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समुद्र तल से करीब 15,200 फीट की ऊंचाई पर स्थित श्री हेमकुंड साहिब आज सिख समुदाय के सबसे पवित्र तीर्थस्थलों में गिना जाता है। हर साल हजारों श्रद्धालु दुर्गम पहाड़ी रास्तों को पार कर यहां पहुंचते हैं। इस साल यात्रा शुरू होने के बाद अब तक 26,500 से ज्यादा श्रद्धालु हेमकुंड साहिब पहुंच चुके हैं। लेकिन एक समय ऐसा भी था जब इस पवित्र स्थल का जिक्र तो धार्मिक ग्रंथों में मिलता था, मगर इसकी वास्तविक लोकेशन किसी को पता नहीं थी। श्रद्धालु जानते थे कि गुरु गोबिंद सिंह ने अपने पूर्व जन्म की तपस्या का वर्णन एक बर्फानी कुंड और सात चोटियों से घिरे स्थान के रूप में किया है, लेकिन वह स्थान हिमालय में आखिर कहां है, यह रहस्य बना हुआ था। करीब एक सदी तक चली खोज, धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन, दुर्गम हिमालयी यात्राओं और कुछ लोगों के अदम्य साहस के बाद 1934 में उस स्थान की पहचान हुई, जिसे आज दुनिया श्री हेमकुंड साहिब के नाम से जानती है। बचित्र नाटक में मिला था हेमकुंड का पहला संकेत हेमकुंड साहिब की कहानी सिखों के दसवें गुरु श्री गुरु गोबिंद सिंह की रचना ‘बचित्र नाटक’ से शुरू होती है। इसमें गुरु साहिब ने अपने पूर्व जन्म का उल्लेख करते हुए एक ऐसे तपस्थल का वर्णन किया है, जो ‘सप्त श्रृंग’ यानी सात पर्वत चोटियों से घिरा हुआ था। वर्णन में एक बर्फानी कुंड और तपस्या का उल्लेख भी मिलता है। इसी विवरण ने बाद की पीढ़ियों में उस स्थान को खोजने की जिज्ञासा पैदा की। हालांकि उस समय न तो सटीक भौगोलिक जानकारी उपलब्ध थी और न ही ऐसा कोई प्रमाण, जिससे इस स्थान की पहचान की जा सके। इसलिए यह रहस्य लंबे समय तक बना रहा। 1884 में पहली बार लोकपाल झील पर गया ध्यान उन्नीसवीं सदी के अंत में इस रहस्य की खोज को पहली दिशा मिली। वर्ष 1884 में विद्वान पंडित तारा सिंह नरोत्तम ने विभिन्न धार्मिक स्रोतों का अध्ययन किया और अपनी पुस्तक ‘श्री गुर तीरथ संग्रह’ में बद्रीनाथ क्षेत्र के पास स्थित लोकपाल झील को गुरु साहिब के वर्णित तपस्थल से जोड़ने का प्रयास किया। उस समय यह इलाका बेहद दुर्गम था। न सड़कें थीं, न यात्रा की आधुनिक सुविधाएं। इसलिए उनके दावे की पुष्टि करना आसान नहीं था। परिणामस्वरूप यह विचार सामने तो आया, लेकिन स्थान की पहचान फिर भी व्यापक रूप से स्थापित नहीं हो सकी। एक किताब ने बदली खोज की दिशा वर्ष 1929 में प्रसिद्ध सिख विद्वान भाई वीर सिंह ने ‘श्री कलगीधर चमत्कार’ प्रकाशित की। पुस्तक में हेमकुंड के बारे में दिए गए विस्तृत वर्णन ने कई लोगों का ध्यान आकर्षित किया। इसी पुस्तक ने टिहरी गढ़वाल क्षेत्र में सेवा कर रहे संत सोहन सिंह को भी प्रभावित किया। पुस्तक पढ़ने के बाद उन्होंने उस स्थान को खोजने का संकल्प लिया, जिसका उल्लेख गुरु गोबिंद सिंह की रचनाओं में मिलता है। रिटायर्ड फौजी ने खोज निकाला सदियों पुराना रहस्य संत सोहन सिंह ने 1933 में हिमालय के दुर्गम क्षेत्रों की यात्रा शुरू की। उस दौर में न आधुनिक ट्रेकिंग उपकरण थे और न ही विस्तृत नक्शे। स्थानीय भोटिया समुदाय के लोगों से जानकारी लेते हुए उन्होंने लोकपाल झील तक पहुंचने का प्रयास जारी रखा। वर्ष 1934 में एक कठिन चढ़ाई के बाद वे उस झील तक पहुंचे, जिसके चारों ओर सात प्रमुख पर्वत चोटियां दिखाई देती थीं। धार्मिक ग्रंथों में वर्णित संकेतों और भौगोलिक स्थिति के आधार पर उन्होंने इसे ही गुरु गोबिंद सिंह के तपस्थल के रूप में पहचाना। इसी खोज के साथ हेमकुंड साहिब पहली बार व्यापक रूप से दुनिया के सामने आया। 