब्द का अर्थ है जिसका कभी क्षय न हो, अक्षय नवमी पर किए गए दान-पुण्य, धर्म-कर्म से मिला पुण्य जीवनभर बना रहता है, इसका कभी क्षय नहीं होता है। मान्यता है कि कार्तिक शुक्ल नवमी पर भगवान विष्णु ने आंवले के वृक्ष में वास किया था। इसलिए इस दिन भगवान विष्णु और आंवले के वृक्ष की विशेष पूजा करनी चाहिए। अक्षय नवमी का महत्व अक्षय तृतीया के समान ही माना जाता है।

आंवले से जुड़ी मान्यताएं

आंवले के वृक्ष को पवित्र और पूजनीय माना गया है। आंवले के वृक्ष की उत्पत्ति ब्रह्माजी के नेत्रों से गिरे आंसुओं से हुई है। इसे दिव्य फल कहते हैं। इस पेड़ में भगवान विष्णु के साथ ही शिव जी का भी वास माना जाता है। आयुर्वेद में आंवले को अच्छी सेहत और लंबी उम्र देने वाला फल माना जाता है।

आंवला नवमी पर क्या करें

इस दिन आंवले के वृक्ष की पूजा करने के साथ ही इस पेड़ के नीचे भोजन करने की भी परंपरा है। इसके साथ ही इस पेड़ के नीचे दूसरों को भोजन कराने का भी विशेष महत्व है।

आंवला नवमी पर पानी में आंवले का रस मिलाकर स्नान करना चाहिए। स्नान के बाद वस्त्र, अन्न, फल-सब्जियों का दान करें।

आंवले के वृक्ष के नीचे दीपक जलाना चाहिए।

आंवले के पेड़ की पूजा विधि

  • आंवले के पेड़ के पास पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठकर पूजा करने का संकल्प लें।
  • वृक्ष के आस-पास साफ-सफाई करें और उसकी जड़ में शुद्ध जल और थोड़ा कच्चा दूध अर्पित करें।
  • वृक्ष पर हल्दी और कुमकुम से तिलक करें। फल, फूल, धूप, दीप और अक्षत (चावल) अर्पित करें।
  • वृक्ष के तने पर कच्चा सूत या मोली (कलावा) परिक्रमा करते हुए लपेटें।
  • कर्पूर या घी के दीपक से आरती करें और परिक्रमा करें। पूजा के अंत में जानी-अनजानी गलतियों के लिए क्षमा मांगे।
  • पूजा के बाद आंवले के वृक्ष के नीचे बैठकर परिवार और मित्रों के साथ भोजन करें।

आंवला नवमी से जुड़ी पौराणिक कहानी

एक बार माता लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण कर रही थीं। देवी ने सोचा कि भगवान विष्णु और भगवान शिव की पूजा एक साथ करनी चाहिए। इस विचार के साथ, उन्होंने आंवले के वृक्ष को भगवान विष्णु और भगवान शिव का प्रतीक मानकर उसकी विधि-विधान से पूजा की।

माता लक्ष्मी की पूजा से प्रसन्न होकर विष्णु और शिव दोनों प्रकट हुए। तब माता लक्ष्मी ने आंवले के पेड़ के नीचे दोनों देवताओं के लिए भोजन पकाया और दोनों देवों को परोसा। इसके बाद देवी ने स्वयं भी भोजन किया।

तभी से ये मान्यता प्रचलित है कि अक्षय नवमी पर आंवले के वृक्ष की पूजा और वृक्ष के नीचे भोजन करने से भक्त को भगवान विष्णु, शिव जी और माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है।

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