Gulshan Devaiah Success Story; Kantara | Goliyon Ki Raasleela | गुलशन देवैया की शुरुआती तीन फिल्में नॉमिनेट हुईं: अवॉर्ड न मिलने पर छलका दर्द; शाहरुख खान की पार्टी में झिझके, ‘कांतारा’ से भरी नई उड़ान

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12 मिनट पहलेलेखक: आशीष तिवारी/वीरेंद्र मिश्र

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टैलेंट और अपनी मेहनत के दम पर  गुलशन देवैया ने बॉलीवुड में एक अलग पहचान बनाई है। - Dainik Bhaskar

टैलेंट और अपनी मेहनत के दम पर गुलशन देवैया ने बॉलीवुड में एक अलग पहचान बनाई है।

गुलशन देवैया का बेंगलुरु से मुंबई तक का सफर आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने अपने सपनों को कभी छोड़ा नहीं। फैशन इंडस्ट्री से थिएटर और फिर सिनेमा तक पहुंचे गुलशन की मेहनत, ईमानदारी और संवेदनशीलता ने उन्हें खास बनाया।

उनकी तीन फिल्मों को नॉमिनेशन मिला, पर अवॉर्ड हाथ नहीं आया, जिसने उन्हें सिखाया कि फिल्मों में सफलता सिर्फ पुरस्कार नहीं बल्कि आत्मविश्वास और सच्चाई होती है। अनुराग कश्यप जैसे दिग्गजों का भरोसा और उनके अनुभवों में मिलने वाली चुनौतियां गुलशन की प्रतिभा को परखने का जरिया रहीं।

साथ ही, शाहरुख खान की पार्टी में व्यक्तिगत छोटे-छोटे जेस्चर ने उनका दिल जीता। गुलशन का मानना है कि असली सफलता नाम और पैसा नहीं, बल्कि मन की शांति और ईमानदारी से जीवन जीना है। बहरहाल, गुलशन इन दिनों ‘कांतारा चैप्टर वन’ की सक्सेस को एन्जॉय कर रहे हैं।

आज की सक्सेस स्टोरी में आइए जानें गुलशन देवैया के जीवन और करियर से जुड़ी कुछ खास बातें-

फैशन डिजाइनर से निखरे थिएटर के मंच पर पहुंचे गुलशन

28 मई 1978 को बेंगलुरु में जन्मे गुलशन देवैया के पिता देवैया भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) में कार्यरत थे। उनकी मां पुष्पलता जॉब के साथ-साथ थिएटर भी करती थीं। गुलशन ने अपनी प्राथमिक शिक्षा बेंगलुरु के क्लूनी कॉन्वेंट और सेंट जोसेफ इंडियन हाई स्कूल से पूरी की और बाद में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फैशन टेक्नोलॉजी (NIFT) से ग्रेजुएशन किया। गुलशन देवैया ने फैशन इंडस्ट्री में दस साल तक काम किया।

लेकिन उनका असली झुकाव थिएटर और एक्टिंग की ओर था। बेंगलुरु में अंग्रेजी थिएटर में छोटे-छोटे रोल करके उन्होंने अभिनय में अपनी रुचि विकसित की। 30 वर्ष की उम्र में मुंबई आए। मुंबई आने के बाद थिएटर में उन्होंने अभिनय की बारीकियां सीखीं। किताबों, अनुभवों और लगातार कोशिशों ने उन्हें बिना किसी एक्टिंग स्कूल में गए तैयार किया।

मुंबई आकर उन्होंने अनुराग कश्यप की फिल्म ‘दैट गर्ल इन यलो बूट’ (2010) से अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की।

वर्सोवा की गलियों में मिली पहली फिल्म

अनुराग कश्यप की फिल्म का जिक्र करते हुए गुलशन कहते हैं- इस फिल्म की कहानी अनुराग कश्यप और कल्कि ने मिलकर लिखी। कल्कि को मैं पहले से जानता था। एक दिन उनका फोन आया तो उस वक्त मैं एक ऑडिशन देने के बाद वर्सोवा की गलियों मे घूम रहा था। मन खट्टा था क्योंकि मेरा ऑडिशन खराब गया था। बिना कुछ ज्यादा पूछे मैं चला गया।

