कंबल ओढ़े बाबा के अचानक आगमन से शुरू हुई वह कहानी, जिसने कैंची धाम को आस्था का केंद्र बना दिया।
आज जिस कैंची धाम में देश-दुनिया से लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं, उसकी स्थापना और मंदिर निर्माण की कहानी भी किसी दिव्य संस्मरण से कम नहीं है। यह कहानी उस दिन से शुरू होती है, जब नीब करौली बाबा पहली बार कैंची पहुंचे और पूर्णानंद तिवारी से उ
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15 जून को कैंची धाम का विग्रह स्थापना दिवस मनाया जाएगा। हर साल इस अवसर पर देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु नीम करौली बाबा के दर्शन और आशीर्वाद के लिए यहां पहुंचते हैं। लेकिन जिस विश्वविख्यात धाम में आज श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ता है, उसकी शुरुआत एक साधारण-सी मुलाकात से हुई थी। विजय छाबरिया और डॉ. दीपक पटवर्धन की किताब ‘दिव्य अनुभूति’ में प्रकाशित उमेश तिवारी के संस्मरण के अनुसार, एक दोपहर वह अपनी बड़ी बहन के साथ गाय चराकर घर लौटे थे। दोनों घर के पास स्थित एक पुराने खंडहरनुमा ढांचे में खेल रहे थे। तभी वहां एक एम्बेसडर कार आकर रुकी। कार से दो व्यक्ति उतरे, जिनमें से एक ने कंबल ओढ़ रखा था।
वह बिना किसी औपचारिकता के सीधे घर के बाहरी कक्ष में पहुंचे और वहां रखी लकड़ी की पुरानी तख्त पर विश्राम करने लगे, जबकि उनके साथ आया व्यक्ति उन्हें पंखा झलने लगा। उस समय किसी को अंदाजा नहीं था कि यह आगमन आगे चलकर कैंची धाम के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय बनने वाला है।

कैंची धाम की स्थापना से जुड़ा वह ऐतिहासिक क्षण, जब कंबल ओढ़े नीब करौली बाबा पहली बार कैंची पहुंचे।
बच्चों का गुस्सा पलभर में श्रद्धा में बदल गया
उमेश तिवारी बताते हैं कि खेल की जगह पर अजनबियों का कब्जा देखकर वह और उनकी बहन नाराज हो गए। दोनों उन्हें वहां से हटाने के इरादे से कमरे में पहुंचे, लेकिन जैसे ही उस संत के चेहरे पर नजर पड़ी, उनका सारा क्रोध समाप्त हो गया। उनकी आंखों में ऐसी शांति और दिव्य आभा थी कि दोनों अनायास उनके चरणों में झुक गए।
इसके बाद संत ने स्नेहपूर्वक पूछा,
तुम्हारे पिता कहां हैं? जाकर उन्हें बुलाओ।

दोनों बच्चे घर पहुंचे। उस समय उनके पिता पूर्णानंद तिवारी भोजन कर रहे थे। बच्चों ने बताया कि एक कंबल वाले बाबा उन्हें बुला रहे हैं। इस पर पूर्णानंद तिवारी ने सहज भाव से कहा,
जाकर कह दो कि मुझे बुखार है और मैं सो रहा हूं।


कैंची धाम के प्रारंभिक इतिहास से जुड़ी दुर्लभ तस्वीर में पूर्णानंद तिवारी दंपती।
‘वहां बैठकर खाना खा रहा है और कहता है सो रहा हूं’
बच्चों ने जाकर वही संदेश बाबा को सुना दिया। यह सुनते ही बाबा जोर से हंस पड़े और बोले, देखो इस आदमी को। वहां बैठकर खाना खा रहा है और कहता है कि सो रहा है। फिर उन्होंने अपने साथी उपेंद्र को आदेश दिया,
जाओ, जरूरत पड़े तो पूर्णानंद को कंधों पर उठाकर ले आओ। मैं उससे मिलने आया हूं और बिना मिले नहीं जाऊंगा।

