12 घंटे पहले
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अभी अधिक मास चल रहा है, इस महीने में भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण की कथाएं पढ़ने-सुनने की परंपरा है। यहां जानिए श्रीकृष्ण का एक ऐसा प्रसंग, जिसमें भगवान पर मणि चोरी करने का आरोप लगा था, भगवान ने कैसे खुद को निर्दोष साबित किया, पढ़िए प्रसंग…
महाभारत में भगवान श्रीकृष्ण ने द्वारका नगरी बसा ली थी। द्वारका में सत्राजित नाम का एक व्यक्ति था। वह सूर्य देव का बहुत बड़ा भक्त था। उसकी भक्ति से खुश होकर सूर्य देव ने उसे एक चमत्कारी मणि दी थी, जिसका नाम स्यमंतक मणि था। इस मणि की खास बात यह थी कि वह हर दिन बहुत सारा सोना देती थी। इस कारण सत्राजित बहुत अमीर हो गया था।
एक दिन श्रीकृष्ण ने सत्राजित से कहा, “अगर यह मणि राजकोष में रख दी जाए, तो इसका लाभ पूरी प्रजा को मिलेगा। राज्य के कामों में भी धन का उपयोग हो सकेगा।”
लेकिन सत्राजित को अपनी मणि से बहुत लगाव था। उसने साफ मना कर दिया। श्रीकृष्ण ने उसकी बात का बुरा नहीं माना और अपने महल लौट आए।
सत्राजित का एक भाई था, जिसका नाम प्रसेनजित था। एक दिन उसने चुपके से अपने भाई की स्यमंतक मणि चुरा ली और उसे लेकर जंगल में शिकार खेलने चला गया। जंगल में एक शेर ने उस पर हमला कर दिया और उसे मार डाला। इस दौरान मणि वहीं गिर गई।
जब सत्राजित को अपने भाई और मणि का पता नहीं चला, तो उसने बिना सोचे-समझे पूरे नगर में यह बात फैला दी कि कृष्ण ने मणि चुरा ली है और प्रसेनजित की हत्या कर दी है।
धीरे-धीरे लोग भी यही मानने लगे। श्रीकृष्ण पर चोरी और हत्या का झूठा आरोप लग गया। यह बात सुनकर श्रीकृष्ण ने तय किया कि सच सामने लाना जरूरी है, इसलिए वे खुद मणि की खोज में जंगल चले गए।
जंगल में उन्हें शेर के पंजों के निशान दिखाई दिए। आगे जाकर उन्हें हड्डियों का ढेर मिला। तब वे समझ गए कि प्रसेनजित को शेर ने मार दिया है। श्रीकृष्ण आगे बढ़े और मणि की तलाश करने लगे।
थोड़ी दूर पर उन्हें एक गुफा दिखाई दी। गुफा के बाहर कुछ बच्चे चमकती हुई मणि से खेल रहे थे। श्रीकृष्ण समझ गए कि यही स्यमंतक मणि है। उस गुफा में जामवंत रहते थे। जब श्रीकृष्ण अंदर गए, तो दोनों के बीच भयंकर युद्ध हुआ। कई दिनों तक युद्ध चलता रहा। आखिर में जामवंत ने पहचान लिया कि श्रीकृष्ण कोई साधारण व्यक्ति नहीं हैं। उन्होंने हार मान ली और अपनी पुत्री जामवती का विवाह श्रीकृष्ण से कर दिया। साथ ही स्यमंतक मणि भी उन्हें सौंप दी।
श्रीकृष्ण मणि लेकर द्वारका लौटे और सत्राजित को वापस दे दी। तब सत्राजित को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने श्रीकृष्ण से क्षमा मांगी।
इस प्रसंग से श्रीकृष्ण ने यह सीख दी कि जब किसी पर झूठे आरोप लगते हैं, तो व्यक्ति को घबराना या क्रोधित होना नहीं चाहिए। धैर्य और समझदारी से सच की खोज करनी चाहिए। सच अंत में जरूर सामने आता है।
