उत्तराखंड के 200 गांव बद्रीनाथ धाम को देते थे टैक्स:राजा को भी मंदिर से लेना पड़ा कर्ज, तिब्बत से लामा भेजते थे चाय-गाय

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इस साल महज 13 दिनों में 1.15 लाख से ज्यादा लोग बद्रीनारायण के दर्शन कर चुके हैं। लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब बद्रीनाथ की यात्रा में करीब एक महीने का वक्त लगता था। सिर्फ 90 साल पहले की बात करें तो देवप्रयाग तक भी सड़क नहीं थी, ऋषिकेश से ही यात्रा पैदल शुरू करनी होती थी। हालांकि तब भी हर साल 50-60 हजार लोग इस पवित्र धाम के दर्शन करने आते थे। पहले बद्रीनाथ सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं था, बल्कि एक समय ऐसा भी रहा जब यह गढ़वाल और कुमाऊं के 200 से ज्यादा गांवों पर अधिकार रखने वाला एक शक्तिशाली संस्थान था। इतिहास में एक दौर ऐसा भी आया जब टिहरी के राजा को आर्थिक संकट के समय बद्रीनाथ मंदिर से 50 हजार रुपए का कर्ज लेना पड़ा। इसके साथ ही बद्रीनाथ अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक संपर्क का माध्यम भी रहा है। यहां तिब्बत से हर साल चाय और चंवर गाय जैसी भेंट आती थी और बदले में मंदिर से प्रसाद, वस्त्र और कस्तूरी भेजी जाती थी। इस रिपोर्ट में हम ये भी बताएंगे की वो क्या एतिहासिक मजबूरी थी, जिसके चलते बद्रीनाथ मंदिर में मुख्य पुजारी की व्यवस्था तक बदलनी पड़ी। यहां से शुरू हुई बद्रीनाथ धाम की कहानी आज से 1300 साल पहले एक 23 साल का सन्यासी अपने कुछ अनुयायियों के साथ सैकड़ों दिनों की पदयात्रा कर एक ऐसी घाटी जैसे स्थान पर पहुंचा, जहां से थोड़ी ही दूरी पर बर्फीले पठारों का इलाका शुरू होता था। उसने देखा कि चारों ओर बर्फ से ढकी पहाड़ियां हैं। एक नदी थी, जो अभी-अभी एक ग्लेशियर से निकलकर खुले आसमान के नीचे तेज बहाव के साथ बह रही थी। उस नदी के बेहद ठंडे, हड्डियां कंपा देने वाले पानी से राहत देने के लिए पास में एक गर्म पानी का स्रोत भी था। उस नवयुवक को यह भी समझ में आया कि वह जिस घाटी में खड़ा है, वह हिमालय की पर्वत श्रृंखलाओं के ठीक बीचों-बीच स्थित है। कुछ देर तक उस नवयुवक ने आंखें बंद कीं और जब खोलीं तो उसके मुंह से निकला- यह पूरा इलाका अब वैष्णव क्षेत्र कहलाएगा और इस घाटी में भगवान विष्णु का सबसे बड़ा धाम स्थापित होगा। ये नवयुवक थे आदि शंकराचार्य, जो केरल के कालड़ी गांव से चलकर यहां तक पहुंचे थे। उन्होंने भारत में चार मठों की स्थापना की। आगे चलकर यही शंकर नाम के सन्यासी आदि गुरु शंकराचार्य कहलाए। आदि गुरु शंकराचार्य को हिंदू धर्म की पुनर्स्थापना का श्रेय दिया जाता है। उनके बाद ही सनातन धर्म में शंकराचार्य की परंपरा शुरू हुई। महज 32 साल की उम्र में आदि गुरु ने केदारनाथ में महासमाधि ले ली थी। सदियों में आस्था के साथ बसा बद्रीनाथ का कस्बा सैकड़ों सालों का वक्त बीत गया। कई आपदाएं आईं, कई युद्ध हुए और