Rajasthan baran Anta By-election Result 2025, Pramod Jain Bhaya wins, the people of Anta follow the trend of change | अंता की जनता ने बदलाव का ट्रेंड फॉलो किया: कांग्रेस ने BJP के वोट बैंक में लगाई सेंध, माली-मीणा-गुर्जर-धाकड़ वोटरों का समीकरण बदला – Kota News

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अंता विधानसभा सीट बनने के बाद से हुए चार चुनावों में हर बार सत्ता परिवर्तन हुआ है। दो बार भाजपा और 2 बार कांग्रेस को जीत मिली।

अंता विधानसभा की जनता ने एक बार फिर बदलाव के ट्रेंड को फॉलो करते हुए इतिहास दोहराया है। उपचुनाव में कांग्रेस के प्रमोद जैन भाया को जीत दिलाते हुए जनता ने भाजपा से यह सीट वापस ले ली। यह सीट 2023 में भाजपा के पास थी।

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2025 के उपचुनाव में जनता ने साफ जनादेश देते हुए कांग्रेस को चुना है। साथ ही अंता की जनता ने थर्ड फ्रंट को भी नकार दिया। हालांकि निर्दलीय उम्मीदवार नरेश मीणा ने बड़ी मजबूती से मुकाबला किया। जनता के बीच अपनी जगह बनाई, लेकिन जनादेश कांग्रेस के पक्ष में गया। इस परिणाम में साइलेंट वोटर की भूमिका निर्णायक मानी जा रही है।

अंता सीट का वोटिंग पैटर्न: हर बार बदलाव

अंता विधानसभा सीट बनने के बाद से हुए चार चुनावों में हर बार सत्ता परिवर्तन हुआ है। पिछले तीन चुनावों में 80 प्रतिशत के करीब मतदान हुआ। इनमें से दो बार भाजपा और 2 बार कांग्रेस को जीत मिली।

  • 2023: 80% मतदान—भाजपा जीती
  • 2018: 80% मतदान—कांग्रेस जीती
  • 2013: 80% मतदान—भाजपा जीती
  • 2008: 71% मतदान—कांग्रेस जीती

इतिहास बताता है कि अंता की जनता हर बार बदलाव को तरजीह देती है। 2025 के उपचुनाव ने इस ट्रेंड को दोहराया है।

भाजपा के लिए बड़ी चेतावनी उपचुनाव के परिणाम भाजपा सरकार और संगठन के लिए अलार्मिंग माने जा रहे हैं। पूरी ताकत झोंक देने के बावजूद भाजपा अपने उम्मीदवार को आगे नहीं बढ़ा पाई, बल्कि परिणाम दूसरे और तीसरे स्थान के बीच उलझकर रह गए।

भाजपा की हार के 3 प्रमुख कारण

1. स्थानीय नेताओं की अनदेखी राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा की हार का सबसे बड़ा कारण स्थानीय नेताओं को महत्व न देना था। भाजपा के पास नंदलाल सुमन, आनंद गर्ग और प्रखर कौशल जैसे मजबूत चेहरे थे, जिन्होंने लंबे समय से संगठन में और जनता के बीच काम किया, लेकिन टिकट मोरपाल सुमन को दिया गया। मोरपाल जनता के बीच उतने लोकप्रिय नहीं थे और उनकी उम्मीदवारी पर संगठन के भीतर भी असंतोष माना जा रहा है। टिकट वितरण में देरी का संदेश भी जनता में गलत गया।

2. प्रधान होते हुए भी क्षेत्रीय काम न करवा पाने की छवि मोरपाल सुमन तिसाया के प्रधान हैं। ग्रामीणों का कहना है कि वे अपने क्षेत्र के जरूरी काम नहीं करवा पाए। लोगों का सवाल था कि जो प्रधान रहते हुए जनता के काम नहीं करवा पाया, वह विधायक बनकर क्या परिवर्तन लाएगा?

3. चुनाव को नेताओं के चेहरे पर लड़ना मोरपाल ने स्वयं प्रचार में विशेष सक्रियता नहीं दिखाई। पूरा चुनाव मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा, पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और वरिष्ठ नेताओं के चेहरे पर लड़ा गया। हाड़ौती के स्थानीय मंत्रियों को भी प्रचार में प्रमुखता नहीं मिली। इससे स्थानीय स्तर पर ऊर्जा और जुड़ाव कमजोर रहा।

2023 बनाम 2025: वोट बैंक सरक गया

  • 2023 में भाजपा को 87,390 वोट (49.63%) मिले थे और कंवरलाल मीणा जीते थे।
  • कांग्रेस के प्रमोद जैन भाया को 81,529 वोट (46.30%) मिले थे। दोनों के बीच सिर्फ 3% वोटों का अंतर था।

साल 2025 उपचुनाव वोट प्रतिशत

  • कांग्रेस: 38% वोट
  • भाजपा: 30% वोट

इस बार हार-जीत का अंतर 8% तक पहुंच गया, यानी कांग्रेस ने भाजपा के करीब 5% वोट खिसका लिए।

स्थानीय मुद्दों की अनदेखी ने मुश्किलें बढ़ाईं भाजपा ने स्थानीय मुद्दों पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया। चुनाव प्रचार के दौरान एक बड़ी घटना यह भी रही जब पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने सीएम भजनलाल शर्मा के सामने अंता के अधूरे विकास कार्यों को उठाया। सीएम शर्मा को नोट्स बनाते देखा गया, जिसका जनता पर विपरीत असर पड़ा। इससे यह संदेश गया कि सरकार स्थानीय मुद्दों से अनजान है। कांग्रेस ने इस स्थिति का लाभ उठाया।

बीजेपी प्रत्याशी मोरपाल सुमन (बीच में) के लिए प्रचार के दौरान वसुंधरा राजे और मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा।

बीजेपी प्रत्याशी मोरपाल सुमन (बीच में) के लिए प्रचार के दौरान वसुंधरा राजे और मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा।

कांग्रेस की जीत के प्रमुख कारण

1. रणनीतिक नैरेटिव सेट करना

उपचुनाव की घोषणा होते ही कांग्रेस ने भाजपा को नजरअंदाज करते हुए मुकाबला ‘कांग्रेस बनाम नरेश मीणा’ का बना दिया। इससे भाजपा का वोटर कंफ्यूज हुआ और कांग्रेस की रणनीति काम कर गई।

2. सामाजिक समीकरणों में सेंध

राजनीतिक आकलन के मुताबिक, कांग्रेस ने विभिन्न समुदायों में प्रभावी सेंध लगाई।

  • माली समाज: 10–15%
  • मीणा समाज: 15–20%
  • गुर्जर समाज: 20–30%
  • धाकड़ समाज: 30–40%

हालांकि, कांग्रेस को मुस्लिम वोटों में 10–15% और एससी वोटों में कुछ नुकसान हुआ। फिर भी सामाजिक समीकरण उनके पक्ष में रहे।

थर्ड फ्रंट: नरेश मीणा बने ‘किंगमेकर टाइप’ फैक्टर निर्दलीय नरेश मीणा ने आरएलपी, AAP, SDPI और अन्य समूहों के समर्थन से मजबूती के साथ चुनाव लड़ा। उन्हें लगभग 30% वोट मिले। राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार वे भाजपा के वोट बैंक में अधिक सेंध लगाने में सफल रहे। यानी थर्ड फ्रंट सीधे-सीधे भाजपा के लिए सबसे बड़ा नुकसान साबित हुआ।

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