जब बच्चों ने यह बात अपने पिता को बताई तो वह चौंक गए। उन्हें एहसास हुआ कि यह कोई साधारण संत नहीं हैं। वह तुरंत भोजन छोड़कर, हाथ धोकर नंगे पैर ही बाबा से मिलने दौड़ पड़े। परिवार के अन्य सदस्य भी उनके पीछे-पीछे पहुंच गए।
उमेश तिवारी के अनुसार, यही वह क्षण था जब कैंची की पवित्र भूमि पर उस आध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत हुई, जिसने आगे चलकर कैंची धाम को करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना दिया।

उमेश तिवारी ने साझा किए हैं कैंची धाम की स्थापना से जुड़े संस्मरण।
बाबा ने पूछा- मंदिर कहां बनाना चाहिए?
मुलाकात के बाद बाबा ने अपने आगमन का उद्देश्य बताया। उन्होंने पूर्णानंद तिवारी से कहा,
मैं यहां तुम्हारी कैंची में एक मंदिर बनाना चाहता हूं। बताओ, इसे कहां बनाया जाए? तुम जहां कहोगे, मैं वहीं निर्माण करूंगा।

पूर्णानंद तिवारी ने विनम्रता से उत्तर दिया, बाबाजी, आप त्रिकालदर्शी हैं। भूत, भविष्य और वर्तमान सब आपकी दृष्टि में है। आपको मार्ग दिखाने वाला मैं कौन होता हूं?
लेकिन बाबा अपनी बात पर अड़े रहे। उन्होंने कहा,
तुम सच्चे और निष्कपट भक्त हो। मुझे तुम्हारी पसंद चाहिए।

इस पर पूर्णानंद तिवारी ने नदी किनारे एक स्थान की ओर संकेत करते हुए बताया कि वहां कमलागिरी बाबा और सोमवारी बाबा जैसे सिद्ध संतों ने तपस्या की थी। बाबा ने तुरंत कहा, मुझे वह स्थान दिखाओ।
नदी किनारे खड़े होकर बोले- यही वह जगह है
बाबा के पीछे-पीछे लोगों का समूह नदी पार कर उस स्थान तक पहुंचा। वहां एक बड़ी शिला पर खड़े होकर उन्होंने आसपास की पर्वत श्रृंखलाओं को देखा और कहा,
पूर्णानंद, यही वह स्थान है। मैं कल फिर आऊंगा।

इस पर पूर्णानंद तिवारी ने अपनी चिंता जताई कि यह जमीन उनकी नहीं, बल्कि वन विभाग की सरकारी भूमि है और विभाग निर्माण की अनुमति नहीं देगा।
बाबा ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, यह सिद्धों की तपोभूमि है। मंदिर का निर्माण यहीं होगा।

जब पूर्णानंद तिवारी को एहसास हुआ कि यह साधारण संत नहीं हैं, वे भोजन छोड़कर नंगे पैर मिलने दौड़ पड़े।
अगले दिन वन अधिकारियों को लेकर पहुंचे
संस्मरण के अनुसार, बाबा अगले दिन अपने वादे के मुताबिक फिर लौटे। इस बार उनके साथ वन संरक्षक श्री सोनी और उनकी टीम भी थी। सभी लोग नदी पार कर घने जंगल की ओर गए। वहां चारों तरफ कंटीली झाड़ियां थीं। बाबा ने पूर्णानंद तिवारी से पूछा, इसके भीतर कैसे जाएंगे?
इस पर उन्होंने कहा कि यह उनका रोज का काम है और 15-20 मिनट में रास्ता साफ कर देंगे। कुछ ही देर में झाड़ियां हटाकर एक खुला स्थान तैयार कर दिया गया।
फूल फेंका और धुनी का स्थान खोज निकाला
बाबा उस जगह कुछ देर टहलते रहे। फिर उन्होंने अपने हाथ का एक फूल हवा में उछाल दिया और कहा, जहां यह फूल गिरा है, वहीं खुदाई करो। जब गहराई के बारे में पूछा गया तो बाबा ने कहा,
तुमने बताया था कि यहां सिद्ध संतों ने तपस्या की थी। यही उनकी धुनी का स्थान है। जब तक भस्म न मिले, तब तक खोदते रहो।

