15th June last day of jyeshtha adhikmas, rituals about jyeshtha adhikmas, vishnu puja vidhi

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13 घंटे पहले

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अभी ज्येष्ठ अधिकमास चल रहा है और ये महीना 15 जून को अमावस्या के साथ खत्म हो रहा है, इसके ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष शुरू हो जाएगा। अधिकमास की अमावस्या तिथियों की घट-बढ़ की वजह से 14 और 15 जून दो दिन रहेगी।

हिन्दी पंचांग के अनुसार अमावस्या तिथि 14 जून की दोपहर करीब 12.20 बजे शुरू होगी और 15 जून की सुबह करीब 8:25 बजे खत्म होगी। उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के मुताबिक, पितरों की शांति के लिए अमावस्या की दोपहर में धूप-ध्यान, तर्पण और दान-पुण्य करना चाहिए। इस तिथि पर गंगा, यमुना, नर्मदा, शिप्रा जैसी पवित्र नदियों में स्नान करने की परंपरा है। 14 तारीख की दोपहर में यह तिथि शुरू होगी, इसलिए अमावस्या का नदी स्नान 15 जून की सुबह कर सकते हैं।

अधिकमास को भगवान विष्णु का प्रिय मास माना गया है और इस महीने के अंतिम तिथि यानी अमावस्या का महत्व काफी अधिक है। इस दिन किए गए जप, तप, दान और व्रत का कई गुना फल मिलता है।

15 जून को सोमवती अमावस्या का शुभ योग

अमावस्या तिथि 14 जून की दोपहर शुरू होगी और 15 जून की सुबह तक रहेगी। इसलिए 15 जून को सूर्योदय अमावस्या तिथि में ही होगा, इसलिए इस दिन सोमवती अमावस्या का योग बन रहा है। जब सोमवार को यह तिथि पड़ती है, तो उसे सोमवती अमावस कहते हैं। अमावस्या पर सुबह सूर्योदय के समय पवित्र नदी, सरोवर या घर में गंगाजल मिश्रित जल से स्नान करने की परंपरा है। स्नान के बाद घर के मंदिर में देवी-देवताओं की विधिवत पूजा करनी चाहिए। दोपहर में पितरों के लिए तिल, जल और कुश से तर्पण किया जाता है। जरूरतमंदों और गौसेवा के लिए धन का दान दिया जाता है।

अमावस्या पर करें शिव-पार्वती की पूजा

सोमवती अमावस्या पर भगवान शिव और माता पार्वती की विशेष पूजा करने से घर-परिवार में सुख-समृद्धि और आरोग्य बना रहता है। ऐसी मान्यता है। सुबह जल्दी उठें और स्नान के बाद घर के मंदिर में शिव-पार्वती की पूजा करने का संकल्प लें। सबसे पहले भगवान गणेश का पूजन करें। इसके बाद शिवलिंग और माता पार्वती की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। दीपक जलाएं, जल, चावल, फूल, बिल्वपत्र और फल अर्पित करें। ॐ नमः शिवाय और ॐ पार्वत्यै नमः मंत्र का जप करें। माता पार्वती को सुहाग सामग्री या लाल फूल अर्पित करें। कर्पूर जलाकर आरती करें। पूजा के अंत में जानी-अनजानी गलतियों के लिए क्षमा मांगें। पूजा के बाद प्रसाद बांटें और खुद भी लें।

ऐसे करें विष्णु-लक्ष्मी की पूजा

गणेश पूजा के बाद भगवान विष्णु और महालक्ष्मी की पूजा शुरू करें। भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। दीपक और धूप जलाएं। भगवान विष्णु को तुलसी, पीले फूल और मौसमी फल अर्पित करें। माता लक्ष्मी को कमल, सुगंधित पुष्प चढ़ाएं। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय और ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः मंत्र का जप करें। कर्पूर जलाकर आरती करें। अंत में पूजा में हुई गलतियों के लिए क्षमा याचना करें। इसके बाद प्रसाद वितरित करें।

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