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14 घंटे पहले

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आज (31 मार्च) भगवान महावीर की जयंती है। महावीर स्वामी के विचार और उनसे जुड़े किस्सों में छिपे सूत्रों को जीवन में उतार लेने से हमारी सभी समस्याएं दूर हो सकती हैं। महावीर जयंती के अवसर पर पढ़िए उनसे जुड़े 3 प्रेरक किस्से…

पहला किस्सा- सफलता केवल ज्ञान से नहीं, बल्कि अपनी बुराइयों पर विजय पाने से मिलती है

एक दिन महावीर स्वामी अपने शिष्यों के साथ बैठे थे। शिष्यों ने जीवन के बारे में प्रश्न पूछे। एक शिष्य ने पूछा, “स्वामी जी, ऐसा क्या है जिससे कोई व्यक्ति बर्बाद हो सकता है?”

महावीर स्वामी मुस्कुराए और सभी शिष्यों से जवाब मांगने लगे। शिष्यों ने कहा, “अहंकार, कामवासना, लालच और क्रोध जैसी बुराइयां हमें बर्बाद कर देती हैं।”

स्वामी जी ने सबकी बातें ध्यान से सुनी और फिर एक कमंडल उठाया। उन्होंने पूछा, “अगर हम इसे नदी में छोड़ दें तो क्या ये डूब जाएगा?”

शिष्यों ने कहा, “अगर कमंडल का आकार सही है तो यह डूबेगा नहीं।”

स्वामी जी ने फिर पूछा, “अगर इसमें एक छोटा सा छेद हो जाए तो क्या होगा?”

शिष्यों ने उत्तर दिया, “छेद के कारण कमंडल डूब जाएगा। अगर छेद छोटा होगा तो धीरे-धीरे और बड़ा होगा तो जल्दी डूब जाएगा।”

महावीर स्वामी ने समझाया, “देखो, हमारा शरीर भी इस कमंडल की तरह है और बुराइयां उसमें छेद की तरह हैं। छोटी सी भी बुरी आदत, चाहे वह कामवासना, क्रोध, अहंकार, मोह, लालच, नशा या ईर्ष्या हो, हमारे जीवन को डुबो सकती है। जैसे कमंडल का छोटा छेद भी उसे डुबो देता है, वैसे ही छोटी बुराई भी व्यक्ति को बर्बाद कर सकती है। इसलिए जीवन में आने वाली हर बुराई को तुरंत छोड़ना चाहिए। जो व्यक्ति अपनी आदतों को नियंत्रित करता है और बुराइयों से दूर रहता है, वही सच्चा सुख पा सकता है।”

महावीर स्वामी के इस उदाहरण से सभी शिष्यों ने समझा कि जीवन में सफलता केवल ज्ञान से नहीं, बल्कि अपनी बुराइयों पर विजय पाने से मिलती है।

किस्से की सीख

  • आत्म-संयम विकसित करें – क्रोध, लालच और मोह को नियंत्रित करना सीखें।
  • सकारात्मक आदतें अपनाएं – ध्यान, प्रार्थना, योग और अध्ययन से मन शांत होता है।
  • छोटी बुराइयों की पहचान करें – नशा, झूठ, अहंकार जैसी आदतें भी समय से पहले रोकें।
  • सकारात्मक संगति चुनें – अच्छे और विद्वान लोगों के साथ समय बिताएं।
  • सकारात्मक सोच अपनाएं – नकारात्मक भावनाओं को पोषण न दें, विचारों में सकारात्मकता बनाए रखें।
  • आत्म-निरीक्षण करें – रोज अपने कामों और आदतों की समीक्षा करें। जो बातें गलत हैं, उन्हें सुधारें।
  • धीरे-धीरे सुधारें – बुरी आदतें तुरंत नहीं जातीं, लेकिन नियमित प्रयास से बुरी आदतों को छोड़ा जा सकता है।

दूसरा किस्सा – दूसरों की गलतियों को क्षमा करें, धैर्य रखें

एक दिन महावीर स्वामी किसी गांव के बाहर जंगल में ध्यान कर रहे थे। वे शांत और अपने ध्यान में मग्न थे। तभी कुछ अशिक्षित गांववाले अपनी गायों को चराने जंगल में आए। उन्होंने ध्यान में बैठे महावीर स्वामी को एक सामान्य इंसान समझा और उनके साथ मजाक-मस्ती करने लगे।

चरवाहों ने स्वामी जी को परेशान किया, लेकिन स्वामी का ध्यान बिल्कुल भी नहीं टूटा। वे अपनी साधना में मग्न थे।

गांव के कुछ विद्वान लोगों को इस बारे में मालूम हुआ, तो वे तुरंत स्वामी जी के पास पहुंचे। वे जानते थे कि यह महावीर स्वामी हैं। उन्होंने चरवाहों की हरकत के लिए क्षमा मांगी। स्वामी जी ने आंखें खोलीं और सभी की बातें ध्यान से सुनीं।

विद्वानों ने कहा, “स्वामी जी, हम आपके लिए जंगल में एक कमरा बनवा देंगे, जिससे आपकी साधना में कोई बाधा न आए।”