कई अकालों से समय गुजरा। लेकिन बद्रीनाथ हिंदू धर्म के चार संप्रदायों में से एक वैष्णव संप्रदाय के अनुयायियों का सबसे बड़ा आस्था केंद्र बनता गया। हर साल देशभर से हजारों श्रद्धालु यहां आने लगे। श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ी तो उनकी जरूरतों के लिए दुकानें खुलीं, धर्मशालाएं बनीं और धीरे-धीरे बद्रीनाथ मंदिर के आसपास एक छोटा सा कस्बा बसने लगा। इसी दौरान कई नियम-कायदे बने और कई रोचक घटनाएं भी सामने आईं। मंदिर की आय के दो मुख्य स्त्रोत थे 1928 में टिहरी राजदरबार में वजीर रहे पंडित हरिकृष्ण रतूड़ी ने अपनी किताब ‘गढ़वाल का इतिहास’ में उस समय के बद्रीनाथ धाम की तस्वीर पेश की है। वह लिखते हैं- “मंदिर की आय के दो मुख्य स्रोत थे, पहला भूमि से लिया जाने वाला टैक्स, जिसे मालगुजारी कहा जाता था, और दूसरा श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाया गया चढ़ावा। बड़ी बात ये है कि बद्रीनाथ मंदिर का अल्मोड़ा जिले के 45गांव पर राज है तो अल्मोड़ के 26 गांवों में भूमि है। जिससे साल भर में 1750 रुपए का टैक्स आता है। गढ़वाल में 164 गांव इस मंदिर के अधीन है, जिनसे 5429 रुपए का वार्शिक आय होती है। कुल मिलाकर टैक्स से साल भर में 7179 रुपए की आय होती है।” बद्रीनाथ के अधीन क्यों थे गांव, इसकी एक अलग कहानी एडविन एटकिंसन ने अपने महाग्रंथ हिमालयन गजेटियर में लिखते हैं- “बद्रीनाथ गढ़वाल राजवंश के इष्टदेव हैं। इसलिए यहां गढ़वाल के राजा को बोलंदा बद्री या हिंदी में कहें तो बोलने वाला बद्रीनाथ कहा जाता है। ऐसा भी कहा जाता था कि राज परिवार की गद्दी बद्रीनाथ की ही गद्दी है। गोरखाली आक्रमण के समय टिहरी के राजा ने बद्रीनाथ मंदिर से बतौर कर्ज पचास हजार रूपए लिए थे। बाद में राजा ये उधार लिए रूपए चुकाने में असमर्थ हुआ तो उसने ये सभी गांव बद्रीनाथ मंदिर को सौंप दिए। 1824 में इन सभी गांवों से दो हजार रुपए का राजस्व वसूला गया था। जो की बहुत कम था। उस समय बहुत से गांव बड़े और घनी आबादी वाल थे। उनसे ज्यादा लगान मिल सकता था। लेकिन क्योंकि ज्यादातर गांव ब्राहमणों के है इसलिये इनसे मिलने वाला लगान क्षेत्रफल की तुलना में कम है।” पंडित हरिकष्ण रतूड़ी के अनुसार 19 वीं सदी के पूर्वाद्ध तक ये टैक्स बढ़ गया था। जो की लगभग 7 हजार से ज्यादा हो गया था। बहरहाल, मंदिर के राजस्व का मुख्य जरिया श्रद्धालुओं की ओर से चढ़ाया जाने वाला भेंट ही होती थी।
रतूड़ी बताते हैं कि यहां चढ़ावा तीन प्रकार का है। पहला मंदिर का चढ़ावा, जिसे थाली भेंट भी कहते हैं, दूसरा अटका भेंट और तीसरा गददी भेंट। इन सबसे साल की आय अस्सी से 90 हजार रूपए है। सोना, वस्त्र और मेवा इन सब से अलग है। अब पढ़िए महंत-रावल व्यवस्था की पूरी कहानी…. शंकराचार्य ने खुद तय की पुजारियों की जाति पंडित हरिकृष्ण रतूड़ी के अनुसार, बद्रीनाथ मंदिर की पुजारी परंपरा की शुरुआत आदि शंकराचार्य से जुड़ी