25 को निर्जला एकादशी, 29 को वट पूर्णिमा:एक पानी की अहमियत समझाने वाला व्रत, दूसरा पेड़ों और परिवार की उम्र से जुड़ा

Actionpunjab
6 Min Read




जून के आखिरी सप्ताह में दो बड़े व्रत आएंगे। 25 जून, गुरुवार को निर्जला एकादशी और 29 जून, सोमवार को वट पूर्णिमा व्रत किया जाएगा। ये दोनों व्रत गर्मी, जल, दान, संयम, पेड़ और परिवार की सुख-समृद्धि से जुड़े हैं। निर्जला एकादशी को सबसे कठिन एकादशी व्रतों में गिना जाता है। इस व्रत में अन्न के साथ जल भी नहीं लिया जाता। इसीलिए इसे जल का मोल समझाने वाला व्रत भी कहते हैं। दूसरी ओर वट पूर्णिमा व्रत में सुहागिन महिलाएं बरगद के पेड़ की पूजा करती हैं और परिवार की लंबी उम्र, सुख-शांति और सौभाग्य की कामना करती हैं। इन दोनों व्रतों में पूजा के साथ दान और सेवा का भी महत्व है। गर्मी के दिनों में राहगीरों को पानी पिलाना, प्याऊ लगवाना, मिट्टी का मटका रखना, छाता, पंखा, सत्तू, फल और ठंडी चीजों का दान करना शुभ माना जाता है। निर्जला एकादशी जल की जरूरत समझाती है और वट पूर्णिमा पेड़ों की छाया व प्रकृति की अहमियत याद दिलाती है। एक व्रत में जल का त्याग, दूसरे में छाया देने वाले पेड़ की पूजा 25 जून, गुरुवार: साल की कठिन एकादशियों में गिनी जाती है निर्जला एकादशी
ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी को निर्जला एकादशी व्रत किया जाएगा। इस व्रत में सूर्योदय से अगले दिन द्वादशी तक अन्न और जल का त्याग किया जाता है। दिनभर भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। विष्णु जी को पीले फूल, तुलसी, फल और मिठाई अर्पित की जाती है। श्रद्धालु ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप करते हैं।
ब्रह्मवैवर्त पुराण में इस व्रत की कथा भीमसेन और वेदव्यास से जुड़ी है। कथा के अनुसार, भीमसेन ने महर्षि व्यास से कहा कि वे भूखे नहीं रह सकते, इसलिए हर महीने आने वाली एकादशी का व्रत करना उनके लिए कठिन है। तब व्यास जी ने उन्हें ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी का निर्जला व्रत करने की सलाह दी।
इस व्रत को भीमसेनी एकादशी और पांडव एकादशी भी कहा जाता है। इस दिन जल से भरा घड़ा, हाथ का पंखा, छाता, चप्पल, सत्तू और फल दान करने की परंपरा है। मंदिरों में भगवान विष्णु की विशेष पूजा होती है। घरों में भी श्रद्धालु व्रत रखते हैं और पूजा-पाठ करते हैं। जल की अहमियत समझाने वाला व्रत निर्जला एकादशी
निर्जला एकादशी व्रत बताता है कि खुद संयम रखें और दूसरों की प्यास बुझाएं। यह जल की अहमियत समझाने वाला पर्व भी है। व्रत करने वाले खुद जल त्यागकर व्रत करते हैं और दूसरों को पानी पिलाने, प्याऊ लगाने और जल से भरा घड़ा दान करने का संकल्प लेते हैं।
गर्मी के दिनों में सड़क, मंदिर, बस स्टैंड, दुकान या घर के बाहर पानी की व्यवस्था करना सेवा का काम माना जाता है। इस दिन पक्षियों के लिए पानी रखना, राहगीरों को ठंडा पानी पिलाना और जरूरतमंदों को सत्तू-फल देना भी शुभ माना गया है। 29 जून, सोमवार: वट पूर्णिमा पर बरगद की पूजा करेंगी महिलाएं
ज्येष्ठ पूर्णिमा पर वट पूर्णिमा व्रत किया जाएगा। इस दिन सुहागिन महिलाएं वट यानी बरगद के पेड़ की पूजा करती हैं। महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत के कई क्षेत्रों में ज्येष्ठ पूर्णिमा को वट पूर्णिमा व्रत करने की परंपरा है। उत्तर भारत में वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ अमावस्या को ज्यादा प्रचलित है।
सावित्री-सत्यवान की कथा महाभारत के वनपर्व में मिलती है। कथा के अनुसार, सत्यवान की मृत्यु का समय आने पर सावित्री ने धैर्य, बुद्धि और दृढ़ता से यमराज से अपने पति के प्राण वापस पाए थे। इसी कारण यह व्रत पति की लंबी उम्र, परिवार की सुख-समृद्धि और सौभाग्य की कामना से जुड़ा है। वट पूर्णिमा पर महिलाएं व्रत रखती हैं। नए वस्त्र पहनकर बरगद के पेड़ की पूजा करती हैं। पूजा में जल, रोली, अक्षत, फूल, कच्चा सूत, भीगे चने, फल और सुहाग सामग्री अर्पित की जाती है। इसके बाद बरगद के पेड़ के चारों ओर सूत लपेटकर परिक्रमा की जाती है और सावित्री-सत्यवान की कथा सुनी जाती है। पेड़ बचेंगे तो जीवन बचेगा इसलिए बरगद की पूजा
वट पूर्णिमा व्रत का संबंध परिवार और सौभाग्य के साथ प्रकृति से भी है। बरगद का पेड़ लंबे समय तक जीवित रहता है और घनी छाया देता है। गर्मी के दिनों में पेड़ों की छाया इंसानों, पशु-पक्षियों को राहत देती है। इस व्रत का संदेश है कि पेड़ों को बचाना, पौधे लगाना और उनकी देखभाल करना भी धर्म का हिस्सा है। घर, मंदिर या सार्वजनिक जगहों पर पौधे लगाना और पक्षियों के लिए पानी रखना इस मौसम में बहुत जरूरी माना जाता है।

Share This Article
Leave a comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *