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राजस्थान में 66 मरीज हार्ट ट्रांसप्लांट के लिए डोनर का इंतजार कर रहे हैं। इनमें किसी की उम्र 19 साल है तो कोई 16 साल का है। वहीं, कई मरीज इस इंतजार में दम तोड़ चुके हैं। डॉक्टर्स का कहना है कि हर साल करीब 250 से 300 मरीजों को हार्ट ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ती है। लेकिन तमाम कोशिशों के बाद भी प्रदेश के सबसे बड़े एसएमएस अस्पताल में हार्ट ट्रांसप्लांट की मुहिम रफ्तार नहीं पकड़ पा रही है। शुरुआत के बाद से अब तक सिर्फ 9 ट्रांसप्लांट ही हो पाए हैं। आखिर क्या कारण है कि सर्वाइवल रेट 60 फीसदी होने के बावजूद हार्ट ट्रांसप्लांट नहीं हो पा रहे हैं? पढ़िए इस रिपोर्ट में… ट्रांसप्लांट की जरूरत चौमूं के चितवाड़ी गांव में रहने वाले रामकिशोर का हार्ट महज 18 फीसदी ही काम कर रहा है। साल 2012 में वॉल्व बदलने के बाद से लगातार तबीयत खराब हो रही है। करीब एक महीने पहले भी अचानक तबीयत बिगड़ी थी तो डॉक्टरों के मुताबिक बचना भी मुश्किल था। लेकिन एसएमएस अस्पताल के डॉक्टर्स ने जान बचा ली। लेकिन ये भी बता दिया था कि अब हार्ट ट्रांसप्लांट ही आखिरी उम्मीद है। कुछ दिन पहले ही हार्ट ट्रांसप्लांट के लिए डॉक्टर्स ने मरीज को बुलाया भी। लेकिन ब्रेनडेड मरीज से मिलने वाला हार्ट उस काबिल नहीं था कि रामकिशोर को लगाया जा सके। इसलिए हार्ट ट्रांसप्लांट नहीं हो पाया। अब रामकिशोर फिर से डोनेशन का इंतजार कर रहे हैं। ये सिर्फ रामकिशोर की ही कहानी नहीं है। चाकसू की एक करीब 19 साल की लड़की को भी हार्ट ट्रांसप्लांट की जरूरत है। वहीं कोटा के एक 16 साल के युवा को भी हार्ट ट्रांसप्लांट की जरूरत है। राजस्थान में हार्ट के 18 और हार्ट+लंग्स ट्रांसप्लांट के 48 मिलाकर कुल 66 रजिस्टर्ड मरीज डोनर का इंतजार कर रहे हैं। कुछ मरीजों की सही समय पर डोनर नहीं मिलने के कारण मौत भी हो चुकी है। वहीं, कुछ मरीज जरूरत होने पर भी डर के कारण ट्रांसप्लांट नहीं करा रहे हैं। 6 साल पहले शुरुआत, अबतक महज 9 ट्रांसप्लांट साल 2020 में प्रदेश में पहली बार सरकारी क्षेत्र में हार्ट ट्रांसप्लांट की शुरुआत हुई थी। तब ये उम्मीद जगी थी की अब राजस्थान में दिल के मरीजों को लाखों रुपए खर्च कर हार्ट ट्रांसप्लांट के लिए विदेश या फिर देश के दूसरे राज्यों में बड़े अस्पतालों में नहीं जाना पड़ेगा। राज्य सरकार ने हार्ट ट्रांसप्लांट जैसी जटिल सर्जरी को स्वास्थ्य योजनाओं में शामिल कर मुफ्त भी कर दिया था। लेकिन उसके बावजूद भी राजस्थान में हार्ट ट्रांसप्लांट की मुहिम अब तक रफ्तार नहीं पकड़ नहीं पाई है। एसएमएस हॉस्पिटल में अब तक महज 9 मरीजों के हार्ट ट्रांसप्लांट ही हो पाए हैं। मरीजों में डर और डोनेशन को लेकर जागरुकता की कमी और प्रॉपर काउंसलिंग नहीं होने के कारण हार्ट ट्रांसप्लांट की रफ्तार स्लो है। ये हालात तब हैं जब 66 मरीज हार्ट-लंग्स ट्रांसप्लांट के लिए रजिस्टर्ड हैं। यानी उन्हें हार्ट ट्रांसप्लांट की सख्त जरूरत है। लेकिन उनके लिए पीड़ा ये है कि डोनर तैयार नहीं हो रहे। 60 फीसदी है हार्ट ट्रांसप्लांट की सर्वाइवल रेट साल 2020 से लेकर अब तक एसएमएस में 9 मरीजों का हार्ट ट्रांसप्लांट हुआ है तो एक मरीज का हार्ट और लंग्स, दोनों का ट्रांसप्लांट हुआ है। हार्ट ट्रांसप्लांट के बाद चार मरीजों की अब तक मौत हो चुकी है। जबकि 5 मरीज बहुत अच्छे से जीवन जी रहे हैं। आखिर क्यों नहीं हो रहे हार्ट ट्रांसप्लांट 1.