15 हजार फीट की ऊंचाई पर ऐसे बना पहला गुरुद्वारा स्थल की पहचान के बाद अगली चुनौती वहां श्रद्धालुओं के लिए धार्मिक संरचना तैयार करना था। संत सोहन सिंह ने अपनी खोज की जानकारी भाई वीर सिंह को दी। बताया जाता है कि भाई वीर सिंह ने इस प्रयास को समर्थन देते हुए गुरुद्वारा निर्माण के लिए आर्थिक सहायता भी उपलब्ध कराई। बाद में ब्रिटिश भारतीय सेना की इंजीनियरिंग इकाई बंगाल सैपर्स से जुड़े हवलदार मोदन सिंह भी इस अभियान से जुड़ गए। सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों के बीच वर्ष 1936 में झील के किनारे पत्थरों से एक छोटा गुरुद्वारा बनाया गया। वर्ष 1937 में पहली बार वहां श्री गुरु ग्रंथ साहिब का प्रकाश हुआ और इसके साथ ही हेमकुंड साहिब तीर्थयात्रा का संगठित स्वरूप विकसित होने लगा। आज भी आसान नहीं है हेमकुंड पहुंचना तकनीक और सड़क संपर्क बेहतर होने के बावजूद हेमकुंड साहिब की यात्रा आज भी उत्तराखंड की सबसे चुनौतीपूर्ण धार्मिक यात्राओं में मानी जाती है। यात्री पहले बाय सड़क ऋषिकेश होते हुए चमोली के गोविंदघाट पहुंचते हैं। यहां से करीब 13 किलोमीटर दूर घांघरिया तक पैदल, घोड़े या अन्य उपलब्ध सुविधाओं से पहुंचा जाता है। इसके बाद हेमकुंड साहिब तक लगभग 6 किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई करनी पड़ती है। ऊंचाई, मौसम में अचानक बदलाव और कम ऑक्सीजन के कारण यात्रियों को विशेष सावधानी बरतनी होती है। यही कारण है कि हर साल यात्रा शुरू होने से पहले मार्गों की मरम्मत, सुरक्षा व्यवस्था और चिकित्सा सुविधाओं पर विशेष ध्यान दिया जाता है। आज आस्था का बड़ा केंद्र है हेमकुंड साहिब जिस स्थान की पहचान करने में दशकों का समय लगा और जहां तक पहुंचना कभी असंभव माना जाता था, वही हेमकुंड साहिब आज दुनिया भर के श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बन चुका है। हाल ही में हुई बर्फबारी के बीच भी श्रद्धालुओं का उत्साह कम नहीं हुआ। यात्रा शुरू होने के बाद अब तक 26,587 से अधिक श्रद्धालु यहां पहुंच चुके हैं। हिमालय की ऊंचाइयों में स्थित यह तीर्थ केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि विश्वास, खोज और समर्पण की उस कहानी का प्रतीक भी है, जिसने एक सदी पुराने रहस्य को दुनिया के सामने ला खड़ा किया। ——————- ये खबर भी पढ़ें… उत्तराखंड के 200 गांव बद्रीनाथ धाम को देते थे टैक्स:राजा को भी मंदिर से लेना पड़ा कर्ज, तिब्बत से लामा भेजते थे चाय-गाय इस साल महज 13 दिनों में 1.15 लाख से ज्यादा लोग बद्रीनारायण के दर्शन कर चुके हैं। लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब बद्रीनाथ की यात्रा में करीब एक महीने का वक्त लगता था। सिर्फ 90 साल पहले की बात करें तो देवप्रयाग तक भी सड़क नहीं थी, ऋषिकेश से ही यात्रा पैदल शुरू करनी होती थी। हालांकि तब भी हर साल 50-60 हजार लोग इस पवित्र धाम के दर्शन करने आते थे। (पढ़ें पूरी खबर)
उत्तराखंड के बर्फीले पहाड़ों में छिपी थी गुरु की तपस्थली:एक ग्रंथ, एक फौजी और 100 साल की खोज से मिला हेमकुंड साहिब
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