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- New Year 2026, The Teachings Of Ramayana And Mahabharata, Life Management Tips About Ramayana And Mahabharata In Hindi
7 घंटे पहले
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आज 2026 का पहला दिन है। नए साल में सोच सकारात्मक और धैर्य बनाए रखने का संकल्प लेंगे, तो मुश्किल समय में शांत और सुखी रहेंगे। रामायण और महाभारत के किस्सों से जानिए असफलता का सामना कैसे कर सकते हैं…
हर स्थिति में आत्मविश्वास बनाए रखें
देवी सीता की खोज करते-करते वानर सेना दक्षिण दिशा में संपाति के पहुंच गई थी। संपाति गिद्दराज जटायु के भाई थी। संपाति ने हनुमान, जामवंत, अंगद और अन्य वानरों को बताया कि देवी सीता समुद्र पार स्थित रावण की लंका में हैं।
इसके बाद वानरों ने ये तय किया किसी लंका जाकर देवी सीता की खोज करनी चाहिए, लेकिन इसके लिए समुद्र पार करना था। ये काम बहुत मुश्किल था। सबसे पहले अंगद ने इस काम के लिए असर्मथता जताई, जामवंत ने भी मना कर दिया। इसके बाद जामवंत ने हनुमान जी से कहा ये काम आपको करना चाहिए और आप ये काम कर सकते हैं।
जामवंत ने हनुमान को उनकी शक्तियों का स्मरण कराया। आत्मविश्वास जागते ही हनुमान जी ने समुद्र लांघने का संकल्प लिया। रास्ते में सुरसा, सिंहिका जैसी बाधाएं भी आईं, लेकिन उन्होंने बुद्धि और साहस से समाधान निकाला और लंका पहुंच गए।
हनुमान जी की सीख
- अपनी क्षमताओं पर विश्वास रखें, आत्मसंदेह प्रगति में सबसे बड़ी बाधा है।
- बड़े लक्ष्यों को पाने के लिए धैर्य और योजना आवश्यक है।
- समस्याओं का समाधान बल से नहीं, बुद्धि से करें।
- नए साल में अपने अंदर की संभावनाओं को पहचानें।
- सही समय पर सही कदम उठाना सफलता की कुंजी है।

असफलता से सीख लेकर आगे बढ़ें
हनुमान जी लंका पहुंच गए और उन्होंने रावण के महल में, लंका की अन्य जगहों पर देवी सीता की खोज की, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। पहली कोशिश में हनुमान जी असफल हो गए थे। इसके बाद हनुमान जी श्रीराम का स्मरण करके दूसरा प्रयास करने के लिए तैयार हो गए। इस हनुमान जी ने तय किया इस बार वे ऐसी जगहों पर देवी सीता की खोज करेंगे, जिन जगहों पर उन्होंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया है। दूसरे प्रयास में हनुमान जी अशोका वाटिका पहुंच गए और वहां उनकी भेंट देवी सीता से हो गई।
हनुमान जी की सीख
- असफलता से निराश नहीं होना चाहिए।
- आत्मविश्वास बनाए रखें और असफलता से सीख लेकर दूसरा प्रयास करें।
- अपने लक्ष्य पर ध्यान दें और योजना के साथ आगे बढ़ें।
- गलतियां दोहराने से बचेंगे, तो सफलता जरूर मिलेगी।
- काम करते समय अपने इष्टदेव का ध्यान करते रहना चाहिए।

मुश्किल समय में भी धैर्य और भगवान पर भरोसा बनाए रखें
महाभारत में पांडव युधिष्ठिर द्युत क्रीडा में दुर्योधन से सब कुछ हार गए थे। वे अपने भाइयों और द्रौपदी को भी हार गए थे। इसके बाद भरी सभा में द्रौपदी का अपमान हुआ। दु:शासन ने द्रौपदी का चीरहण किया, उस मुश्किल समय में द्रौपदी की किसी ने मदद नहीं की। ऐसे मुश्किल समय में भी द्रौपदी ने धैर्य और श्रीकृष्ण पर भरोसा बनाए रखा। जब सभी रास्ते बंद दिखे, तब उन्होंने श्रीकृष्ण को याद किया। श्रीकृष्ण की कृपा से द्रौपदी की लाज बची। इसके बाद द्रौपदी ने इस अपमान का बदला लेने का संकल्प लिया और अधर्म के विरुद्ध मजबूती से खड़ी रहीं। बाद में महाभारत युद्ध में कौरवों की हार हुई।
द्रौपदी की सीख
- हालात कितने भी मुश्किल हों, धैर्य न छोड़ें।
- हर स्थिति में भगवान पर आस्था बनाए रखें।
- योग्य व्यक्ति से मदद मांगने में संकोच न करें।
- भगवान अपने सच्चे भक्त की मदद जरूर करते हैं।
- अधर्म के विरुद्ध मजबूती से खड़े रहना चाहिए।