वहां अनुराग कश्यप मिले, उन्होंने एक दृश्य समझाया और कहा कि जब ऑडिशन के लिए तैयार हो तो बता देना। तीन-चार दिन बाद मैंने ऑडिशन दिया। अनुराग को पसंद आया और मुझे फिल्म के लिए फाइनल कर लिया गया।

संघर्ष से संवेदना तक- सच्चाई और आत्मविश्वास की जर्नी

मुंबई की चमकदार दुनिया में सच्चे बने रहना मुश्किल है, पर गुलशन देवैया ने यह साबित किया कि जब इंसान अपनी जड़ों और सोच के प्रति ईमानदार रहता है, तब उसकी पहचान देर-सबेर जरूर होती है। फैशन की दुनिया से सिनेमा के परदे तक, गुलशन का सफर आत्मविश्वास, संवेदना और वास्तविकता की खोज का रहा है।

शुरुआत और सोच की स्पष्टता

बेंगलुरु से मुंबई आने पर गुलशन के भीतर एक बात बिल्कुल साफ थी कि उन्हें बनावटीपन से दूर रहना है। उन्होंने तय किया कि इंडस्ट्री की गॉसिप और ‘राय’ उनके मन पर असर नहीं डालेगी। उनके लिए करियर का मतलब स्टेटस नहीं, बल्कि “आजादी ” है- अपना रास्ता खुद चुनने की स्वतंत्रता।

गुलशन की फिल्म ‘दैट गर्ल इन यलो बूट्स’ सितंबर 2010 में टोरंटो अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में प्रदर्शित की गई थी।

गुलशन की फिल्म ‘दैट गर्ल इन यलो बूट्स’ सितंबर 2010 में टोरंटो अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में प्रदर्शित की गई थी।

तीन फिल्में नॉमिनेशन में थीं, पर अवॉर्ड नहीं मिला

‘दैट गर्ल इन यलो बूट्स’ के बाद गुलशन ने ‘शैतान’ और ‘दम मारो दम’ जैसी फिल्में कीं। तीनों फिल्मों को बेस्ट डेब्यू के लिए नॉमिनेट किया गया था। गुलशन कहते हैं- डेब्यू के वक्त लगा था कि बेस्ट डेब्यू अवॉर्ड मुझे ही मिलेगा, लेकिन नहीं मिला। मेरे डेब्यू साल में तीन फिल्में रिलीज हुईं- ‘दैट गर्ल इन यलो बूट्स’, ‘शैतान’ और ‘दम मारो दम’। तीनों के रिव्यू अच्छे थे, हर किरदार अलग था, फिर भी अवॉर्ड नहीं मिला।

तब समझ आया कि यहां अवॉर्ड्स सब्जेक्टिव होते हैं। उस समय कई लोगों का नामांकन ऐलान ही नहीं हुआ था। माहौल थोड़ा चैरिटी इवेंट टाइप का हो गया था, माधुरी दीक्षित वहीं स्टेज पर थीं। शायद टाइम खत्म हो गया था, इसलिए सपोर्टिंग एक्टर और डेब्यू जैसी कैटेगरीज का ऐलान नहीं हो पाया।

मुझे पता ही नहीं था कि मेरा नाम नॉमिनेशन में है। शाहरुख ने जब स्टेज पर सभी नॉमिनीज को बुलाया, तो विद्युत जामवाल चला गया क्योंकि उसे पहले से बताया गया था। मुझे किसी ने नहीं बताया, इसलिए मैं नहीं गया। बाद में लोगों ने पूछा तो पता चला कि मेरा भी नाम था। थोड़ा दुख हुआ, लेकिन किसी ने जानबूझकर नहीं किया।

अब मैं ऐसी बातों को गंभीरता से नहीं लेता। फिल्म ‘फोर्स’ के लिए मैंने भी ऑडिशन दिया था, पर वह रोल विद्युत के लिए सही था। मेरी तीन फिल्में नॉमिनेशन में थीं, लगा था जीतूंगा, लेकिन कोई बात नहीं।

शाहरुख खान की पार्टी में बहुत अनकंफर्टेबल फील किया

अवॉर्ड के बाद शाहरुख खान ने अपने घर पर पार्टी रखी थी। बहुत अनकंफर्टेबल फील कर रहा था। इतने बड़े लोग थे- शाहरुख, गौरी, करण जौहर, फरहान अख्तर… मुझे लगा मैं वहां फिट नहीं हूं। पर सब बहुत अच्छे थे। शाहरुख और गौरी ने बहुत ग्रेसफुल तरीके से ट्रीट किया।

