Sheetla mata vrat story, Shitla saptami significance in hindi, story of Shitla mata, puja vidhi

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13 घंटे पहले

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AI जनरेटेड इमेज. - Dainik Bhaskar

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आज (10 मार्च) और कल (11 मार्च) चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी-अष्टमी है। इन तिथियों पर शीतला माता की विशेष पूजा और व्रत करते हैं। कुछ जगहों पर सप्तमी पर और कुछ जगहों पर अष्टमी तिथि पर महिलाएं ये व्रत करती हैं। शीतला माता के नाम का अर्थ है शीतलता देने वाली देवी। शीतलता यानी ठंडक। इस व्रत में देवी मां को ठंडे (शीतल) खाने का भोग लगाने की परंपरा है। भक्त भी ठंडा खाना ही खाते हैं। इस व्रत को बसोड़ा भी कहते हैं।

उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के मुताबिक, ये व्रत मौसमी बीमारियों से बचने की कामना से किया जाता है। जानिए शीतला माता का स्वरूप कैसा है और इस व्रत में ठंडा खाना क्यों खाते हैं?

देवी धारण करती हैं नीम के पत्तों की माला

  • शीतला माता का स्वरूप अन्य देवियों से बिल्कुल अलग है। देवी का वाहन गधा है। शीतला माता के हाथों में कलश, झाड़ू, सूप (सूपड़ा) है। मां के गले में नीम के पत्तों से बनी माला है। कलश, झाड़ू, सूप और नीम ये सभी चीजें साफ-सफाई से संबंधित हैं।
  • देवी का ये स्वरूप संदेश देता है कि व्यक्ति को साफ-सफाई का ध्यान हमेशा रखना चाहिए। जो लोग गंदगी में रहते हैं, शरीर की सफाई नहीं करते हैं, वे मौसमी बीमारियों से बहुत जल्दी पीड़ित हो जाते हैं।
  • आयुर्वेद के अनुसार नीम की पत्तियां हमारी त्वचा के लिए फायदेमंद होती हैं। नीम के सेवन से स्वास्थ्य को कई लाभ मिलते हैं। ध्यान रखें नीम का सेवन किसी विशेषज्ञ डॉक्टर से परामर्श करने के बाद ही करना चाहिए।

शीतला माता को क्यों लगाते हैं ठंडे खाने का भोग?

  • शीतला माता का ये व्रत दो ऋतुओं के संधिकाल में किया जाता है। अभी शीत ऋतु खत्म हो रही है और ग्रीष्म ऋतु शुरू होने वाली है। ऐसे समय को ही ऋतुओं का संधिकाल कहते हैं।
  • इस दौरान जिन लोगों की इम्यूनिटी कमजोर होती है, वे बहुत जल्दी मौसमी बीमारियों से पीड़ित हो जाते हैं। ऋतु परिवर्तन के समय खान-पान और जीवन शैली से जुड़ी सावधानी रखनी चाहिए।
  • शीतला माता का ये व्रत करने वाले भक्त एक दिन पहले बना हुआ बासी यानी ठंडा खाना ही खाते हैं।
  • शीतला माता को ठंडे खाने का भोग लगाया जाता है। मान्यता है कि इस समय में ठंडा खाना खाने से भक्त को ऋतु परिवर्तन के समय होनी वाली मौसमी बीमारियां जैसे सर्दी-कफ, फोड़े-फूंसी, आंखों और त्वचा संबंधी बीमारियां होने की संभावनाएं कम हो जाती हैं।

शीतला माता की लोक कथा

  • पुराने समय में एक गांव के लोगों ने एक दिन देवी शीतला को गर्म खाने का भोग लगा दिया था, जिससे देवी मां का मुंह जल गया और वह क्रोधित हो गई थीं।
  • देवी के क्रोध से गांव में आग लग गई। गांव के सभी घर जल गए, लेकिन एक बूढ़ी औरत का घर भीषण आग में भी बच गया। अगले दिन गांव के लोगों को बूढ़ी औरत ने बताया कि उसने शीतला माता को ठंडे खाने का भोग लगाया था।
  • मान्यता है कि तभी से शीतला माता को ठंडे खाने का भोग लगाने की परंपरा शुरू हुई है। चैत्र कृष्ण सप्तमी-अष्टमी तिथि की अधिपति देवी शीतला हैं, इसलिए इस दिन देवी को ठंडा भोग लगाते हैं।

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