कूड़े के पहाड़ पर बना राप्ती इको पार्क, देखें VIDEO:'वेस्ट टू वंडर थीम' पर आधारित, जानिए पार्क की खासियत

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गोरखपुर में जिस जगह को कभी कूड़े का पहाड़ कहा जाता था, आज वही इलाका एक खूबसूरत इको पार्क में बदल गया है। राप्ती नदी के किनारे एकला बांध पर करीब 40 एकड़ जमीन पर बने ‘राप्ती इको पार्क’ का उद्घाटन गुरुवार को मुख्यमंत्री ने किया और इसे आम लोगों के लिए खोल दिया गया। लगभग 5 करोड़ रुपये की लागत से तैयार यह पार्क अब शहरवासियों के लिए एक नया घूमने-फिरने और पिकनिक का आकर्षक केंद्र बन गया है, जहां लोग अपने परिवार, बच्चों और दोस्तों के साथ समय बिता सकते हैं। पार्क की खासियत: वेस्ट टू वंडर पार्क: जिसमें कचरे से मोर, शेर, जिराफ और पेड़-पौधों की आकर्षक आकृतियां बनाई गई हैं। बच्चों के लिए खास किड्स जोन: जहां झूले, बैठने की कुर्सियां और सजावट की चीजें भी वेस्ट मटेरियल से तैयार की गई हैं। पार्क के बीचों-बीच योग स्थल: जहां लोग सुबह-शाम प्रकृति के बीच योग कर सकते हैं; इसका छप्पर बांस से बना है, जो ठंडक देता है। पर्यटकों के लिए पैडल बोटिंग: जहां परिवार और दोस्त मिलकर बोटिंग का आनंद ले सकते हैं। कैंटीन की सुविधा: एंट्री पॉइंट पर खाने-पीने के लिए कैंटीन की व्यवस्था। शौचालय की सुविधा: साफ-सफाई के लिए शौचालय की सुविधा। वाटिका का संगम: अलग अलग वाटिका देखने को मिलेगा हरियाली से भरपूर सुंदर वाटिका, जो पार्क की खूबसूरती को और बढ़ाती है। इस पार्क की सबसे खास बात यह है कि यहां ‘वेस्ट टू वंडर’ थीम पर कई आकर्षण तैयार किए गए हैं। कूड़े और बेकार सामग्री से मोर, शेर, जिराफ और पेड़-पौधों जैसी आकृतियां बनाई गई हैं, जो देखने में बेहद आकर्षक लगती हैं। बच्चों के लिए अलग से किड्स जोन बनाया गया है, जहां झूले, बैठने की कुर्सियां और प्लांट पॉट तक वेस्ट मटेरियल से तैयार किए गए हैं। पार्क के बीचों-बीच एक सुंदर योग स्थल भी बनाया गया है, जहां लोग खुले वातावरण में सुबह-शाम योग कर सकेंगे। इस योग स्थल का छप्पर खासतौर पर असम के कारीगरों ने बांस से तैयार किया है, जो गर्मी में भी ठंडक का एहसास देता है। इसके अलावा पर्यटकों के लिए पैडल बोटिंग की सुविधा भी दी जाएगी, जिससे लोग नदी किनारे का आनंद ले सकें। सुविधाओं की बात करें तो पार्क के प्रवेश द्वार पर खाने-पीने के लिए कैंटीन बनाई गई है। साथ ही पर्यटकों के लिए शौचालय की भी व्यवस्था की गई है। पूरे पार्क में हरियाली से भरपूर एक वाटिका विकसित की गई है, जो इसे और भी खूबसूरत बनाती है। पहले था कूड़ा का पहाड़ अगर पुराने समय की बात करें तो यह इलाका कूड़े के बड़े-बड़े ढेरों से घिरा हुआ था। इससे राप्ती नदी और आसपास का भूजल प्रदूषित हो रहा था। साथ ही मिथेन गैस के कारण अक्सर आग लगने और दुर्गंध की समस्या बनी रहती थी, जिससे लोगों के स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ता था। नगर निगम ने इस समस्या को खत्म करने के लिए वैज्ञानिक तरीके से काम किया। करीब 9 करोड़ रुपये खर्च कर 2.26 लाख मीट्रिक टन पुराने कचरे का बायो-रेमेडिएशन के जरिए निस्तारण किया गया। इस अभियान से लगभग 40 एकड़ जमीन को कचरे से मुक्त कराया गया।

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