महाराणा भूपालसिंह ने राष्ट्र भावना से चुना विलय का रास्ता:संविधान निर्माण में शामिल रहे वर्मा-मेहता, हस्ताक्षर कर स्वर्णिम इतिहास में बढ़ाया मेवाड़ का मान

Actionpunjab
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भारत के गणराज्य बनने की कहानी सिर्फ आंदोलनों और संघर्षों की नहीं है, बल्कि उन रियासतों की भी है, जिन्होंने समय रहते इतिहास की दिशा पहचान ली। मेवाड़ ऐसी ही एक रियासत थी, जहां सत्ता का हस्तांतरण टकराव से नहीं, बल्कि राष्ट्र भावना से हुआ। 26 जनवरी 1950 को जब भारत ने संविधान लागू कर खुद को गणराज्य घोषित किया, तब उसके पीछे मेवाड़ के राजपरिवार विशेषकर महाराणा भूपाल सिंह का दूरदर्शी योगदान था। देश आजाद होने के बाद जब कई रियासतें विलय को लेकर विरोध के रास्ते पर थीं, तब महाराणा भूपाल सिंह ने बिना किसी राजनीतिक दबाव के भारत में विलय को स्वीकार किया। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि मेवाड़ की पहचान अब राष्ट्र के साथ जुड़े भविष्य में सुरक्षित है। उनकी सहमति से ही मेवाड़ में संवैधानिक ढांचे की राह प्रशस्त हुई। यही कारण रहा कि मेवाड़ की आवाज संविधान निर्मात्री सभा तक पहुंची। माणिक्यलाल वर्मा, बलवंत सिंह मेहता, मोहन सिंह मेहता जैसे प्रतिनिधि रियासतों के लोकतांत्रिक एकीकरण की पैरवी कर अपने हस्ताक्षर इतिहास के स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज कराने में अग्रणी रहे। गणतंत्र दिवस के अवसर पर यह याद रखना जरूरी है कि मेवाड़ में लोकतंत्र की नींव सत्ता संघर्ष से नहीं, बल्कि राजकीय समझ और संवैधानिक सोच से रखी गई। मेवाड़ मॉडल : जहां राजसत्ता ने खुद चुना संविधान का रास्ता मेवाड़ का योगदान भारत के गणराज्य निर्माण में इसलिए विशिष्ट माना जाता है, क्योंकि यहां सत्ता परिवर्तन का मार्ग टकराव नहीं, सहमति से तय हुआ। महाराणा भूपाल सिंह ने आजादी के बाद भारत में विलय को केवल औपचारिक दस्तावेज नहीं माना, बल्कि इसे राष्ट्रनिर्माण का नैतिक दायित्व समझा। उन्होंने न तो सत्ता बनाए रखने की जिद की और न ही विलय को सौदेबाजी का विषय बनाया।उनकी इस पहल का असर यह हुआ कि मेवाड़ में प्रशासनिक संक्रमण शांतिपूर्ण रहा। उत्तरदायी शासन की अवधारणा को स्वीकार किया गया और जनप्रतिनिधियों के लिए रास्ता खुला। इसी संवैधानिक माहौल में मेवाड़ से माणिक्यलाल वर्मा, बलवंत सिंह मेहता, मोहन सिंह मेहता जैसे नेता संविधान निर्मात्री सभा तक पहुंचे, जिन्होंने रियासतों के भारत में लोकतांत्रिक एकीकरण का समर्थन किया। हालांकि मेवाड़ प्रजामंडल आंदोलन ने जनता को राजनीतिक रूप से जागरूक किया, लेकिन निर्णायक मोड़ तब आया जब राजपरिवार स्वयं आगे बढ़ा। यही वजह है कि मेवाड़ को उन चुनिंदा रियासतों में गिना जाता है, जहां राजसत्ता ने समय रहते संविधान और गणराज्य को स्वीकार कर इतिहास की सही तरफ खड़े होने का फैसला किया।

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