पार्टीज- इवेंट्स नेटवर्किंग के लिए फायदेमंद होते हैं

गुलशन पार्टीज को नेटवर्किंग के लिए अच्छा मानते हैं। वह कहते हैं- कई बार लोग आपको जानते नहीं, तो पार्टी या किसी इवेंट में मिलने से पहचान बनती है। जैसे मैं राकेश ओमप्रकाश मेहरा से एक पूजा में मिला था। मैंने उन्हें अपना परिचय देते हुए कहा- “सर, मैं गुलशन देवैया हूं, अच्छा एक्टर हूं, मेरे बारे में गूगल कर लीजिए।” वो मुस्कुराए, लेकिन उसके बाद कुछ काम तो नहीं आया, पर मैंने उन पर एक अच्छा इम्प्रेशन जरूर छोड़ा।

मुझे लगा- कम से कम मैंने ईमानदारी से खुद को पेश किया। इसलिए मैं कहता हूं, पार्टीज या ऐसे इवेंट्स नेटवर्किंग के लिए फायदेमंद होते हैं।

‘दैट गर्ल इन यलो बूट्स’ ने बदली जिंदगी

अनुराग कश्यप की फिल्म ‘दैट गर्ल इन यलो बूट्स’ गुलशन के लिए निर्णायक मोड़ थी। कठिन सीन, लगातार टेक्स्ट और इम्प्रोवाइजेशन की आजादी ने उन्हें एक “सीरियस एक्टर” के रूप में स्थापित किया। इस फिल्म का जिक्र करते हुए गुलशन कहते हैं- फिल्म का पहला दिन मेरे लिए यादगार रहा। उस रात मैं सो नहीं सका क्योंकि अगले दिन का सीन बार-बार दिमाग में चल रहा था। सीन में मुझे एक किरदार को पकड़कर पीटना था- लेकिन सब कुछ इम्प्रोवाइज था, कोई डायलॉग नहीं लिखा गया था।

अनुराग कश्यप का भरोसा ही असली ताकत था

अनुराग कश्यप ने मुझे पूरी जिम्मेदारी दी। उन्होंने कहा नहीं, लेकिन महसूस कराया कि उन्हें मुझ पर भरोसा है। सेट पर सब कुछ सहज था, किसी ने यह नहीं जताया कि मैं नया हूं।

शूट के बाद लगा कि कुछ अच्छा किया है। जो भरोसा अनुराग ने किया, मैं उस पर खरा उतरा। पहले वसंत बाला को लगा था कि यह रोल किसी उम्रदराज एक्टर को देना चाहिए, लेकिन अनुराग ने मुझ पर विश्वास किया। उस दिन मुझे महसूस हुआ कि मैंने अपनी काबिलियत साबित की है।

रोहन सिप्पी के सेट पर परफेक्शन की मजबूरी, आजादी सीमित थी

लेकिन हर डायरेक्टर का तरीका ऐसा नहीं होता। जैसे जब मैंने ‘दैट गर्ल इन यलो बूट्स’ के बाद रोहन सिप्पी के साथ फिल्म ‘दम मारो दम’ में काम किया, तो वहां सारा कुछ सेट था। किरदार और सीन पहले से लिखे हुए थे, उन्हीं के हिसाब से चलना था। हां, थोड़ा बहुत इम्प्रोवाइज करने की गुंजाइश थी, लेकिन एक तय दायरे में।

रोहन सिप्पी हर टेक का टाइम देखते थे कि कितने सेकेंड में सीन खत्म होना चाहिए। अगर आप ज्यादा इधर-उधर जाएंगे, तो सीन उस टाइमिंग से बाहर निकल जाता। यानी वहां परफेक्शन और टाइमिंग दोनों जरूरी थे, आजादी कम थी।

संजय लीला भंसाली की अच्छाइयों से ज्यादा गुस्सा याद रहता है

करियर की शुरुआत में अनुराग कश्यप, रोहन सिप्पी और संजय लीला भंसाली जैसे दिग्गज निर्देशकों के साथ काम कर चुके गुलशन, संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘गोलियों की रास लीला राम-लीला’ में भंसाली के साथ अपने अनुभव को साझा करते हुए कहते हैं- भंसाली सर अपने काम को लेकर बहुत पैशनेट हैं, अपनी फिल्मों और काम को लेकर पूरी तरह जुड़ जाते हैं।

