जगन्नाथ रथयात्रा:87 दिन में 220 कारीगर बनाते हैं तीन रथ, यात्रा के बाद 3 लाख तक बिकता है एक पहिया

Actionpunjab
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ओडिशा के पुरी में आज भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा निकाली जा रही है। भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ अलग-अलग रथों में सवार होकर गुंडिचा मंदिर पहुंचेंगे। लोक परंपरा में गुंडिचा मंदिर को भगवान की मौसी का घर कहा जाता है। तीनों देवता गुंडिचा मंदिर में सात दिन रहेंगे। 24 जुलाई को बहुड़ा यात्रा से मुख्य मंदिर लौटेंगे। इसके बाद भगवान दो दिनों तक मंदिर के बाहर रथ पर ही रहेंगे और 27 को मंदिर में प्रवेश करेंगे। कुछ दिन बाद मंदिर प्रशासन रथों को खोलने की तारीख तय करेगा। तब रथ के कुछ हिस्से बेचे जाएंगे। 2025 में भगवान जगन्नाथ के रथ के एक पहिए की न्यूनतम कीमत 3 लाख रुपए थी। बलभद्र के रथ के पहिए की कीमत 2 लाख और सुभद्रा के रथ के पहिए की 1.5 लाख रुपए रखी गई थी। वसंत पंचमी पर लकड़ियों की पूजा, रामनवमी पर लट्ठों की चिराई और अक्षय तृतीया से रथ बनने शुरू होते हैं रथ बनाने के लिए ओडिशा वन विभाग मंदिर को बिना कीमत लकड़ियां देता है। सरकारी रिकॉर्ड के हिसाब से 13 तरह के पेड़ों की लकड़ियों से रथ बनते हैं। इनमें फासी, धौरा, आसन, मोई, सिमिली, साल, गम्भारी, कदंब और देवदारु समेत अन्य प्रजातियां होती हैं। भविष्य में रथ बनाने के लिए जरूरी लकड़ियों की कमी न हो, इसलिए ओडिशा सरकार जंगल प्रोजेक्ट भी चला रही है। बसंत पंचमी पर लकड़ियों की पूजा होती है। इसके बाद रामनवमी पर पूजा के बाद तीन धौरा लट्ठों की चिराई से काम शुरू होता है। नक्शे के बजाय पीढ़ियों पुरानी माप से रथ बनते हैं, खास छड़ी और रस्सी से नापते हैं हर हिस्सा कारीगर पहले पहिए बनाते हैं। इसके बाद नीचे से ऊपर की ओर रथ का ढांचा खड़ा करते हैं। नाप के लिए आधुनिक फीते के साथ पीढ़ियों से चली आ रही करीब 20 इंच की खास छड़ी और रस्सी का इस्तेमाल होता है। हर साल तय डिजाइन और पुराने अनुपात के हिसाब से रथ बनते हैं। इसके लिए किसी बड़े इंजीनियरिंग नक्शे की जरूरत नहीं होती। इन सेवाओं से जुड़ा ज्ञान पीढ़ियों से तय परिवारों में आगे बढ़ता है। नई पीढ़ी रथखला में बड़े कारीगरों के साथ काम करके यह हुनर सीखती है। तीनों रथ तैयार होने के बाद सरकारी इंजीनियर उनकी अंतिम सुरक्षा जांच करते हैं। वे पहियों, धुरी, लकड़ी के जोड़ और पूरे ढांचे को देखते हैं। फिटनेस प्रमाणपत्र मिलने के बाद ही रथों को यात्रा के लिए तैयार माना जाता है। यात्रा में रथ तीन रहते हैं, लेकिन उनमें प्रतिमाएं चार होती हैं रथयात्रा में भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के अलावा भगवान सुदर्शन (चक्र) की भी मूर्ति होती हैं। रथयात्रा वाले दिन देवताओं को मंदिर से बाहर आगे-पीछे झुलाते हुए रथों तक ले जाते हैं। इस परंपरा को पहांडी कहते हैं। सबसे पहले भगवान सुदर्शन मंदिर से बाहर आते हैं। फिर बलभद्र, सुभद्रा और आखिर में भगवान जगन्नाथ आते हैं। इसके बाद पुरी के गजपति महाराज सोने की झाड़ू से तीनों रथ साफ करते हैं और सुगंधित जल छिड़कते हैं। इस सेवा को छेरा–पहरा कहते हैं। गजपति महाराज मंदिर के सबसे बड़े सेवक माने जाते हैं। यात्रा में सबसे आगे बलभद्र का रथ चलता है। फिर सुभद्रा का और आखिरी में भगवान जगन्नाथ का रथ होता है। हजारों लोग मोटी रस्सियों से रथों को करीब दो किलोमीटर खींचकर गुंडिचा मंदिर तक ले जाते हैं। यात्रा के बाद 3 लाख रुपये तक बिकता है एक पहिया, लगभग 20 दिनों में खुल जाते हैं तीनों रथ रथयात्रा पूरी होने के बाद सिंहद्वार के सामने बड़ा डंडा पर खड़े रथ तुरंत नहीं खोले जाते। इसकी तारीख मंदिर प्रशासन तय करता है और पारंपरिक भोई सेवक यह काम करते हैं। सबसे पहले रथों में लगे लकड़ी के घोड़े, सारथी और रथ के चारों ओर लगी देवी-देवताओं की मूर्तियां उतारकर सुरक्षित रखी जाती हैं। ये हर साल नई नहीं बनाई जातीं। रथों से निकाली गई लोहे की कीलें मंदिर प्रशासन के ऑफिस में जमा की जाती हैं। पहिए और नक्काशी वाले खास हिस्से अलग गोदाम में सुरक्षित रखे जाते हैं।

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