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11 घंटे पहले

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शनिवार, 16 मई को ज्येष्ठ मास की अमावस्या है। इस तिथि पर नौ ग्रहों में से एक शनि देव की जयंती मनाई जाती है। इस बार अमावस्या और शनिवार का योग होने से इस पर्व का महत्व और अधिक बढ़ गया है। शास्त्रों के मुताबिक पुराने समय में इसी तिथि पर सूर्य देव और छाया देवी के पुत्र के रूप में शनि देव प्रकट हुए थे। यह दिन शनि देव की कृपा प्राप्त करने और कुंडली के शनि दोषों को शांत करने के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।

उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के मुताबिक, शनि देव न्याय के देवता है। शनि देव ही हमें हमारे कर्मों का फल प्रदान करते हैं। जिन लोगों पर शनि की साढ़ेसाती, ढय्या या महादशा चल रही है, वे लोग शनि जयंती पर शनि देव को सरसों का तेल चढ़ाएं और काले तिल का दान करें। ॐ शं शनैश्चराय नमः मंत्र का जप 108 बार करें। अगर घर के आसपास शनि मंदिर न हो, तो शिवलिंग की पूजा करें। शिवलिंग पर सरसों का तेल और काले तिल अर्पित करें।

शनिदेव भगवान शिव के परम भक्त हैं, शिव कृपा से ही शनि को न्यायाधीश का पद प्राप्त हुआ है। इसलिए शिव पूजा करने वाले भक्तों को शनि देव की कृपा मिलती है। आप चाहें, तो इस दिन हनुमान जी की भी पूजा कर सकते हैं। हनुमान जी की पूजा से भी कुंडली के शनि दोष शांत होते हैं। हनुमान जी के सामने दीपक जलाएं और हनुमान चालीसा का पाठ करें।

शनि देव के जन्म की पौराणिक कथा

प्रचलित पौराणिक कथा के अनुसार शनि, सूर्य देव और उनकी पत्नी छाया के पुत्र हैं। सूर्य देव का विवाह प्रजापति दक्ष की पुत्री संज्ञा से हुआ। कुछ समय बाद सूर्य और संज्ञा की तीन संतानें मनु, यम और यमुना हुईं। इसके बाद कुछ समय तो संज्ञा ने सूर्य के साथ रिश्ता निभाने की कोशिश की, लेकिन संज्ञा सूर्य के तेज को अधिक समय तक सहन नहीं कर पाईं। इसी वजह से संज्ञा ने अपनी छाया को पति सूर्य की सेवा में छोड़ दिया और खुद वहां से चली चली गईं। कुछ समय बाद छाया के गर्भ से शनि देव का जन्म हुआ।

ऐसा है शनि का स्वरूप

शनि देव जन्म से ही श्याम वर्ण, बड़ी आंखों वाले और बड़े केशों वाले हैं। शनिदेव नीले वस्त्र धारण करते हैं और इनका वाहन कौआं है।

शनि देव भगवान सूर्य और छाया के पुत्र हैं। यमराज, मनु और यमुना इनके सौतेले भाई-बहन हैं।

मकर और कुंभ राशि के स्वामी हैं शनि देव

शनि देव को ज्योतिष में न्याय, कर्म और अनुशासन का देवता माना जाता है। मकर और कुंभ राशि के स्वामी शनि हैं। शनि जीवन में कठिनाइयां देकर व्यक्ति को मजबूत बनाते हैं। वे धैर्य, संयम और परिश्रम की सीख देते हैं। शनिवार को शनि पूजा करने की परंपरा है, क्योंकि शनिवार का कारक ग्रह शनि ही है। शनि देव को तेल और काले तिल चढ़ाने का विशेष महत्व है।

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