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यूपी में 26 दिनों में एक बच्चा चोरी हो रहा है। इस गैंग में ज्यादातर महिलाएं शामिल हैं। यूपी में पांच साल में 41623 बच्चे चोरी हुए हैं। जिसमें 39646 बरामद किए गए। वहीं 1977 बच्चे अभी तक गायब हैं। जिनका पुलिस अभी तक पता नहीं लगा पाई है। कानपुर पुलिस कमिश्नरेट में 1297 बच्चे चोरी हुए। जिसमें अभी भी 36 बच्चों का सुराग नहीं लग सका है। सबसे पहले पढ़िए कानपुर की बच्चा चोरी की 3 घटनाएं अब समझिए यूपी में बच्चा चोरी का आंकड़ा पूरे यूपी में वाराणसी कमिशनरेट टॉप पर है। यहां पांच साल में कुल 2936 बच्चे गायब हुए है। वहीं 79 बच्चों को अभी तक पता नहीं चला है। गाजियाबाद कमिशनरेट से 590 बच्चे गायब हुए है। 136 बच्चों का अभी तक पता नहीं चल पाया है। पुलिस केवल 454 बच्चों को बरामद कर पाई है। गोरखपुर, मथुरा, अयोध्या, गाजीपुर और बांदा बच्चा चोरी मामले में टॉप पर है। वहीं कानपुर जोन में कन्नौज से पांच साल में 704 बच्चे गायब हुए। जिसमें 656 बच्चे बरामद हो पाए। हालांकि भी तक 48 बच्चे अभी तक गायब हैं। अब समझिए क्यों चोरी हो रहे बच्चे भारत में हर 8 मिनट में एक बच्चा चोरी होता है। ऐसे में बच्चों की तस्करी और चोरी रोकना एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। यूपी चाइल्ड ट्रैफ़िकिंग मामले में टॉप पर है। गरीबी, बेरोजगारी होने की वजह से ये गैंग बच्चों को अपना निशाना बनाते हैं। अधिकतर बच्चा चोर गैंग के लोग बच्चों को धार्मिक शहर, मंदिर, रेलवे और बस स्टेशन और अस्पतालों से बच्चों को निशाना बनाते हैं। कई बार अस्पतालों के कर्मचारियों की मिलीभगत सामने आती रही है। इसके बाद ये लोग ऐसे लोगों को बच्चों को देते है। जिनके बच्चे नहीं होते हैं। यूपी में एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने अस्पताल से बच्चों की चोरी को लेकर भले ही इतनी गंभीर टिप्पणी की हो, लेकिन अस्पताल आजकल बच्चों की तस्करी के बड़े माध्यम बन चुके हैं। यह किसी से छिपा नहीं है। अस्पतालों में इन अपराधों के लिए छोटे-मोटे गिरोह नहीं, बल्कि कई बार अस्पताल प्रशासन तक की भूमिका रहती है। उससे भी गंभीर बात ये है कि कई बार अभिभावक भी पैसों के लालच में बाल तस्करी में शामिल हो जाते हैं।
कानून बनने के बाद ही ऐसी घटनाएं रुकेंगी लखनऊ के लॉ कॉलेज के प्रोफेसर अब्दुल हफीज गांधी बताते हैं कि भारत में बाल तस्करी के लिए अलग से कोई कानून ना होना भी इस समस्या को रोक पाने में बाधक है। अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम जैसे कानून हैं, लेकिन ये केवल वेश्यावृत्ति पर केंद्रित हैं। इसके अलावा किशोर न्याय अधिनियम और बंधुआ मजदूरी प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम उपलब्ध जरूर हैं लेकिन अपर्याप्त हैं। गृह मंत्रालय बाल तस्करी से संबंधित दिशानिर्देश तो जारी करता है लेकिन उस पर अमल करने का काम राज्य सरकार का है। यूपी में इन दिशा-निर्देशों का कैसा पालन हो रहा है ये आंकड़ों और सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी से स्पष्ट है। जब तक एक अलग कानून और जिम्मेदारी नहीं तय की जाएगी। इस श्राप से मुक्ति नहीं मिलेगी। ———————————-
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