नई दिल्ली23 मिनट पहले
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सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्र सरकार से कहा कि वह पेटरनिटी लीव (पितृत्व अवकाश) को सोशल सिक्योरिटी बेनिफिट(सामाजिक सुरक्षा लाभ) के रूप में मान्यता देने के लिए कानून बनाए।
कोर्ट ने कहा कि इस अवकाश की अवधि ऐसी होनी चाहिए जो माता-पिता और बच्चे दोनों की जरूरतों के अनुसार तय की जाए।
जस्टिस जे बी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच यह बात उस मामले की सुनवाई के दौरान कही, जिसमें इस सोशल सिक्योरिटी कोड की उस धारा को चुनौती दी गई थी जिसमें गोद लेने वाली मां को तभी मातृत्व अवकाश मिलेगा जब बच्चा 3 महीने से कम उम्र का हो। हमसानंदिनी नंदूरी ने इसे लेकर जनहित याचिका दाखिल की थी जिसमें कहा गया था कि उम्र आधारित प्रतिबंध मनमाना और संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।
कोर्ट ने कहा
सोशल सिक्योरिटी कोड, 2020 की धारा 60(4), जो गोद लेने वाली मां को केवल 3 महीने से कम उम्र के बच्चे पर 12 हफ्ते की मेटरनिटी लीव (मातृत्व अवकाश) देती है, असंवैधानिक है।

कोर्ट ने इस प्रावधान को संशोधित करते हुए कहा कि जो महिला कानूनी रूप से बच्चे को गोद लेती है, उसे बच्चे की उम्र चाहे कुछ भी हो, 12 महीने की मेटरनिटी लीव मिलेगी।
पेटरनिटी लीव क्या है
पेटरनिटी लीव वह समय होता है जो बच्चे के जन्म या गोद लेने के बाद पिता को दिया जाता है, ताकि वह बच्चे की देखभाल कर सके और मां का सहयोग कर सके।
यह विचार इस समझ पर आधारित है कि बच्चे की परवरिश माता-पिता दोनों की जिम्मेदारी होती है।
इससे महिलाओं को भी काम जारी रखने में मदद मिलती है और घर के कामों का संतुलित बंटवारा होता है।
भारत में अभी पेटरनिटी लीव को कानूनन मान्यता नहीं
भारत में अभी तक पेटरनिटी लीव को कानूनन मान्यता नहीं मिली है। हालांकि महिलाओं को मेटरनिटी लीव मिलती है।
- पहले दो बच्चों तक: 26 हफ्ते का वेतन सहित अवकाश
- दो से अधिक बच्चों पर: 12 हफ्ते का अवकाश
- इसमें से 8 हफ्ते डिलीवरी से पहले लिए जा सकते हैं
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