अयोध्या के सिद्ध संतों में अग्रणी स्वामी जानकी शरण महाराज उर्फ झुनझुनियां बाबा की आज पुण्यतिथि पर उनको श्रद्धा पूर्वक याद किया जा रहा है।
अयोध्या के सिद्ध संतों की माला के अनमोल मोती स्वामी जानकी शरण महाराज उर्फ झुनझुनियां बाबा सीता जी की सखी चंद्रकला जू के अवतार माने जाते थे।आज भी इस रूप में देश-विदेश में उनके करोड़ों अनुयायी है। न केवल सरयू तट स्थित उनकी तपोस्थली पर भव्य आश्रम है बल्क
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झुनकी बाबा ने सरयू तट पर जहां तप किया वहां आज भव्य आश्रम सियाराम किला के रूप में प्रतिष्ठित है।
अयोध्या,हरिद्वार और गया सहित देश के अनेक स्थानों में उनके आश्रम की शाखाएं हैं।महाराज जी की आज पुण्यतिथि है।इस अवसर पर आज उन्हें श्रद्धा पूर्वक याद किया जा रहा है।उनके आश्रम सियाराम किला में भव्य समारोह का आयोजन किया गया है।
अयोध्या के पहले पक्के घाट का निर्माण कराया झुनझुनियां बाबा हमेशा सख्री के वेश में रहते थे। उनका मानना था कि पुरुष केवल परमात्मा अर्थात भगवान श्रीराम हैं। और खुद को पुरुष भाव के अहंकार से मुक्त कर श्रीराम की सेवा में लीन रहने के लिए वे इस वेश में रहते और राम धुन में लीन रहते थे। उन्होंने अपने समय मे अयोध्या में उस समय के एकमात्र पक्के घाट का निर्माण अपने दान से मिले धन से कराया था.।
यह आज भी झुनकी घाट के नाम से मशहूर है। इस घाट पर दर्शन एवं सरयू स्नान के लिए आने वाले लोग आज भी आनंद का अनुभव करते हैं. उल्टी खाट पर बैठकर करते थे यात्रा
स्वामी जानकी शरण उर्फ झुनझुनिया बाबा उल्टी खाट पर बैठकर ‘श्री राम नाम सत्य है’ की धुन लगाते हुए यात्रा करते थे।. झुनझुनिया बाबा कानों में बाली, हाथों में कंगन, पैरों में घुंघरू पहन के सीता जी की सखी चंद्रकला के रूप में ही आजीवन भगवान श्रीराम की आराधना में लीन रहे।
सीता जी से मिला जन कल्याण का आदेश
उन्होंने रसिक भाव से श्री सीताराम की उपासना की परंपरा को समृद्ध किया। जो आज भी करोड़ों लोगों को रामनाम रूपी दिव्य रस का अनुभव कराती है। उनकेमंदिर के महंत स्वामी करुणानिधान शरण कहते हैं की झुनझुनियां बाबा ने कई दशकों तक कठोर तपस्या कर भगवान का साक्षात दर्शन प्राप्त किया। किशोरी जी से उन्हें जन कल्याण का आदेश मिला।इसका पालन आज भी हो रहा है। तपोस्थली पर सियाराम किला की स्थापना हुई
महाराज जी के शिष्य स्वामी मिथिला शरण महाराज ने महाराज जी की तपोस्थली पर सियाराम किला की स्थापना कराई। सरयू तट पर स्थित यह आश्रम त्याग, तपस्या और रसिक परंपरा की उपासना का मुख्य केंद्र बना हुआ है। यहां पर दिल्ली, बिहार, कोलकाता सहित कई प्रांतों से जुड़े लाखों शिष्य हैं।
रामनाम संकीर्तन मंदिर की परंपरा
मंदिर में अन्नकूट, सावन झूला मेला, रामनवमी, जानकी नवमी, हनुमान जयंती आदि उत्सव धूमधाम से मनाए जाते हैं। महंत करुणानिधान शरण ने बताया कि संत सेवा, अतिथि सेवा व राम नाम संकीर्तन मंदिर की मुख्य परंपरा है। यहां जानकी जी को भोजन के समय व आरती के समय पदों का गायन कर भोग लगाया जाता है।
मंदिर के अधिकारी स्वामी प्रभंजनानंद शरण देश के प्रसिद्ध कथावाचक हैं।वे पूरे देश में श्रीराम कथा के जरिए पीठ की पंपराओं को विकसित कर लोक कल्याण कर रहे हैं। उनका मानना है कि श्रीराम की भक्ति न केवल सरल औ सहज है बल्कि लोक और परलोक दोनों ही मार्ग को प्रशस्त करने वाली है।.
सरयू नदी का पानी बना घी
महंत करुणानिधान शरण ने बताया कि एक बार भंडारे के समय देसी घी की कमी पड़ गई. लोगों ने इसकी सूचना महाराज जी को दी. इस पर महाराज जी ने कहा कि जाओ सरयू से दो टीना घी मांग लाओ. शिष्य सरयू नदी से दो टीना जल लाकर कढ़ाई में डाल दिया गया और वह घी बन गया.
बाबा को समझना आसान नहीं
झुनझुनिया बाबा अनेक प्रकार की सिद्धियों के स्वामी थे. वे सामान्य रूप में बहुत ही सरल व स्नेहिल थे लेकिन रामनाम संकीर्तन के प्रति कठोर थे. वे मंदिर के सन्तों को रात भर जगाकर कीर्तन के लिए प्रेरित किया करते थे. सियाराम किला के व्यवस्थापक प्रह्लाद शरण के अनुसार झुनकी बाबा के चरित्र का वर्णन कर पाना कठिन भी है और उन्हें जान पाना दुर्लभ भी है.