Ramakrishna paramahamsa teachings, moral story of ramkrishna paramhans how to get true peace of mind, motivational story

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13 घंटे पहले

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स्वामी विवेकानंद के गुरु रामकृष्ण परमहंस से जुड़ा किस्सा है। एक दिन परमहंस जी अपने आश्रम में शिष्यों के साथ बैठे थे। एक शिष्य के मन में एक सवाल आया। शिष्य ने विनम्रता से पूछा कि गुरुदेव, लोग अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए दिन-रात मेहनत करते हैं। कोई धन चाहता है, कोई नाम चाहता है, कोई सुख-सुविधाएं चाहता है। इन चीजों को पाने के लिए लोग बहुत एकाग्र होकर काम करते हैं, लेकिन भगवान की भक्ति में वैसी एकाग्रता क्यों नहीं बन पाती?

रामकृष्ण परमहंस बोले कि इसका कारण अज्ञानता है। लोग समझते नहीं कि असली सुख कहां है। इसलिए उनका मन भगवान में नहीं, बल्कि संसार की चीजों में लगा रहता है।

शिष्य ने फिर पूछा कि गुरुदेव, अज्ञानता कैसे दूर होगी?

रामकृष्ण परमहंस ने पास बैठे बच्चों की ओर इशारा करते हुए एक उदाहरण दिया।

उन्होंने कहा कि देखो, एक छोटा बच्चा जब नया खिलौना पाता है तो वह उसमें इतना खो जाता है कि उसे अपनी मां की याद भी नहीं आती। वह घंटों उसी खिलौने से खेलता रहता है। उस समय उसे दुनिया की कोई और चीज दिखाई नहीं देती।

शिष्य ध्यान से सुन रहा था। परमहंसजी ने आगे कहा कि लेकिन जब वह खिलौना टूट जाता है या उससे खेलकर उसका मन भर जाता है, तब उसे अपनी मां की याद आती है। वह रोते हुए अपनी मां के पास दौड़ता है।

शिष्य ने सिर हिलाया। रामकृष्ण परमहंस बोले कि ठीक यही स्थिति इंसानों की भी है। संसार की चीजें भी खिलौनों जैसी हैं। धन, सुख-सुविधा, नाम, पद- ये सब अस्थायी हैं, लेकिन इंसान इन चीजों में इतना उलझ जाता है कि उसे भगवान की याद ही नहीं आती। जब तक मन इन इच्छाओं और भोग-विलास के खिलौनों में फंसा रहता है, तब तक भक्ति में एकाग्रता नहीं बनती। जब व्यक्ति समझ जाता है कि इन चीजों से सच्चा सुख नहीं है, तब उसका मन भगवान की ओर जाता है।

परमहंस की बातें सुन रहे सभी शिष्यों ने तय किया कि वह अपनी इच्छाओं को कम करेंगे और भगवान की भक्ति में मन लगाएंगे।

रामकृष्ण परमहंस ने कहा कि जिस दिन मन खिलौनों से हटकर भगवान में लग जाएगा, उसी दिन सच्ची शांति मिल जाएगी।

प्रसंग की सीख

इस कहानी से हमें जीवन को सही दिशा में चलाने की सीख मिलती है।

  • इच्छाएं कभी खत्म नहीं होती

मनुष्य की इच्छाएं बहुत हैं। एक इच्छा पूरी होती है तो दूसरी पैदा हो जाती है। अगर हम केवल इच्छाओं के पीछे भागते रहेंगे तो जीवन में कभी शांति नहीं मिलेगी। इसलिए इच्छाओं को नियंत्रित करना जरूरी है।

  • संसार की चीजें अस्थायी हैं

धन, पद, नाम और सुख-सुविधाएं स्थायी नहीं होतीं। आज हैं, कल नहीं भी हो सकतीं। इसलिए इन्हें जीवन का अंतिम लक्ष्य नहीं बनाना चाहिए।

  • भक्ति और ध्यान के लिए मन को शांत करना जरूरी है

जब मन इच्छाओं और चिंताओं से भरा रहता है, तब पूजा या ध्यान में एकाग्रता नहीं बनती। इसलिए मन को शांत और सरल बनाना जरूरी है।

  • सीमित इच्छाएं जीवन को सरल बनाती हैं

जो लोग कम इच्छाएं रखते हैं, उनका जीवन ज्यादा शांत और संतुलित होता है। वे छोटी-छोटी चीजों में भी खुशी ढूंढ लेते हैं।

  • भोग से ज्यादा महत्व संतोष का है

भोग-विलास थोड़ी देर की खुशी देता है, लेकिन संतोष लंबे समय तक मन को शांत रखता है। संतोष जीवन की सबसे बड़ी संपत्ति है।

  • आत्मचिंतन जरूरी है

कभी-कभी हमें खुद से पूछना चाहिए कि क्या हम सही दिशा में जा रहे हैं? क्या हमारी इच्छाएं हमें परेशान कर रही हैं? यह आत्मचिंतन हमें सही रास्ता दिखाता है।

  • भक्ति से मन को शांति मिलती है

ध्यान और भक्ति मन को स्थिर बनाते हैं। इससे तनाव कम होता है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा आती है।

  • संतुलन बनाना सीखें

जीवन में काम करना भी जरूरी है और आध्यात्मिकता भी। अगर दोनों के बीच संतुलन बना लिया जाए तो जीवन अधिक सुखी और शांत बन सकता है।

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