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अयोध्या जिले के कुमारगंज स्थित आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में आलूबुखारा (प्लम) की उन्नत प्रजातियों के विकास पर तेजी से काम चल रहा है। यह शोध पूर्वांचल के किसानों के लिए नई उम्मीद लेकर आया है, क्योंकि अब तक आलूबुखारा को केवल पहाड़ी और ठंडे क्षेत्रों की फसल माना जाता रहा है। बदलती कृषि तकनीक और वैज्ञानिक प्रयासों के चलते अब इसे मैदानी इलाकों में भी सफलतापूर्वक उगाने की दिशा में प्रगति हो रही है। विश्वविद्यालय के उद्यान एवं वानिकी महाविद्यालय के फल विज्ञान विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ. निरंजन सिंह ने बताया कि विभागाध्यक्ष डॉ. भानु प्रताप के नेतृत्व में इस परियोजना पर कार्य किया जा रहा है। उन्होंने जानकारी दी कि हिमाचल प्रदेश के डॉ. यशवंत सिंह परमार हॉर्टिकल्चर एवं फॉरेस्ट यूनिवर्सिटी और पंजाब कृषि विश्वविद्यालय लुधियाना से तीन प्रमुख प्रजातियां सतलुज परपल, काला अमृतसरी और आलूबुखारा लाई गई हैं। इन प्रजातियों को विश्वविद्यालय शोध प्रक्षेत्र के विभिन्न स्थानों पर लगाकर परीक्षण किया जा रहा है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि कौन-सी किस्म पूर्वांचल की जलवायु में बेहतर उत्पादन दे सकती है। वर्ष 2023 में शुरू हुए इस शोध के तहत अब तक लगभग 50 पौधे लगाए जा चुके हैं और 2026 में इनमें फल आना भी शुरू हो गया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि अगले 2-3 वर्षों में बेहतर किस्म का चयन कर किसानों को उपलब्ध कराया जा सकेगा। डॉ. निरंजन सिंह ने बताया कि आलूबुखारा पोषण के लिहाज से भी बेहद महत्वपूर्ण फल है। इसमें विटामिन ए, विटामिन सी, फाइबर के साथ-साथ पोटेशियम, फॉस्फोरस, आयरन और कॉपर जैसे तत्व भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं, जो आंखों, त्वचा और रक्त संचार के लिए लाभकारी हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में किसानों को न केवल उन्नत पौधे उपलब्ध कराए जाएंगे, बल्कि खेती से जुड़ी तकनीकी जानकारी भी दी जाएगी। इससे पूर्वांचल के किसान बागवानी की ओर आकर्षित होंगे और पारंपरिक खेती के साथ-साथ नई फसलों से बेहतर आमदनी और मुनाफा कमा सकेंगे।
कृषि विश्वविद्यालय के शोध से बदलेगी बागवानी की तस्वीर:पहाड़ों के बजाय अब पूर्वाचल में होगी आलूबुखारा की खेती
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