Presentation of traditional Tamasha ‘Gopichand Bhartrihari’ in Amer | आमेर में पारंपरिक तमाशा ‘गोपीचंद भर्तृहरि’ की प्रस्तुति: 200 साल से ज्यादा पुरानी है परम्परा, गोपीचंद की भूमिका में नजर आए दिलीप भट्ट – Jaipur News

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राजस्थान की 200 वर्ष पुरानी लोक नाट्य परंपरा तमाशा के अंतर्गत गोपीचंद भर्तृहरि का भव्य मंचन आमेर के अंबिकेश्वर महादेव मंदिर प्रांगण में किया गया।

राजस्थान की 200 वर्ष पुरानी लोक नाट्य परंपरा तमाशा के अंतर्गत गोपीचंद भर्तृहरि का भव्य मंचन आमेर के अंबिकेश्वर महादेव मंदिर प्रांगण में किया गया। इस ऐतिहासिक तमाशे का आयोजन परम्परा नाट्य समिति, भारतीय विद्या भवन इन्फोसिस फाउंडेशन, कल्चरल आउटरीच प्रोग

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तमाशे की प्रस्तुति को विशेष बनाने के लिए इसे शास्त्रीय रागों मालकौंस, पहाड़ी, भोपाली, भैरवी, केदार, सिंधकाफी, बिहाग और वृंदावनी सारंग में गाया गया। तमाशे में इस बार गोपीचंद के पोते सचिन भट्ट ने गुरु जालंधर नाथ की भूमिका निभाई, जबकि गोपीचंद की भूमिका में दिलीप भट्ट ने शानदार अभिनय किया। वहीं, माता मैनावती की भूमिका ईश्वर दत्त माथुर ने निभाई। इसके अतिरिक्त हर्ष भट्ट ने रानी पाटम दे और बाल कलाकार जीवितेश शर्मा ने बहन चंद्रावली की भूमिका में दमदार प्रस्तुति दी।

गोपीचंद की भूमिका में दिलीप भट्ट ने शानदार अभिनय किया।

गोपीचंद की भूमिका में दिलीप भट्ट ने शानदार अभिनय किया।

तमाशे की कथा और प्रस्तुति

चार घंटे तक चले इस तमाशे की शुरुआत गणेश वंदना से हुई, जिसे पहाड़ी और भोपाली राग में प्रस्तुत किया गया। इसके बाद ‘माता सुनो हमारी बात, काहे सोच करो दिन रात’ गीत को राग मालकौंस में गाया गया। इस तमाशे की कथा राजा गोपीचंद की जीवन यात्रा को दर्शाती है, जिसमें उनके जोगी बनने की प्रेरणा, माता मैनावती का मोह, गुरु जालंधर नाथ का मार्गदर्शन और त्याग एवं बलिदान की गाथा शामिल है।

संगीत और संगतकारों का उत्कृष्ट योगदान

तमाशे के दौरान तबले पर शैलेंद्र शर्मा, सारंगी पर मनोहर टांक, हारमोनियम पर शेर खान और गिर्राज बालोदिया ने उत्कृष्ट संगत दी, जिससे संगीतमय माहौल और भी मंत्रमुग्ध कर देने वाला बन गया।

तमाशे के बाद दिलीप भट्ट द्वारा पारंपरिक गणगौर गायन भी प्रस्तुत किया गया, जिसमें ‘रंगीला शंभु गौरा न ले पधारो महारा पांवणा’ और ‘काले भुजंग सिर धरे इक जोगी आया है’ जैसे लोकगीतों ने दर्शकों को भावविभोर कर दिया। इसके साथ ही युवाओं द्वारा हनुमान चालीसा पाठ भी किया गया।

इस पारंपरिक तमाशे को भट्ट परिवार की छठी और सातवीं पीढ़ी द्वारा प्रस्तुत किया गया। यह तमाशा हर वर्ष होली के पंद्रह दिन बाद चैत्र अमावस्या को आयोजित किया जाता है, जिसमें गणगौर पूजने का निमंत्रण भी दिया जाता है।

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