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स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को उत्तराखंड के बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलने से पहले होने वाली सबसे अहम रस्म के लिए निमंत्रण भेजा गया है। इन्हें बतौर शंकराचार्य बुलाया गया है। यह न्योता ऐसे समय भेजा गया है, जब शंकराचार्य और प्रयागराज माघ मेला प्रशासन के बीच विवाद चल रहा है। प्रशासन ने उनसे शंकराचार्य होने के सबूत मांगे थे। उन्होंने इसका जवाब भी दिया है। इसके बाद वह मेला छोड़कर काशी चले गए। शुक्रवार को उन्होंने सीएम योगी से हिंदू होने का सबूत मांगा। उन्हें 40 दिन का समय दिया है। श्री बद्रीनाथ डिमरी धार्मिक केंद्रीय पंचायत के अध्यक्ष पंडित आशुतोष डिमरी ने बताया- शंकराचार्य को यह न्योता 25 जनवरी को भेजा गया था। इसमें शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद से ऋषिकेश से बद्रीनाथ धाम तक निकलने वाली गाड़ू घड़ा यात्रा में शामिल होने की अपील की गई है।
गाड़ू घड़ा यात्रा बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलने से पहले निभाई जाने वाली प्रमुख परंपरा है। इसके साथ ही चारधाम यात्रा की औपचारिक शुरुआत मानी जाती है। भगवान बद्री विशाल के अभिषेक और अखंड ज्योति के लिए इस्तेमाल होने वाला तिल का तेल इसी यात्रा के जरिए धाम तक पहुंचाया जाता है।
गाड़ू घड़ा यात्रा क्या है? जानिए कब खुलेंगे कपाट, गाड़ू घड़ा यात्रा का पूरा रूट जानिए 23 अप्रैल को खुलेंगे बद्रीनाथ धाम के कपाट
पंडित आशुतोष डिमरी ने बताया कि इस साल बद्रीनाथ धाम के कपाट 23 अप्रैल को सुबह 6 बजकर 15 मिनट पर श्रद्धालुओं के लिए खोले जाएंगे। कपाट खुलने की तिथि बसंत पंचमी के दिन नरेंद्र नगर के राजमहल में परंपरा के अनुसार घोषित की गई थी। 7 अप्रैल को भरेगा गाड़ू घड़ा, 8 अप्रैल को पहुंचेगा ऋषिकेश
पंडित आशुतोष डिमरी के अनुसार, 7 अप्रैल को नरेंद्र नगर राजमहल में विधि-विधान के साथ भगवान बद्री विशाल के अभिषेक में इस्तेमाल होने वाला तिल का तेल पिरोया जाएगा। इसके बाद तेल को चांदी के कलश में भरकर गाड़ू घड़ा तैयार किया जाएगा। उसी दिन रात तक गाड़ू घड़ा टिहरी नरेश के राजदरबार से प्रस्थान करेगा। 8 अप्रैल को यह ऋषिकेश स्थित बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (बीकेटीसी) के विश्राम गृह पहुंचेगा, जहां इसे श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए रखा जाएगा।
न्योता भेजने वाली संस्था के बारे में जानिए
‘श्री बद्रीनाथ डिमरी धार्मिक केंद्रीय पंचायत’ बद्रीनाथ धाम से जुड़े डिमरी पुजारी समुदाय की एक प्रमुख धार्मिक संस्था है, जिसमें डिम्मर गांव के ब्राह्मण पुजारी शामिल हैं। यह पंचायत धार्मिक आयोजन, रस्म-रिवाज और पूजा-संबंधी निर्णयों को सामूहिक रूप से तय करने का काम करती है, विशेष रूप से कपाट खुलने, तेल कलश यात्रा, पूजाओं और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों के मामलों में। कौन हैं डिमरी ब्राह्मण, क्या है उनका इतिहास आदि गुरु शंकराचार्य से जुड़ा है उद्गम
डिमरी ब्राह्मणों का संबंध आदि गुरु शंकराचार्य की परंपरा से माना जाता है। मान्यता है कि जब शंकराचार्य ने भारत की चारों दिशाओं में चार धामों की स्थापना की, उसी समय उन्होंने यह व्यवस्था बनाई कि उत्तर भारत के प्रमुख मंदिरों में दक्षिण भारत के पुजारी और दक्षिण भारत के मंदिरों में उत्तर भारत के पुजारी सेवा करेंगे। इसी परंपरा के तहत बद्रीनाथ धाम में मुख्य पुजारी केरल के नंबूरी ब्राह्मण होते हैं, जिन्हें रावल कहा जाता है। दक्षिण भारत से गढ़वाल आए, डिम्मर गांव में बसे
डिमरी ब्राह्मण मूल रूप से द्रविड़ ब्राह्मण माने जाते हैं। ये कर्नाटक के संस्कृतिपूर्ण क्षेत्र से आदि गुरु शंकराचार्य के साथ सहायक अर्चक के रूप में गढ़वाल आए थे। बाद में वापस नहीं लौटे। ये चमोली जिले में कर्णप्रयाग के पास पट्टी तली चांदपुर के डिम्मर गांव में बस गए। गांव के नाम पर ही यह समुदाय डिमरी कहलाया। बद्रीनाथ की परंपराओं में आज भी अहम भूमिका
भगवान बद्रीनारायण की प्राचीन परंपराओं के निर्वहन में डिमरी ब्राह्मणों की महत्वपूर्ण भूमिका है। बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलने से पहले गाड़ू घड़ा यात्रा की शुरुआत डिमरी बारीदार ही करते हैं। बद्रीनाथ धाम में भगवान को भोग अर्पित करने का अधिकार भी डिमरी पंडितों को ही प्राप्त है। आज भी बद्रीनाथ धाम से जुड़ी कई प्रमुख धार्मिक रस्में डिमरी पंचायत के मार्गदर्शन में निभाई जाती हैं।
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