जब दूसरों में वैसा जोश नहीं देखते, तो फ्रस्ट्रेट हो जाते हैं, लेकिन वो दिल के बहुत अच्छे हैं। सबको प्यार से खिलाते हैं, ध्यान रखते हैं। बस लोग उनकी अच्छाइयां नहीं, गुस्से की बातें ज्यादा याद रखते हैं।

फिल्म ने छिपी ‘चुप उदासी’ को बाहर लाने का मौका दिया

गुलशन देवैया कहते हैं- मेरे किए हुए सभी किरदारों में से, “8 A.M. in Metro” का प्रीतम मेरे सबसे करीब है। वह बहुत प्यारा किरदार है। उसमें एक तरह की चुप सी उदासी है, जो मुझे लगता है मेरे अंदर भी है। उस भावना को मैंने अपने अभिनय में बाहर लाने की कोशिश की। इसलिए प्रीतम मुझे मेरे असली रूप के सबसे करीब लगता है। अगर मैं अपनी जिंदगी के कुछ पहलू खोजूं, तो उनमें प्रीतम जैसा बहुत कुछ है।

उस फिल्म के बाद कई लोग मुझे निजी संदेश भेजते हैं। वो अपने मन की बातें लिखते हैं- किसी चीज के खोने, जीवन और मृत्यु के अनुभवों के बारे में। ये बहुत व्यक्तिगत संदेश होते हैं, इसलिए मैं उन्हें शेयर नहीं करना चाहता। आज भी रोज “8 A.M. in Metro” को देखने के बाद लोग मैसेज करते हैं- मुझे और सैयामी खेर को भी।

‘कांतारा चैप्टर वन’ बना करियर का टर्निंग पॉइंट

ऋषभ शेट्टी के साथ ‘कांतारा चैप्टर वन’ गुलशन के करियर का मजबूत कदम साबित हुआ। ‘राजा कुलशेखर’ का किरदार बुद्धिमत्ता, अय्याशी, आलस्य- इन सबके विरोधाभासी शेड्स लिए हुए था। वे कहते हैं कि उन्होंने इसे किसी खास व्यक्ति से प्रेरित होकर नहीं किया, बल्कि कल्पना और जीवन-अनुभवों के मिश्रण से गढ़ा। हर दृश्य में वे निर्देशक से चर्चा करते, रिहर्सलों में नए प्रयोग करते और कई बार को-एक्टर्स की ऊर्जा से प्रेरित होकर सीन को अलग रूप दे देते।

गुलशन मानते हैं कि कोई भी किरदार केवल एक्टर का नहीं होता, बल्कि सेट पर मौजूद टीम का सामूहिक निर्माण होता है। ऋषभ शेट्टी, शनिल, अनिरुद्ध और अन्य राइटर के इनपुट ने उनके अभिनय को गहराई दी।

घोड़े पर सवार आग और भीड़ वाले सीक्वेंस में उन्होंने खुद ट्रेनिंग लेकर शूट पूरा किया, जिसे वे अपने जीवन का सबसे कठिन अनुभव मानते हैं।

कांतारा धर्म नहीं, संवेदना की भाषा है

कांतारा की संस्कृति और ‘दैव आराधना’ पर गुलशन गहराई से बात करते हैं। वे कहते हैं कि बचपन में वे दैव पूजा के आयोजन देखते थे, जहां लोग देवता से सवाल पूछने के लिए घंटों खड़े रहते थे। उनके नानाजी उन्हें वहां ले जाते थे, उनकी मां के स्वास्थ्य के लिए दैव से आशीर्वाद मांगते थे। एक बार उन्होंने खुद सवाल किया था, जिसका उत्तर मलयालम में मिला। आज भी उन्हें याद नहीं कि देव ने क्या कहा, पर वह अनुभव हमेशा के लिए स्मृति में अंकित है।

गुलशन मानते हैं कि ‘कांतारा’ का असर सिर्फ धर्म से नहीं जुड़ा, बल्कि यह संवेदना की भाषा है। भले कोई नास्तिक हो, लेकिन फिल्म का क्लाइमैक्स देखकर हर कोई कुछ महसूस करता है। यही तो सिनेमा है, भाषा या संस्कृति से परे एक फीलिंग।