ऑर्गन डोनेशन को लेकर जागरुकता की कमी : राजस्थान में ऑर्गन डोनेशन को लेकर अभी भी टैबू बना हुआ है। ब्रेनडेड होने के बाद मरीज के अंगदान को लेकर परिजनों में जागरुकता की कमी है। यही कारण है कि एक्सीडेंट में मौत होने के बाद अंगदान को लेकर परिजन तुरंत फैसला नहीं ले पाते हैं, जिसके कारण से अंगदान नहीं हो पाता है। दूसरा सभी हॉस्पिटल में अंगदान की व्यवस्था भी नहीं है। 2. काउंसलिंग की कमी : ब्रेनडेड मरीज के परिजनों को अंगदान के लिए प्रेरित करने के लिए सबसे आवश्यक होती है काउंसलिंग। लेकिन प्रॉपर काउंसलिंग नहीं हो पाने के कारण समय पर अंगदान नहीं हो पाता है। 3. हार्ट ट्रांसप्लांट को लेकर डर : हार्ट फेल्योर वाले मरीज डर के मारे हार्ट ट्रांसप्लांट कराने से परहेज करते हैं। जब तकलीफ होती है तब अस्पताल में एडमिट होकर इलाज कराते हैं। दवाओं का थोड़ा बहुत असर होता है, फिर वो घर चले जाते हैं। इस दौरान जब कोई हार्ट डोनेट होता है और मरीज को ट्रांसप्लांट के लिए बुलाया जाता है तब डर के कारण मरीज आते नहीं। कोई न कोई बहाना बनाकर टाल देते हैं। 4. हार्ट ट्रांसप्लांट के लिए डेडिकेटेड यूनिट नहीं : हार्ट ट्रांसप्लांट को लेकर एसएमएस अस्पताल में कोई भी डेडिकेटेड यूनिट नहीं है। यूनिट होने से मतलब है कि वहां सिर्फ हार्ट ट्रांसप्लांट के स्पेशलिस्ट और पूरा स्टाफ हो। एसएमएस अस्पताल में पहले से ही हार्ट स्पेशलिस्ट पर रुटीन सर्जरी और चेकअप का प्रेशर है। हालांकि राज्य सरकार ने साल 2020 में हार्ट ट्रांसप्लांट के लिए 20 करोड़ रुपए खर्च कर अत्याधुनिक सेंटर तैयार किया था। अब हार्ट ट्रांसप्लांट की प्रॉपर सुविधा के लिए 6 एसोसिएट प्रोफेसर की डिमांड भी रखी गई है। कई बार मरीज भी तैयार नहीं होते एसएमएस अस्पताल में सीटीवीएस डिपार्टमेंट (कार्डियोथोरेसिक एंड वेस्कुलर सर्जरी डिपार्टमेंट) के एचओडी डॉ. अनिल शर्मा ने बताया कि हार्ट ट्रांसप्लांट करने में कई तरह के लॉजिस्टिक इश्यूज आते हैं। कई बार तो डोनेशन को लेकर परिजन तैयार नहीं होते हैं। तो कई बार रिसिपिएंट (जिसे ट्रांसप्लांट की जरूरत है) भी तैयार नहीं होते हैं। रजिस्टर्ड मरीज हार्ट डोनेट होने के बावजूद ट्रांसप्लांट के लिए तैयार नहीं होते हैं, जिसके कारण उनकी मौत भी हो चुकी हैं। उन्होंने बताया कि कोरोना काल में हमारे रिजल्ट कॉम्प्रोमाइज हुए। लेकिन हमारी सर्वाइवल रेट 60 फीसदी से ज्यादा है। उन्होंने बताया कि राजस्थान में हर साल 250 से 300 मरीजों को हार्ट ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ती है। लेकिन वे रजिस्टर्ड ही नहीं हो पाते हैं। प्रोफेसर डॉ. सुनील बताते हैं- हार्ट फेल्योर की दिक्कतों का सामना कर रहे मरीजों को हम दवा से ठीक करने की कोशिश करते हैं। लेकिन जैसे ही उनको कुछ राहत मिलती है वे हार्ट ट्रांसप्लांट का खतरा उठाने से झिझकने लग जाते हैं। ऐसे में दौरान जब हार्ट ट्रांसप्लांट का नंबर आता है तब वे मना कर देते हैं। राजस्थान में हार्ट ट्रांसप्लांट के रजिस्टर्ड मरीजों की संख्या बहुत कम है। क्योंकि ज्यादातर मरीजों को कार्डियोलॉजिस्ट या फिजिशियन दवाओं से ही इलाज करते रहते हैं और उन्हें हार्ट ट्रांसप्लांट की सलाह ही नहीं दी जाती है। समय पर रिसिपिएंट के ना आने के कारण हार्ट को दूसरे अस्पताल या राज्य में भेज दिया जाता है। एसएमएस मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. दीपक माहेश्वरी ने माना की पिछले सालों की तुलना में इस बार नंबर्स कुछ कम हैं। लेकिन हमारी टीम पूरी तरह से प्रशिक्षित है और परिणाम भी सकारात्मक हैं। लेकिन डोनर और रिसिपिएंट में जागरुकता की कमी के कारण प्रक्रिया प्रभावित होती है।
19 साल की लड़की, हार्ट ट्रांसप्लांट जरूरी, लेकिन डोनर नहीं:प्रदेश के 66 मरीज कर रहे जिंदगी के लिए इंतजार, हर साल 300 को पड़ती है जरूरत
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