आग की लपटों में कूदकर दूसरों की जान बचाने वाले फायरमैन और ड्राइवर खुद आज अपनी जिंदगी की सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं। राजस्थान अग्निशमन विभाग में कार्यरत ठेका कर्मचारी मात्र ₹330 प्रतिदिन की मजदूरी पर काम कर रहे हैं, लेकिन उनके पास न तो कोई जीवन बीमा है और न ही बुनियादी सुरक्षा उपकरण। राज्यभर में ऐसे 1500 से ज्यादा ठेका कर्मचारी तैनात हैं, जो बड़े हादसों में सबसे पहले फ्रंटलाइन पर उतरते हैं, लेकिन उनकी अपनी सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है। जयपुर फायर ब्रिगेड में स्थिति और भी गंभीर है, जहां करीब 80% स्टाफ ठेके पर है, जबकि केवल 20% कर्मचारी स्थायी हैं। इन ठेका कर्मचारियों को आग, गैस लीक, टैंकर ब्लास्ट जैसे खतरनाक मिशनों में सबसे पहले भेजा जाता है। लेकिन उनके पास प्रॉपर फायर सूट, सेफ्टी हेलमेट, ग्लव्स, फेस मास्क या लाइफ जैकेट जैसे जरूरी उपकरण तक उपलब्ध नहीं हैं। कई हेलमेट तो इतने पुराने और खराब हो चुके हैं कि वे किसी भी खतरे से बचाव करने में असमर्थ हैं। ड्यूटी पर हादसा होने पर भी खुद ही उठाना पड़ता है खर्च कर्मचारियों ने बताया कि कोरोना महामारी के दौरान भी उन्होंने बिना किसी सुरक्षा या इंश्योरेंस के दिन-रात ड्यूटी की। कई बार ऑन-ड्यूटी घायल होने पर इलाज का खर्च खुद उठाना पड़ा। हाल ही में एक घटना में फायरमैन आकाश शर्मा का ड्यूटी के दौरान पैर टूट गया। अगर इंश्योरेंस होता तो इलाज की चिंता नहीं होती, लेकिन ठेका कर्मचारी होने के कारण पूरा खर्च खुद उठाना पड़ा। कुछ मामलों में इलाज पर 10 लाख रुपए तक का खर्च आया, जो कर्मचारियों की जेब से गया। कर्मचारियों को नहीं दिए जाते आईडी कार्ड मानसरोवर फायर स्टेशन पर कार्यरत मोहित जैसे कर्मचारियों का कहना है कि जब उन्होंने सुरक्षा उपकरणों और अपने अधिकारों की मांग की, तो उन्हें धमकी दी गई कि “कल से ड्यूटी पर मत आना।” आरोप है कि अगर कोई कर्मचारी 10 दिन की छुट्टी ले ले या अपनी बात रख दे, तो वर्षों की मेहनत एक झटके में खत्म कर दी जाती है। कई कर्मचारी 6 से 10 साल से काम कर रहे हैं, लेकिन उन्हें न आईडी कार्ड, न जॉइनिंग लेटर और न ही सैलरी स्लिप दी जाती है। इससे वे यह भी साबित नहीं कर सकते कि वे विभाग के कर्मचारी हैं। 10 सालों से एक ही ठेकेदार को दिया जा रहा टेंडर कर्मचारियों का आरोप है कि पिछले 10 सालों से एक ही ठेकेदार को टेंडर दिया जा रहा है, रेट नहीं बढ़ाए जा रहे और आवाज उठाने वालों पर कार्रवाई की जाती है। ड्राइवर भानु कुमार सैनी ने कहा, “न गाड़ियों का भरोसा है, न हमारी नौकरी का। रिकॉर्ड तक सही से नहीं रखा जाता, एक सादे कागज पर हाजिरी होती है। ठेका फायरमैन और ड्राइवरों की सरकार से मुख्य मांगें—
बिना हेलमेट, बिना इंश्योरेंस फ्रंटलाइन फायरमैन बेबस:₹330 में जान की बाज़ी: बिना इंश्योरेंस आग से लड़ रहे फायरमैन
Leave a comment