Sita navami significance in hindi, sita puja vidhi, vaishakh shukla navami 2026

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16 घंटे पहले

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वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी को सीता नवमी या जानकी नवमी कहा जाता है। इस बार यह पर्व शनिवार, 25 अप्रैल को है। इस अवसर पर भक्त माता सीता और भगवान श्रीराम की विशेष पूजा करते हैं। मान्यता है कि इस दिन माता सीता पृथ्वी से प्रकट हुई थीं। माता सीता को आदर्श पत्नी, धैर्य और पवित्रता की प्रतीक माना जाता है। उनका जीवन संघर्ष, त्याग और मर्यादा की सीख देता है।

ज्योतिषाचार्यों के अनुसार इस दिन किया गया दान और व्रत अत्यंत फलदायी होता है। विशेष रूप से पृथ्वी से जुड़ी चीजों का दान जैसे अनाज, मिट्टी के बर्तन, जल आदि दान देना शुभ माना जाता है। कहा जाता है कि इस दिन किया गया दान कई गुना फल देता है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा बढ़ाता है।

सीता जन्म की कथा

वाल्मीकि रामायण के अनुसार मिथिला के राजा जनक के कोई संतान नहीं थी। वे संतान प्राप्ति के लिए धार्मिक अनुष्ठान और यज्ञ करते थे। एक बार उन्होंने यज्ञ के लिए भूमि तैयार करने का निर्णय लिया।

वैशाख शुक्ल नवमी के दिन, जब राजा जनक खेत में हल चला रहे थे, तभी हल की नोक जमीन में एक स्थान पर अटक गई। जब उस स्थान को खोदा गया तो वहां से एक दिव्य कन्या प्राप्त हुई, जो मिट्टी के घड़े में सुरक्षित थी।

चूंकि यह कन्या धरती पर हल की नोक की वजह से प्राप्त हुई थी, इसलिए इसे “सीता” नाम दिया गया। संस्कृत में हल की रेखा को “सीता” कहा जाता है। आगे चलकर देवी सीता भगवान श्रीराम की पत्नी बनीं और रामायण की कथा का महत्वपूर्ण हिस्सा बनीं।

सीता नवमी की पूजा विधि

  • सीता नवमी के दिन भक्त सुबह जल्दी उठकर स्नान करते हैं और स्वच्छ वस्त्र पहनते हैं। इसके बाद व्रत और पूजा का संकल्प लिया जाता है।
  • सबसे पहले घर के पूजा स्थान को साफ किया जाता है।
  • एक चौकी पर माता सीता और भगवान श्रीराम की मूर्ति या चित्र स्थापित किया जाता है। आप चाहें तो राम दरबार भी स्थापित कर सकते हैं। राम दरबार में राम-सीता के साथ ही लक्ष्मण और हनुमान जी की प्रतिमाएं भी शामिल रहती हैं।
  • पूजा में धूप, दीप, पुष्प, फल और नैवेद्य अर्पित किया जाता है।
  • कुछ स्थानों पर राजा जनक और माता सुनयना की भी पूजा की जाती है।
  • इसके साथ ही धरती माता की पूजा करने की परंपरा भी है, क्योंकि माता सीता का संबंध पृथ्वी से माना जाता है।
  • पूजा में श्रीरामचरितमानस का पाठ करना शुभ माना जाता है। कई लोग इस दिन भजन-कीर्तन भी करते हैं।

व्रत और दान का महत्व

सीता नवमी के दिन व्रत रखने का विशेष महत्व है। व्रती व्यक्ति दिनभर उपवास रखकर केवल फलाहार करता है या निर्जल व्रत भी किया जाता है। शाम को पूजा के बाद व्रत खोला जाता है। इस दिन कुछ लोग मिट्टी के बर्तन में चावल, अनाज या पानी भरकर जरूरतमंदों को दान देते हैं।

सीता माता का जीवन में हमें संयम, धैर्य और सच्चाई का संदेश देता है। माता सीता सीख देती हैं कि कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य और मर्यादा को नहीं छोड़ना चाहिए।

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