HC gave instructions to investigate the Alwar Balika Griha | HC ने बालिका गृह अलवर की जांच के दिए निर्देश: बालिकाओं ने लैटर लिखकर अधिकारियों पर लगाया था शोषण का आरोप, केयर लीवर्स को लेकर लिया स्वप्रेरित प्रंसज्ञान – Jaipur News

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राजस्थान हाईकोर्ट ने बालिका गृह अलवर की जांच के निर्देश दिए हैं। जस्टिस अनूप ढंढ की अदालत ने यह निर्देश बालिका गृह की बालिकाओं द्वारा भेजे गए पत्र को स्वप्रेरित प्रसंज्ञान के रूप में दर्ज करते हुए दिए।

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पत्र में बालिकाओं द्वारा कहा गया था कि अधिकारियों की लापरवाही के चलते उनके गृह को अनुदान नहीं मिल सका। जिससे उनके सामने जीवनयापन का गंभीर संकट खड़ा हो गया हैं। इसके साथ ही पत्र में बालिकाओं ने अधिकारियों पर शोषण करने का आरोप भी लगाया।

हाईकोर्ट ने जिला कलक्टर अलवर और जिला विधिक सेवा प्राधिकरण अलवर के सचिव को निर्देश दिए है कि वह बालिका गृह अलवर का निरीक्षण करें। वहां रहने वाले बच्चियों और स्टॉफ के बयान दर्ज करे। वहीं यह सुनिश्चित करे कि बालिकाओं के साथ किसी भी तरह का शोषण नही हो।

केयर लीवर्स की समस्याओं को लेकर स्वप्रेरित प्रसंज्ञान जस्टिस अनूप ढंढ ने स्वप्रेरित प्रसंज्ञान में केयर लीवर्स की समस्याओं को लेकर भी दिशा निर्देश दिए। केयर लीवर्स ऐसे अनाथ युवाओं को कहा जाता है जो 18 वर्ष की आयु होने पर आश्रय स्थल, अनाथालय, शेल्टर होम से निकाल दिए जाते हैं।

अदालत ने कहा कि ऐसे बच्चे अनाथ होने, किसी अपराध में फंसने व अन्य कारणों से बचपन से ही अनाथालय, शेल्टर होम में रहते हैं। लेकिन 18 साल की आयु होने पर इन्हें इन आश्रय स्थल से निकाल दिया जाता हैं।

लेकिन इन बच्चों के पास ना तो कोई पहचान पत्र होता है, ना ही कोई ठिकाना। ऐसे में इनके सामने कई तरह की समस्याएं खड़ी हो जाती हैं। इसलिए जरूरी है कि केन्द्र और राज्य सरकार ऐसे युवाओं के लिए नीति निर्माण करें।

अदालत ने इस बात पर भी चिंता जाहिर की है कि ऐसे युवाओं का कोई रिकोर्ड तक नहीं रखा जाता हैं। जिससे इन्हें ट्रेक किया जा सके। ऐसे में यह युवा अपराध के रास्ते पर निकल जाते है अथवा किसी अन्य के द्वारा इनका शोषण होता रहता हैं।

केन्द्र और राज्य सरकार को 8 निर्देश अदालत ने अपने आदेश में नेल्सन मंडेला के विचारों को कोट करते हुए कहा कि समाज का असली चरित्र इस बात से पता चलता है कि वह अपने बच्चों के साथ कैसा व्यवहार करता है। अदालत ने कहा कि ऐसे बच्चों के लिए आश्रय स्थल में वित्तीय साक्षरता, कौशल प्रशिक्षण और स्वतंत्र जीवन जीने की तैयारी शुरू होनी चाहिए। जिससे 18 साल के होने पर उन्हें पता हो कि उन्हें क्या करना हैं।

वहीं आश्रय स्थल में ही ऐसे बच्चों के पहचान पत्र (आधार, वोटर आईडी, पेन कार्ड) बनाने की व्यवस्था होनी चाहिए। ऐसे बच्चों को जीवन कौशल प्रशिक्षण देने की व्यवस्था होनी चाहिए, जिससे यह बाहरी दुनिया में समायोजित हो सके।

ऐसे युवाओं के लिए सरकार अलग से अस्थायी रूप से आश्रय स्थलों की व्यवस्था करें। जिसमें वह अपनी व्यवस्था होने तक रह सके। ऐसे केयर लीवर्स को रोजगार उपलब्ध कराने वाले संस्थानों को विशेष छूट दी जाए। जिससे इन्हें अधिक से अधिक रोजगार मिल सके।

वहीं आश्रय स्थलों को इनका डेटाबेस भी संधारित करने के निर्देश दिए गए हैं। जिससे आश्रय स्थल से निकलने पर इन्हें ट्रेक किया जा सके। अदालत ने अगली सुनवाई तक केन्द्र और राज्य सरकार से इन निर्देशों की पालना रिपोर्ट तलब की हैं।

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