मानी जाती है। वे केरल के नंबूदरी ब्राह्मण थे और शुरुआत में वही मंदिर के मुख्य पुजारी भी रहे। केवल पुजारी को ही नारायण की मूर्ती को छूने का अधिकारी था। कहा जाता है कि सन्यास लेने से पहले उनकी मां ने उनसे वचन लिया था कि वे उनके अंतिम संस्कार जरूर करेंगे। जब उनकी मां का निधन हुआ, तो समाज के लोगों ने सन्यासी होने के कारण उन्हें अंतिम संस्कार करने से रोका। ऐसे में शंकराचार्य ने अपनी मां का दाह-संस्कार खुद अपने घर के आंगन में किया। इस दौरान उनके साथ उनके दो रिश्तेदार भी थे, एक चोली और दूसरा मुकाणी जाति का ब्राह्मण। बाद में शंकराचार्य ने इन दोनों जातियों को भी धार्मिक कार्यों में स्थान दिया। इसी वजह से लंबे समय तक नंबूदरी, चोली और मुकाणी। इन तीनों परंपराओं के सन्यासी ही बद्रीनाथ मंदिर के मुख्य पुजारी बनते रहे। 1776 में महंत से एक रावल के हाथ में गई व्यवस्था साल 1776 में बद्रीनाथ मंदिर के महंत रामकृष्ण स्वामी की मृत्यु के बाद एक बड़ी समस्या खड़ी हो गई। उस समय नंबूदरी, चोली या मुकाणी जाति का कोई भी योग्य सन्यासी वहां मौजूद नहीं था, जबकि मंदिर की पूजा को रोका नहीं जा सकता था। उसी दौरान गढ़वाल के राजा पंवार वंश के प्रदीप शाह वहां मौजूद थे। उन्हें पता चला कि मंदिर में भोग बनाने वाला एक नंबूदरी ब्राह्मण गोपाल मौजूद है, लेकिन वह शादीशुदा था और उसकी एक बेटी भी थी। राजा ने गोपाल को बुलाकर मुख्य पुजारी बनने का प्रस्ताव दिया। गोपाल के तैयार होने के बाद उसे महंत रामकृष्ण स्वामी की जगह नियुक्त कर दिया गया। यहीं से परंपरा में बदलाव आया, पहली बार सन्यासी महंत की जगह एक गृहस्थ पुजारी नियुक्त हुआ, जिसे “रावल” कहा गया। इसके बाद से बद्रीनाथ मंदिर की पूजा व्यवस्था महंतों की जगह रावल के हाथों में आ गई, लेकिन पुजारी की परंपरा वही रही- केरल की नंबूदरी, चोली और मुकाणी ब्राह्मण परंपरा। अधिकार को लेकर टिहरी दरबार में आया केस प्रदीप शाह ने तो गोपाल के सारी शर्ते मान ली लेकिन, उन शर्तों के कारण ही आगे चलकर टिहरी के राजा के सामने एक केस आ गया। टिहरी दरबार के वजीर और इतिहासकार पंडित हरिकृष्ण रतूड़ी के अनुसार, राजा प्रताप शाह के समय एक अहम विवाद सामने आया। बद्रीनाथ के रावल पुरुषोत्तम ने लक्ष्मी मंदिर में चढ़ावे को लेकर डिमरी जाति के खिलाफ टिहरी दरबार में मुकदमा दर्ज कराया। रावल का कहना था कि लक्ष्मी मंदिर में आने वाला चढ़ावा डिमरियों को न देकर मंदिर के कोष में जमा होना चाहिए। इस मुकदमे की सुनवाई के दौरान बद्रीनाथ के धर्माधिकारी पंडित गंगादत्त ड्यूंडी ने दरबार में एक पुरानी व्यवस्था का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि जब 1776 में महंत रामकृष्ण स्वामी का निधन हुआ था, तब राजा प्रदीप शाह ने नंबूदरी ब्राह्मण गोपाल को मुख्य पुजारी बनाया था। गोपाल की शर्तों के कारण डिमरी जीते केस गोपाल पहले से शादीशुदा था और उसकी एक बेटी भी थी। उसने पुजारी