सत्य और धर्म कभी न छोड़ें
युधिष्ठिर सत्य और धर्म का पालन करते थे। उनके जीवन में हमेशा परेशानियां बनी रहीं, लेकिन उन्होंने कभी भी सत्य और धर्म को नहीं छोड़ा। इसी वजह से युधिष्ठिर को धर्मराज कहा जाता है। महाभारत युद्ध में जब द्रोणाचार्य पांडवों के खतरा बन गए, तब श्रीकृष्ण ने उनका वध करने की योजना बनाई। योजना के अनुसार भीम ने अश्वत्थामा नाम के एक हाथी को मार दिया और भीम ने जोर-जोर से चिल्लाना शुरू कर दिया कि मैंने अश्वत्थामा को मार दिया।
जब ये बात द्रोणाचार्य ने सुनी तो वे दुखी हो गए। द्रोणाचार्य को लगा कि उनका पुत्र अश्वत्थामा मारा गया, इस बात को कंफर्म करने के लिए वे युधिष्ठिर के पास पहुंचे। युधिष्ठिर ने कहा कि हां अश्वत्थामा मारा गया, लेकिन वह हाथी था। इस दौरान जैसे ही युधिष्ठिर ने कहा कि हां अश्वत्थामा मारा गया, ठीक इसके बाद श्रीकृष्ण ने जोर से शंख बजा दिया, जिससे बाद वाली बाद द्रोणाचार्य सुन नहीं सके।
श्रीकृष्ण जानते थे कि युधिष्ठिर कभी झूठ नहीं बोलेंगे, इसलिए उन्होंने युधिष्ठिर की आधी बात होते ही शंख बजा दिया, जिससे द्रोणाचार्य पूरी बात नहीं सुन सके और उन्हें लगा कि उनका पुत्र अश्वत्थामा मारा गया। द्रोणाचार्य अश्वत्थामा के मरने की खबर सुनकर हताश हो गए और अपने रथ से उतरकर जमीन पर बैठ गए। उसी समय धृष्टद्युम्न ने द्रोणाचार्य का वध कर दिया।
युधिष्ठिर की सीख
- परिस्थितियां कितनी भी कठिन हों, सत्य और धर्म न छोड़ें। युधिष्ठिर ने युद्ध जैसे कठिन समय में भी असत्य नहीं बोला।
- आधा सत्य भी न छिपाएं। युधिष्ठिर ने अश्वत्थामा मारा गया के साथ ये भी कहा था कि वह हाथी था, यानी सत्य को पूरा कहना चाहिए।
- जीवन में रणनीति आवश्यक है, लेकिन हर व्यक्ति की भूमिका अलग होती है। श्रीकृष्ण ने रणनीति संभाली और युधिष्ठिर ने नैतिकता, दोनों ने अपना-अपना कर्म किया।
- जब कोई व्यक्ति जीवन भर सत्यनिष्ठ रहता है, तो उसकी बात पर बिना सवाल भरोसा किया जाता है। द्रोणाचार्य ने युधिष्ठिर की बात इसलिए मानी थी, क्योंकि वे कभी झूठ नहीं बोलते थे।
- भावनाओं से ऊपर उठकर कर्तव्य निभाना जीवन प्रबंधन की बड़ी सीख है। युधिष्ठिर जानते थे कि ये युद्ध का निर्णायक क्षण है, फिर भी उन्होंने अपने धर्म का पालन किया और झूठ नहीं बोला था।