इरफान खान और मनोज बाजपेयी से मिली प्रेरणा

गुलशन अपने रोल मॉडल में इरफान खान और मनोज बाजपेयी का जिक्र करते हुए कहते हैं- इरफान सर से पहली बार मिला तो उन्होंने कहा- ‘अरे, मैं जानता हूं तुम्हें।’ उन्होंने गले लगाया। बस वही पल, वही सबसे खूबसूरत कॉम्प्लिमेंट था।”

‘सत्या’ देखने के बाद मनोज बाजपेयी के अभिनय ने उन्हें एक्टिंग की ओर खींचा। गुलशन कहते हैं- मनोज जी ने हमारे जैसे कई लोगों के भीतर दबे सपनों को जगाया।

नसीरुद्दीन शाह ने पार्टी में सबके सामने तारीफ की

बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता नसीरुद्दीन शाह से पहली मुलाकात का जिक्र करते हुए गुलशन देवैया कहते हैं- ‘दैट गर्ल इन यलो बूट्स’ में नसीर सर के साथ मेरा कोई सीन नहीं था। उन दिनों फिल्म ‘डर्टी पिक्चर’ हिट हुई थी और एक दोस्त के साथ मैं इसकी सक्सेस पार्टी में चला गया।

वहां नसीर साहब मिल गए। मैंने उन्हें बताया कि मैंने आपकी फिल्म में काम किया है। उन्होंने फिल्म का नाम और मेरे किरदार के बारे में पूछा। जैसे ही मैंने किरदार का हवाला दिया वह उठकर खड़े हो गए और बोले अरे, तुम! फिर सबके सामने उन्होंने मेरी खूब तारीफ की।

मां का थप्पड़ भी था प्यार भरा, बचपन से ही रंगों-संगीत में दिखी उनकी चमक

गुलशन ने अपनी मां के बारे में बड़ी भावुक बात कही- “वो अगर मुझे थप्पड़ भी मार दें, तो भी वो मेरी सबसे प्यारी रहेंगी।”

मां के साथ उनका रिश्ता सिर्फ प्यार का नहीं, समझ और सम्मान का भी था। बचपन के दिनों में स्कूल में ही उनकी कला, संगीत और ड्रॉइंग में गहरी रुचि दिखने लगी थी।

जब वह रंगों से कुछ रचते या कोई धुन बजाते, तो मां प्यार से कहतीं- “देखो, मेरा बच्चा तो कलाकार बन जाएगा!”

उनकी हर छोटी सफलता पर मां की आंखों में चमक आ जाती थी। शायद इसी उजाले ने उनके भीतर एक सच्चे कलाकार को जन्म किया।

इंटिमेट सीन से पहले साफ बातचीत जरूरी है

गुलशन देवैया ने फिल्म “हंटर” (2015) में कई बोल्ड और मजेदार सीन किए थे। इस फिल्म में उन्होंने राधिका आप्टे के साथ काम किया और उनके इंटिमेट सीन उस समय खूब चर्चा में रहे थे। गुलशन का कहना है कि ऐसे सीन करते समय सबसे जरूरी है साफ-साफ बात करना ताकि दोनों एक्टर्स को असहज महसूस न हो। दीपिका पादुकोण और जान्हवी कपूर जैसे को-स्टार्स के साथ उनका अनुभव हमेशा प्रोफेशनल और सम्मानजनक रहा है।

रिश्ते काम से अलग रखता हूं, असफलता से सीखा जीना

गुलशन इंडस्ट्री में रिश्तों को स्पष्ट रूप से अलग रखते हैं- “काम के रिश्ते अलग, असली दोस्ती अलग।”अनुराग कश्यप के प्रति गहरी कृतज्ञता जताते हुए वे कहते हैं- “वो मेरे शुभचिंतक हैं, लेकिन मैं उन्हें दोस्त नहीं कह सकता क्योंकि मैं उनका बहुत सम्मान करता हूं।”

गुलशन के मुताबिक असली संघर्ष सीखने का था। ‘’बाहर से आने वाले को सिस्टम समझने में वक्त लगता है। मुझे 30 से 40 की उम्र में वो सब सीखना पड़ा जो दूसरों ने 15 से 25 में सीखा।” उन्होंने हर असफलता को सीख में बदला और मानसिक दृढ़ता को अपनी ताकत बनाया।

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