बनने से पहले राजा के सामने दो शर्तें रखी थीं। पहली- यदि वह मठाधीश बनेगा तो उसकी जाति के लोग उससे विवाह संबंध तोड़ देंगे, जिससे उसकी बेटी का विवाह मुश्किल हो जाएगा। दूसरी- यदि उसे सन्यास लेना पड़ा, तो उसके परिवार का कोई उत्तराधिकारी नहीं रहेगा और परिवार के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो जाएगा। इन बातों को सुनने के बाद राजा प्रदीप शाह ने दरबार में मौजूद ब्राह्मणों को आदेश दिया कि वे गोपाल के परिवार के साथ वैवाहिक संबंध बनाए रखें। साथ ही, उसके परिवार की आजीविका के लिए स्थायी व्यवस्था भी की गई। राजा ने लक्ष्मी मंदिर के चढ़ावे, मंदिर की रसोई और अन्य प्रमुख सेवाओं में गोपाल के परिवार की भूमिका तय की। रहने के लिए उन्हें डिम्मर गांव दिया गया। इसके बाद उनका परिवार “डिमरी” कहलाने लगा। पूरी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि सुनने के बाद टिहरी दरबार ने इस विवाद में डिमरी जाति के पक्ष में फैसला सुनाया। अलग अलग जातियों में बंटी थी जिम्मेदारियां इसके साथ ही मंदिर से जुड़ी अलग-अलग जिम्मेदारियां अन्य जातियों में भी बांटी गईं। जैसे तप्तकुंड के पंडे देवप्रयाग के कोटियाल होते हैं, जबकि ब्रह्मकपाल में हटवाल और कोठियाल जाति के पंडे श्राद्ध कर्म कराते हैं। बद्रीनाथ मंदिर की सारी आय मंदिर के कोष में जमा होती है, जिसका हिसाब रखने वाले “सैण भंडारी” कहलाते हैं। तिब्बत से भेंट की परंपरा और मंदिर के निर्माण पर इतिहासकारों की राय बद्रीनाथ मंदिर में एक समय तिब्बत से जुड़ी खास परंपरा भी निभाई जाती थी। चातुर्मास के दौरान तिब्बत के शासक और धर्मगुरु के प्रतिनिधि मंदिर में चाय, चंवर गाय (याक) और अन्य वस्तुएं भेंट स्वरूप भेजते थे। इसके बदले मंदिर की ओर से प्रसाद, मिठाई, वस्त्र और कस्तूरी तिब्बत भेजी जाती थी। माना जाता है कि तिब्बत पर चीन के कब्जे के बाद यह परंपरा धीरे-धीरे समाप्त हो गई। इतिहासकार पंडित हरिकृष्ण रतूड़ी अपनी पुस्तक में बद्रीनाथ मंदिर के निर्माण को लेकर एक अलग पक्ष रखते हैं। उनके अनुसार मंदिर का इतिहास करीब 2380 साल पुराना माना जाता है। वहीं आदि शंकराचार्य के बारे में यह माना जाता है कि वे 8वीं सदी में बद्रीनाथ पहुंचे थे। रतूड़ी लिखते हैं कि यदि शंकराचार्य का समय 8वीं सदी माना जाए, तो यह कहना सही नहीं होगा कि उन्होंने मंदिर का निर्माण कराया। संभवतः मंदिर पहले से मौजूद था और उन्होंने उसका जीर्णोद्धार किया। वे यह भी बताते हैं कि शंकराचार्य ने उस मूर्ति को, जिसे बौद्धों ने नारदकुंड में डाल दिया था, निकालकर फिर से स्थापित किया और मंदिर की व्यवस्था को पुनर्गठित किया। इसके साथ ही उन्होंने ज्योतिर्मठ की स्थापना की और पूजा-पद्धति की जिम्मेदारी दक्षिण भारत के नंबूदरी, चोली और मुकाणी ब्राह्मणों को सौंपी, जो आगे चलकर बद्रीनाथ की पुजारी परंपरा का आधार बने।

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