महावीर स्वामी ने मुस्कुराते हुए कहा, “ये सभी चरवाहे भी मेरे अपने ही हैं। बच्चे नादानी में अपने माता-पिता का मुंह नोचते हैं, मारते हैं, फिर भी माता-पिता नाराज नहीं होते। मैं इन चरवाहों से नाराज नहीं हूं। मुझे कमरे की आवश्यकता नहीं है। आप जो धन कमरे में लगाने की सोच रहे हैं, उसे जरूरतमंदों की भलाई में खर्च करें। यही मेरे लिए सबसे अच्छा होगा।”

महावीर स्वामी ने सभी को संदेश दिया कि दूसरों की गलती पर प्रतिक्रिया देने के बजाय धैर्य और करुणा से काम लेना चाहिए।

किस्से की सीख

  • धैर्य रखें – दूसरों की गलती पर तुरंत प्रतिक्रिया न दें। शांत मन से सोचें।
  • क्षमा करने का अभ्यास करें – दूसरों की नादानी और भूलों को समझें, नाराज न हों, उन्हें क्षमा करें।
  • अपनी ऊर्जा सकारात्मक दिशा में लगाएं – विवाद और गुस्से से बचें, अपनी ऊर्जा समाज सेवा और दूसरों की मदद में लगाएं।
  • अन्याय पर प्रतिक्रिया सोच-समझकर दें – जैसे महावीर स्वामी ने चरवाहों के लिए अपनाई। दूसरों गलतियों को क्षमा करें और शांत रहें।
  • विनम्रता बनाए रखें – महावीर स्वामी ने विनम्रता बनाए रखी और गांव के लोगों से दूसरों दूसरों की भलाई में धन लगाने का निवदेन किया।
  • साधना और आत्म-नियंत्रण – मन को स्थिर रखें, बाहरी परेशानियों से विचलित न हों।

तीसरा किस्सा- अहंकार को छोड़ने से जीवन में आती है शांति

एक राजा महावीर स्वामी के दर्शन करने आया करता था। वह घमंडी था। हर बार जब राजा स्वामी जी के पास जाता, वह अपने साथ सोने-चांदी, रत्न और कीमती चीजें लेकर आता था।

महावीर स्वामी हमेशा मुस्कुराते और कहते, “राजन्, इन्हें गिरा दो।” राजा हर बार स्वामी जी की बात मानकर सभी बहुमूल्य चीजें वहीं गिरा देता, लेकिन धीरे-धीरे राजा को स्वामी जी की यह आदत बुरी लगने लगी। उसने सोचा, “एक न एक दिन स्वामी जी मेरे उपहार स्वीकार जरूर करेंगे।”

राजा ने अपने मंत्री से सलाह ली। मंत्री ने कहा, “राजन्, इस बार आप केवल फूल लेकर जाएं।” राजा ने फूल स्वामी जी के सामने रखे, फिर भी महावीर स्वामी ने कहा, “इन्हें गिरा दो।” राजा निराश होकर फूल वहीं छोड़कर लौट गया।

मंत्री ने अगली बार कहा, “राजन्, आप खाली हाथ जाएं।” अगले दिन राजा बिना किसी चीज के स्वामी जी के सामने पहुंचा।

राजा ने कहा, “स्वामी जी, मैं कई बार आपके लिए कीमती चीजें लाया, फिर भी आप हर बार उन्हें गिराने को कहते रहे। अब मैं खाली हाथ आया हूं, अब आप क्या कहेंगे?”

महावीर स्वामी ने मुस्कान के साथ कहा, “राजन्, अब खुद को गिरा दो।”

राजा समझ गया कि स्वामी का मतलब उसका अहंकार गिराने से था। उसने प्रणाम किया और अहंकार छोड़ने का संकल्प लिया।

स्वामी जी ने राजा को संदेश दिया कि धन या सम्मान से अधिक महत्वपूर्ण है अहंकार पर विजय पाना। केवल बाहरी वस्तुओं को त्यागने से नहीं, बल्कि अपने अहंकार को छोड़ने से जीवन में शांति और सच्ची सफलता आती है।

किस्से की सीख

  • स्वयं की समीक्षा करें – अपने व्यवहार और सोच में अहंकार की पहचान करें।
  • सादगी अपनाएं – भौतिक वस्तुओं या पदोन्नति से लगाव न रखें। सादगी को अपनाएं।
  • विनम्रता बनाए रखें – दूसरों के योगदान और ज्ञान को महत्व दें, अपनी चीजों के लिए अहंकार न करें, विनम्र रहें।
  • नकारात्मक भावनाओं से दूर रहें – घमंड, जलन और तुलना करने से मनोबल गिराता है, इन बुराइयों से दूर रहें।
  • छोटी-छोटी चीजें छोड़ना सीखें – महावीर स्वामी की तरह पहले भौतिक चीजें, फिर अहंकार को त्यागें, तभी जीवन में शांति मिल सकती है।
  • सकारात्मक मार्गदर्शन लें – विद्वान या गुरु से सीखकर अपनी बुराइयां दूर करें और सकारात्मक रहें।

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