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राज्य सरकार की ओर से डेढ़ साल पहले मंजूर किए गए 10 बाइपास के निर्माण पर फिलहाल रोक लग गई है। इसकी वजह किसानों से ली जाने वाली जमीन के बदले दिए जाने वाला मुआवजा है। मुआवजे के कारण लागत 55% बढ़ने पर सरकार ने किसानों काे जमीन के बदले जमीन देने का फैसला किया है। इस संबंध में पीडब्ल्यूडी के एसीएस प्रवीण गुप्ता ने 31 दिसंबर को आदेश जारी किए हैं। सरकार ने 10 जुलाई 2024 काे बजट में 10 शहरों में बाइपास की घोषणा की थी। इसमें भरतपुर, धौलपुर व झुंझुनूं में दाे-दो, सीकर, हनुमानगढ़, करौली व चूरू के सुजानगढ़ में एक-एक बाइपास बनना था। 108 किमी लंबे बाइपास बनाने के लिए 1247 करोड़ बजट मंजूर हुआ था। 604 हेक्टेअर जमीन अधिग्रहित होनी है। पीडब्ल्यूडी ने डीपीआर बनाकर प्रशासनिक और वित्तीय मंजूरी के लिए वित्त विभाग को भेजे हैं। इसमें 1247 करोड़ की जगह 1930 करोड़ खर्च का अनुमान है। तर्क दिया गया कि बाइपास का निर्माण शहरी क्षेत्रों में होना है, जहां भूमि की डीएलसी ज्यादा हैं। इसलिए लागत 55% बढ़ने की संभावना है। मामला सीएम तक पहुंचा ताे मुआवजे में जमीन के बदले जमीन देने का निर्णय हुआ। प्रदेशभर में 10 बाइपास के निर्माण पर फिलहाल रोक लगाई, कलेक्टर तलाशेंगे वैकल्पिक जमीन पीडब्ल्यूडी के सेवानिवृत्त अभियंताओं, बाइपास सड़क बनाने वाली फर्म के संचालकों के मुताबिक टू लेन सड़क के निर्माण में एक किमी पर 1 करोड़ से लेकर 1.20 करोड़ की लागत आती है। सरकार ने 10 बाइपास (लंबाई 105 किमी) के लिए 1247 करोड़ मंजूर किए थे। लेकिन शहरी सीमा के नजदीक बनने से इनकी लागत बढ़ गई। ऐसे में यहां जमीन अधिग्रहण करने पर किसानों को मुआवजे के तौर पर करीब 1061 करोड़ रुपए देने होंगे। यानी मंजूर बजट की 55 फीसदी रकम मुआवजे में चली जाएगी। इसलिए इसकी लागत बढ़ गई। उदाहरण के तौर पर झुंझुनूं में 22 किमी लंबे बाइपास के लिए 100 करोड़ रुपए मंजूर किए थे। इसमे एक रेलवे ओवरब्रिज था। इस पर 44 करोड़ रुपए तथा 22 किमी लंबी सड़क के लिए 33 करोड़ रुपए माने जाए ताे 73 करोड़ रुपए होते हैं। अब इसकी लागत 163 करोड़ रुपए आंकी जा रही है। इसमे 90 करोड़ मुआवजे का खर्च माना जा रहा है। इसी तरह, सीकर में 10 किमी के लिए 90 करोड़ रुपए मंजूर हुए थे। शहर के नजदीक बाइपास हाेने पर अब इसकी लागत 270 करोड़ रुपए आ रही है। इसी तरह झुंझुनूं दुर्जनपुरा बाइपास के लिए 61 करोड़ रुपए मंजूर हुए थे। अब इसकी लागत 61.20 करोड़ आंकी जा रही है। यानी ग्रामीण क्षेत्र में डीएलसी दरें कम है। एक्सपर्ट- शंकरलाल जाट, सेवानिवृत्त एक्सईएन दूसरा विकल्प; बीओटी या पीपीपी मोड पर निर्माण झुंझुनूं व सीकर में किसानों को जमीन देना मुश्किल है। ऐसे में यहां बाइपास का निर्माण बीओटी या पीपीपी मोड पर संभव है। पीडब्ल्यूडी अधिकारियों ने कलेक्टर को जमीन के बदले जमीन देने के लिए पत्र लिखा है, लेकिन अन्य विकल्प भी तलाशे जा रहे हैं। वाहनों की संख्या का सर्वे कराया जा रहा है, ताकि बीओटी के आधार पर निर्माण कराया जाए तो कंपनी को टोल वसूली की अवधि का निर्धारण किया जा सके। इसमें निर्माण करने वाली फर्म ही किसानों काे मुआवजा देगी। “किसानों को जमीन के बदले जमीन देने के लिए जानकारी जुटाई जा रही है। इसके लिए भूमि अवाप्ति अधिकारी काे लेटर भेजा है। कितनी जमीन अधिग्रहित करनी है। उसके बदले कहां जमीन दे सकते हैं, इस बारे में जानकारी मांगी गई है।”
– अरुण गर्ग, कलेक्टर झुंझुनूं
भूमि अधिग्रहण को लेकर राज्य सरकार का फैसला:किसानों को जमीन के बदले जमीन मिलेगी, मुआवजे से लागत 55 फीसदी तक बढ़ी
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