पुणे3 घंटे पहले
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जनरल चौहान ने पुणे में सदर्न कमांड की ओर से आयोजित सेमिनार को संबोधित किया।
चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल अनिल चौहान ने शुक्रवार को कहा कि आज की दुनिया में यह तय करना मुश्किल है कि आपके दोस्त कौन हैं, सहयोगी कौन हैं, विरोधी या दुश्मन कौन हैं।
जनरल चौहान पुणे में सदर्न कमांड की ओर से आयोजित जॉइंटनेस, आत्मनिर्भरता और इनोवेशन (JAI) सेमिनार में बोल रहे थे। इस दौरान उन्होंने कहा- परमानेंट दोस्ती या दुश्मनी को लेकर धारणाएं भरोसे के लायक नहीं रह गई हैं।
CDS चौहान ने कहा- आजकल रणनीतिक गठबंधन लचीले और लेन-देन पर निर्भर हो गए हैं। भारत को जरूरत पड़ने पर अकेले काम करने के लिए तैयार रहना होगा। यह तैयारी मानसिक, संरचनात्मक और भौतिक, तीनों ही स्तर पर होनी चाहिए।

CDS ने कहा- वैश्विक सुरक्षा माहौल बदल रहा
CDS ने कहा कि वैश्विक सुरक्षा वातावरण तेजी से बदल रहा है और इसमें अनिश्चितता बढ़ी है। उन्होंने ‘जबरन राष्ट्रवाद’ और ‘आर्थिक हथियारीकरण’ का जिक्र किया, जहां व्यापार, सप्लाई चेन, तकनीक तक पहुंच और अहम संसाधनों का इस्तेमाल रणनीतिक दबाव के औजार के रूप में किया जा रहा है।
जनरल चौहान ने कहा कि घोषित युद्ध अब कम होते जा रहे हैं। प्रतिस्पर्धा अब प्रॉक्सी, सीमित स्तर की कार्रवाइयों और साइबर गतिविधियों के जरिए सामने आ रही है। उन्होंने कहा कि संज्ञानात्मक और सूचना युद्ध अब एक प्रमुख रणक्षेत्र बन चुके हैं, जहां सेनाओं की बजाय समाजों को निशाना बनाया जा रहा है।
चौहान बोले- नेहरू चीन से अच्छे रिश्ते चाहते थे, इसलिए तिब्बत दे दिया
इससे पहले देहरादून के एक कार्यक्रम में CDS जनरल अनिल चौहान ने भारत और चीने के बीच पंचशील समझौता क्यों हुआ, इसकी वजह बताई है। इस समझौते के तहत भारत ने 1954 में तिब्बत को चीन का हिस्सा मान लिया था।
CDS ने कहा कि इस समझौते के बाद भारत को लगा कि उत्तरी सीमा के विवाद का निपटारा हो गया है, लेकिन चीन ने इसे केवल व्यापारिक समझौता माना। आजादी के बाद अंग्रेज चले गए, और असल में यह भारत को तय करना था कि फ्रंट कहां हो।
चौहान ने कहा- नेहरू शायद जानते थे कि हमारे पास कुछ है, क्योंकि मैकमोहन लाइन पूरब में थी और लद्दाख इलाके में हमारा किसी तरह का दावा था, लेकिन वह यहां नहीं था। इसलिए नेहरू पंचशील एग्रीमेंट करना चाहते थे।
जब उन्होंने तिब्बत को एक तरह से आजाद कर दिया था तो वे ल्हासा में चले गए थे। यह खास इलाका दोनों तरफ से बहुत मुश्किल था। इसलिए वे स्थिरता चाहते थे, शायद इसी खास इलाके में। आजाद भारत, चीन के साथ अच्छे रिश्ते बनाने का इच्छुक था। 1954 में भारत ने तिब्बत को चीन का हिस्सा माना। दोनों देशों ने पंचशील एग्रीमेंट पर साइन किए।
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