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हरिद्वार1 दिन पहले
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पुराने समय में एक धनी व्यापारी था, उसके पास सुख-सुविधा की हर चीज मौजूद थी, लेकिन उसका मन हमेशा अशांत रहता था। हर समय तनाव, बेचैनी और चिंता रहती थी। व्यापार के सिलसिले में वह लगातार यात्राएं करता था, लेकिन यात्राओं से भी उसे संतुष्टि नहीं मिल रही थी।
एक दिन यात्रा से लौटते समय उसे एक वन में आश्रम दिखाई दिया। लंबे समय से अपने मन की अशांति को लेकर परेशान व्यापारी आश्रम में चला गया। वहां एक संत ध्यान में बैठे थे। व्यापारी ने उन्हें प्रणाम किया और अपना दुख बताया। उसने कहा कि मेरे पास सब कुछ है, फिर भी मुझे शांति नहीं मिल रही है।
संत ने सहानुभूति से उसकी बात सुनी और कहा कि यदि शांति चाहिए, तो कुछ देर यहां बैठकर ध्यान करिए।
व्यापारी ने आसन लगाया, आंखें बंद कीं और ध्यान लगाने की कोशिश करने लगा। ध्यान करते समय में भी व्यापारी के भीतर का शोर कम होने का नाम ही नहीं ले रहा था, व्यापार की बातें, भविष्य की चिंताएं, दूसरों से तुलना, ईर्ष्या और अहंकार जैसे विचार लगातार मन में घूम रहे थे। कुछ देर बाद उसने आंखें खोलीं और संत से कहा कि मैं ध्यान नहीं लगा सकता।
संत बोले कि चलो मेरे साथ, कुछ देर आश्रम में घूमते हैं। व्यापारी उनके साथ चल पड़ा। रास्ते में एक पेड़ के पास जाते हुए उसके हाथ में अचानक एक कांटा चुभ गया। दर्द से वह तड़प उठा। संत तुरंत लेप लेकर आए और उसके हाथ पर लगा दिया। व्यापारी ने राहत की सांस ली।
तब संत बोले कि जिस प्रकार ये कांटा तुम्हें दर्द दे रहा है, ठीक वैसे ही तुम्हारे मन में क्रोध, अहंकार, ईर्ष्या और लालच के कांटे चुभे हैं। जब तक ये कांटे भीतर रहेंगे, तुम्हें शांति मिल ही नहीं सकती। ध्यान लगाने में कठिनाई इसलिए आई, क्योंकि मन पहले से ही इन कांटों से भरा है।
संत की बात व्यापारी के हृदय में उतर गई। वह आश्रम में ही रुका और संत का शिष्य बन गया। धीरे-धीरे उसने अपने भीतर बसे नकारात्मक विचारों को त्यागना शुरू किया। उसने अपने धन का उपयोग समाज सेवा में करना प्रारंभ किया। कुछ ही समय में उसका मन शांत हो गया और वह एक संतुलित और प्रसन्न व्यक्ति बन गया।
प्रसंग की सीख
- मानसिक कांटों को पहचानें
हमारी अशांति अक्सर बाहरी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि भीतर के मानसिक कांटों से पैदा होती है- जैसे गुस्सा, ईर्ष्या, अहंकार और लालच। आत्म-समीक्षा के लिए रोज 5–10 मिनट शांत बैठें और देखें कि कौन सा विचार आपके मन को सबसे अधिक विचलित करता है। जब पहचान हो जाए तो उसे कम करने के तरीके मिल जाते हैं।
- ध्यान से अधिक जरूरी मन की सफाई
अक्सर लोग कहते हैं कि वे ध्यान नहीं लगा पा रहे। असल में ध्यान में बाधा बाहरी नहीं, आंतरिक होती है। जैसे कमरे में गंदगी हो तो खुशबू टिकती नहीं, ठीक वैसे ही मन में नकारात्मकता होने पर ध्यान टिकना मुश्किल होता है। पहले अपनी भावनाओं की सफाई करें, क्षमा, कृतज्ञता और स्वीकार्यता को रोज की आदत बनाएं।
- सेवा और दान आत्मा को हल्का बनाते हैं
जब व्यक्ति केवल अपने लाभ के लिए जीता है, तो मन भारी रहता है। वहीं जब कोई समाज के लिए योगदान देता है, तो भीतर हल्कापन पैदा होता है। पैसा न भी हो, फिर भी आप अपने समय, कौशल या दयालुता से सेवा कर सकते हैं। यह मन को स्थायी शांति देता है।
- तुलना से दूरी बनाएं
व्यापारी की तरह हम भी अक्सर दूसरों की उपलब्धियों से खुद को मापते हैं। तुलना से ही ईर्ष्या और हीनभावना जन्म लेती है। इसके बजाय स्वयं की प्रगति पर ध्यान दें और अपने जीवन के लक्ष्य स्पष्ट रखें।
- सरलता अपनाएं
अधिक इच्छाएं अधिक तनाव देती हैं। जीवन को सरल बनाइए, कम सामान, कम जटिलताएं, कम अव्यवस्था। सरल जीवन ही स्थायी शांति का आधार है।
- संतुलित दिनचर्या बनाएं
पर्याप्त नींद, नियमित व्यायाम और पौष्टिक भोजन मनोस्थिति पर गहरा प्रभाव डालते हैं। अस्वस्थ शरीर शांत मन का निवास नहीं बन सकता।