करीब डेढ़ फीट खुदाई के बाद वहां प्राचीन भस्म की परत और पत्थरों से बनी धुनी की संरचना मिली। इसे देखकर बाबा संतुष्ट हो गए और कहा गया कि भूमि का आध्यात्मिक केंद्र मिल चुका है।
वन मंत्री चौधरी चरण सिंह से मांगी जमीन
इसके बाद बाबा ने पूर्णानंद तिवारी से पूछा कि क्या वह मंदिर निर्माण में उनका साथ देंगे। जवाब मिला, मैं सर्वस्व के साथ आपके साथ हूं।
फिर बाबा ने वन संरक्षक श्री सोनी के सामने मंदिर निर्माण की इच्छा रखी। अधिकारी ने कहा कि मंदिर के लिए वन मंत्री की अनुमति जरूरी होगी। जब बाबा ने पूछा कि मंत्री कौन हैं, तो उन्हें बताया गया कि चौधरी चरण सिंह वन मंत्री हैं।
इस पर बाबा हंसते हुए बोले,
वह जुबान का कड़वा है, लेकिन दिल का साफ और सच्चा भक्त है। मैं उससे बात करूंगा।


पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह को बाबा ने दिया था आशीर्वाद।
चरण सिंह को दिया प्रधानमंत्री बनने का आशीर्वाद
अगले ही दिन चौधरी चरण सिंह कैंची पहुंचे। बाबा उन्हें धुनी वाले स्थान पर ले गए और मंदिर निर्माण की इच्छा बताई। चरण सिंह ने स्थान का निरीक्षण करने के बाद अधिकारियों को निर्देश दिया कि बाबा को जितनी जमीन चाहिए, उससे दोगुनी या चार गुनी जमीन उपलब्ध कराई जाए। उन्होंने मात्र एक रुपये वार्षिक लीज पर सरकारी दस्तावेज तैयार करने के भी आदेश दिए और कहा कि निर्माण कार्य तुरंत शुरू किया जा सकता है।
इससे प्रसन्न होकर बाबा ने उनकी पीठ थपथपाई और कहा,
तुम बड़े आदमी हो, बड़ी कुर्सी पर बैठे हो। थोड़ा नरम बोला करो, लेकिन तुम सच्चे भक्त हो। आज तुमने मंदिर का मार्ग आसान कर दिया है।

इसके बाद बाबा ने उन्हें आशीर्वाद देते हुए कहा, एक दिन तू इस देश का प्रधानमंत्री बनेगा।
वर्षों बाद यह भविष्यवाणी सच साबित हुई और चौधरी चरण सिंह देश के प्रधानमंत्री बने।

कैंची धाम में सालभर भारी संख्या में पहुंचते हैं श्रद्धालु।
पहली ईंट भी पूर्णानंद तिवारी के हाथों रखवाई
उमेश तिवारी बताते हैं कि इसके बाद बाबा और उनके पिता के बीच संबंध कृष्ण और सुदामा जैसे हो गए। जब कैंची मंदिर की नींव रखी गई तो बाबा ने पहली ईंट पूर्णानंद तिवारी के हाथों से रखवाई। बाद में कानपुर के पनकी मंदिर के निर्माण के दौरान भी उन्हें विशेष रूप से साथ ले जाया गया और नींव का पत्थर उन्हीं के हाथों से रखवाया गया।
उमेश तिवारी के अनुसार, बाबा भले ही आज स्थूल रूप में भक्तों के बीच नहीं हैं, लेकिन उनके द्वारा शुरू किए गए कार्य और उनकी स्मृतियां आज भी श्रद्धालुओं के हृदय में आस्था और आध्यात्मिक चेतना का संचार कर रही हैं।

1960 में शिप्रा नदी किनारे स्थापित हुआ था धाम
कैंची धाम उत्तराखंड के नैनीताल जिले में भवाली के पास स्थित है। बाबा नीब करौली महाराज ने 1960 के दशक में शिप्रा नदी के किनारे इस आश्रम और हनुमान मंदिर की स्थापना की थी। यह स्थान अपनी आध्यात्मिक शांति और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए देश-विदेश में प्रसिद्ध है।

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उत्तराखंड के नैनीताल में स्थित विश्वविख्यात बाबा नीम करोली महाराज का कैंची धाम एक बार फिर सुर्खियों में है। देश-विदेश के लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बन चुके इस मंदिर में अब युवाओं की संख्या तेजी से बढ़ रही है। (पढ़ें पूरी खबर)