उत्तराखंड में पहाड़ की चोटी पर रहस्यमयी ‘गुफा ताल’:अंदर शिवलिंग और नाग, खुद बनता चंदन-कुमकुम; पुरातत्व विभाग करेगा जांच

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उत्तराखंड के अल्मोड़ा में पहाड़ की चोटी पर बसा रहस्यमयी ‘गुफा ताल’ लोगों को आकर्षित कर रहा है, यहां गुफा के भीतर शिवलिंग और नाग मौजूद हैं। टपकते पानी से खुद चंदन-कुमकुम बनने और बरसात में भी पानी बाहर न निकलने की घटनाओं ने रहस्य बढ़ाया है, जिस पर अब पुरातत्व विभाग इसकी जांच करेगा। अल्मोड़ा के बाड़ेछीना क्षेत्र के कुमौली गांव के पास यह गुफा सड़क से करीब 300 मीटर की खड़ी चढ़ाई पार करने के बाद पहाड़ी के शिखर पर मिलती है। विशाल चट्टानों के बीच प्राकृतिक रूप से बनी इस गुफा के भीतर करीब 50 फीट लंबा और 20 फीट चौड़ा ताल मौजूद है। ऊंचाई पर स्थित होने के बावजूद सालभर पानी से भरा रहना और इसका स्तर स्थिर बने रहना वैज्ञानिकों व स्थानीय लोगों दोनों के लिए कौतूहल का विषय बना हुआ है। गुफा के भीतर तीन पिलर, सहारा देती प्राकृतिक संरचना गुफा के अंदर तीन से चार पिलर जैसी प्राकृतिक संरचनाएं दिखाई देती हैं, जो मानो पहाड़ को थामे हुए हों। स्थानीय लोगों का कहना है कि ये पूरी तरह प्राकृतिक हैं और किसी मानव द्वारा निर्मित नहीं लगते। पूर्व ग्राम प्रधान गोपाल सिंह के अनुसार, गुफा पूरी तरह प्राकृतिक संरचना है। शिवलिंग पर टपकता जल, खुद बनता चंदन जैसा पदार्थ गुफा के अंदर करीब 20-25 फीट भीतर जाने पर एक शिवलिंग दिखाई देता है। इस पर लगातार ऊपर से पानी टपकता रहता है। ग्रामीणों का दावा है कि इस शिवलिंग पर पीले रंग का चंदन या कुमकुम जैसा पदार्थ बनता रहता है, जिसे श्रद्धालु प्रसाद के रूप में माथे पर लगाते हैं। हाल ही में यहां शिव महापुराण कथा का आयोजन भी हुआ, जिसमें श्रद्धालु गुफा के अंदर जाकर पूजा-अर्चना कर चुके हैं। न काई जमती, न बरसात में छलकता पानी गुफा ताल की सबसे रहस्यमयी बात यह है कि इसमें न तो कभी काई जमती है और न ही भारी बारिश के दौरान इसका पानी बाहर निकलता है। ताल का पानी बेहद ठंडा रहता है, जबकि वर्षों से इसके जल स्तर में कोई खास बदलाव देखने को नहीं मिला है। ग्रामीणों के अनुसार, यह ताल लंबे समय से इसी स्थिति में स्थिर बना हुआ है, जो इसे और भी रहस्यमय बनाता है। अंदर सांप-चमगादड़, फिर भी श्रद्धालु पहुंच रहे गुफा के भीतर अंधेरा रहता है और यहां सांप व चमगादड़ जैसे जीव भी पाए जाते हैं। इसके बावजूद कुछ श्रद्धालु जोखिम उठाकर अंदर जाकर पूजा करते हैं। 80 वर्षीय आनंदी देवी बताती हैं, गुफा का पानी बिल्कुल शुद्ध है। 82 साल के बुजुर्ग बोले- हमेशा से ऐसा ही देखा गांव के 82 वर्षीय रामदत्त भट्ट का कहना है कि उन्होंने बचपन से इस गुफा ताल को इसी रूप में देखा है। उनके मुताबिक, गुफा के अंदर हमेशा पानी रहता है, शिवलिंग पर लगातार जल टपकता है और चंदन जैसा पदार्थ बनता है। औषधीय गुणों की भी मान्यता स्थानीय लोगों का मानना है कि आसपास के जंगलों में पाई जाने वाली जड़ी-बूटियों के कारण इस ताल के पानी में औषधीय गुण भी हो सकते हैं। ग्रामीण बताते हैं कि धार्मिक आयोजनों के दौरान लोग इस पानी का सेवन भी करते हैं। 400-500 साल पुराना होने का अनुमान क्षेत्रीय राज्य पुरातत्व अधिकारी चंद्र सिंह चौहान के अनुसार, कुमौली गांव स्थित इस गुफा ताल की ऐतिहासिकता की जांच की जाएगी। उन्होंने बताया कि पूर्व में यहां करीब 10 लाख रुपए की लागत से सौंदर्यीकरण कार्य किया गया था। अब विभाग की योजना है कि ताल का पानी निकालकर भीतर की मिट्टी की वैज्ञानिक जांच की जाए। इस दौरान यहां से सिक्के, मूर्तियां या अन्य प्राचीन अवशेष मिलने की संभावना जताई जा रही है। प्रारंभिक अनुमान के अनुसार यह संरचना करीब 400 से 500 साल पुरानी, या उससे भी अधिक प्राचीन हो सकती है। ऊपरी क्षेत्र में प्राचीन ‘कोट’ और स्टोरेज के संकेत गुफा ताल के ऊपरी क्षेत्र में ‘माथा कोट’ सहित प्राचीन भंडारण संरचनाओं के अवशेष मिलने से इस स्थान का महत्व और बढ़ गया है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह क्षेत्र पुराने समय में सैन्य चौकी, अनाज भंडारण केंद्र या संकेत प्रणाली (कम्युनिकेशन नेटवर्क) का हिस्सा रहा हो सकता है। इन साक्ष्यों के आधार पर गुफा ताल के ऐतिहासिक महत्व और प्राचीन उपयोग को लेकर नई संभावनाएं सामने आ रही हैं। आस्था के साथ पर्यटन का नया केंद्र बन रहा यह गुफा ताल अब धीरे-धीरे धार्मिक आस्था और पर्यटन दोनों का केंद्र बनता जा रहा है। एक ओर जहां लोग इसे चमत्कार और श्रद्धा से जोड़ रहे हैं, वहीं इसकी अनूठी प्राकृतिक बनावट वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के लिए भी कौतूहल का विषय बनी हुई है। —————– ये खबर भी पढ़ें… उत्तराखंड में 8 मंजिला रहस्यमयी गुफा:बनावट देख वैज्ञानिक-विशेषज्ञ हैरान, ग्लोबल टूरिस्ट डेस्टिनेशन बना रही सरकार पिथौरागढ़ में 200 मीटर गहरी आठ मंजिला गुफा मिली है, जिसे देख वैज्ञानिक और विशेषज्ञ भी हैरान हैं। साल 2020 में गंगोलीहाट में खोजी गई इस ‘महाकालेश्वर गुफा’ के साथ ही क्षेत्र में अब तक 16 गुफाएं मिल चुकी हैं, जिन्हें अब सरकार बड़े ग्लोबल टूरिस्ट डेस्टिनेशन के रूप में विकसित करने जा रही है। (पढ़ें पूरी खबर)

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