एसएमएस मेडिकल कॉलेज के न्यूरोसर्जरी विभागाध्यक्ष रहे डॉ. मनीष अग्रवाल के एसीबी ट्रैप के बाद अस्पताल में कई चौंकाने वाले खुलासे हो रहे हैं। सामने आया है कि विभाग में ब्रेन हैमरेज मरीजों को लगाई गई ब्रेन कॉइल के रिकॉर्ड में भारी गड़बड़ी की गई है।
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- घूसकांड में पकड़े डॉ. मनीष के विभागाध्यक्ष रहते खरीद में हुई कई अनियमितताएं
आरजीएचएस, मुख्यमंत्री आरोग्य योजना और प्रधानमंत्री आयुष्मान योजना के नियमों के अनुसार किसी भी मरीज को अधिकतम तीन कॉइल ही लगाई जा सकती हैं, लेकिन एसएमएस के न्यूरोसर्जरी विभाग में मरीजों को 8 से 10 तक कॉइल लगाने का रिकॉर्ड दर्ज किया गया।
भास्कर की पड़ताल में सामने आया कि एसएमएस स्टोर से जारी की गई कॉइल, ऑपरेशन थियेटर के रजिस्टर में दर्ज और मरीजों को लगाई गई कॉइल में काफी अंतर है। शिकायत के बाद प्रशासन ने जांच कमेटी गठित की, लेकिन अब तक सभी दस्तावेज एसीबी को नहीं सौंपे गए हैं। एसीबी सूत्रों के अनुसार, यदि पिछले दो साल के रिकॉर्ड की जांच की जाए तो केवल न्यूरोसर्जरी विभाग में 10 करोड़ रुपए से अधिक की हेराफेरी सामने आ सकती है। एसीबी अब विभाग के दस्तावेज़, भुगतान और स्टॉक रिकॉर्ड को खंगाल रही है।

चहेते को सप्लाई देने के लिए दो बार टेंडर कैंसल
कॉइल की गणना और संख्या की प्रमाणिकता के लिए ब्रेन स्कैन रिपोर्ट अनिवार्य होती है, लेकिन अधिकांश मरीजों के रिकॉर्ड से यह रिपोर्ट गायब है। एसीबी अब इन सभी दस्तावेजों को खंगाल रही है और जांच में जुटी है। एसएमएस प्रशासन ने भी अलग से जांच कमेटी गठित की है। सरकार को की गई शिकायत में बताया गया कि डॉ. मनीष अग्रवाल के कार्यकाल में विभाग द्वारा की गई खरीद और स्टॉक रिकॉर्ड में भारी अंतर पाया गया।
विभाग के लिए खरीदे गए कई उपकरण स्टॉक रजिस्टर में दर्ज मात्रा से मेल नहीं खाते, यानी जो सामान खरीदा गया, वह पूरा अस्पताल तक पहुंचा ही नहीं। टेंडर प्रक्रिया में मनमानी न्यूरोवेस्कुलर टेंडर नंबर 567 में भी गड़बड़ियां उजागर हुई हैं। जानकारी के अनुसार, एक कंपनी ने टेंडर समय पर भरा ही नहीं, लेकिन उसे शामिल करने के लिए पहले टेंडर कैंसल किया गया और फिर उसी कंपनी के डिस्ट्रीब्यूटर को बदलकर 40 करोड़ का काम दिला दिया गया।
हर महीने 5 करोड़ का कॉइल कारोबार; एसएमएस में हर दिन 15 से 20 मरीजों के ब्रेन ऑपरेशन किए जाते हैं। एक कॉइल की कीमत ₹26,320 (टैक्स सहित) है। हर दिन लगभग 100 कॉइल इस्तेमाल होती हैं, यानी हर महीने करीब 5 करोड़ रुपए की कॉइल मरीजों को लगाई जाती हैं।