Asim Munir Powers; Pakistan Army Navy Air Force Chief | 27th Amendment | आसिम मुनीर के लिए पाकिस्तान ने संविधान बदला: तीनों सेनाओं के प्रमुख बनेंगे, पहली बार ये पद बनाया गया; मई में फील्डमार्शल बने थे

Actionpunjab
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इस्लामाबाद18 मिनट पहले

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पाकिस्तानी संसद ने आर्मी चीफ आसिम मुनीर को तीनों सेनाओं का प्रमुख बनाने के लिए संविधान में बदलाव किया है। अब उन्हें देश का पहला चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज (CDF) बनाया जाएगा। यह भारत के चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) की तरह होगा।

यह नया पद इसलिए बनाया गया है ताकि सेना, नौसेना और वायुसेना आपस में मिलकर बेहतर तरीके से काम कर सकें और तीनों की कमान एक जगह से संभाली जा सके।

इससे पहले ऑपरेशन सिंदूर के बाद इस साल 20 मई को पाकिस्तानी सरकार ने आसिम मुनीर को फील्ड मार्शल का दर्जा दिया था।

मुनीर से पहले 1959 में सैन्य तानाशाह अयूब खान ने खुद को फील्ड मार्शल घोषित कर दिया था। फील्ड मार्शल पाकिस्तान सेना में सर्वोच्च सैन्य रैंक है, जो एक फाइव स्टार रैंक मानी जाती है।

यह रैंक जनरल (फोर स्टार) से ऊपर है। पाकिस्तान में फील्ड मार्शल का पद सेना, नौसेना और वायुसेना में सबसे ऊंचा होता है।

मुनीर को 6 महीने में 2 बड़े प्रमोशन मिले

मुनीर को 6 महीने में 2 बड़ा प्रमोशन मिला है। पाकिस्तानी मीडिया के मुताबिक चीफ ऑफ फोर्सेस बनाने का फैसला मई में भारत और पाकिस्तान के बीच हुई चार दिन की झड़प से मिली सीख के बाद लिया गया है।

पाकिस्तान ने महसूस किया कि जंग में तीनों सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल और तुरंत एक्शन लेना बहुत जरूरी है। इसीलिए अब ऐसी यूनीफाइड कमांड सिस्टम लाई जा रही है, ताकि थलसेना, नौसेना और वायुसेना मिलकर एक साथ और तेजी से जवाब दे सकें।

संसद में 27वां संशोधन विधेयक पास

पाकिस्तान की संसद में शनिवार को 27वां संविधान संशोधन विधेयक पेश किया गया, जिसे पास कर दिया गया है। यह संविधान के अनुच्छेद 243 में बदलाव से जुड़ा है। इसमें आर्म्ड फोर्स से जुड़े 5 बड़े बदलाव किए जा रहे हैं।

  1. राष्ट्रपति अब प्रधानमंत्री की सलाह पर आर्मी चीफ और चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज, दोनों की नियुक्ति करेंगे।
  2. थलसेना प्रमुख को ही चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज का पद भी दिया जाएगा।
  3. नेशनल स्ट्रैटजिक कमांड बनाया जाएगा। प्रधानमंत्री की सलाह से चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज इसके मुखिया की नियुक्ति करेंगे। इस कमांड का नेतृत्व पाकिस्तान आर्मी का अधिकारी करेगा।
  4. सरकार को अब अधिकारियों को फील्ड मार्शल, एयर फोर्स मार्शल और एडमिरल ऑफ द फ्लीट जैसे विशेष रैंक देने की मंजूरी होगी। इनमें से फील्ड मार्शल का पद आजीवन रहेगा।
  5. मौजूदा चेयरमैन, जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी का पद 27 नवंबर 2025 के बाद खत्म हो जाएगा

संवैधानिक अदालत बनाने का प्रावधान

27वां संशोधन सिर्फ सेना से जुड़ा नहीं है। इसके जरिए कुछ और बड़े बदलाव भी किए जा रहे हैं।

इनमें संवैधानिक अदालत की स्थापना, हाई कोर्ट जजों की बहाली और ट्रांसफर, राज्यों को मिलने वाली राजस्व हिस्सेदारी में बदलाव, अनुच्छेद 243 में संशोधन, शिक्षा और जनसंख्या नियोजन से जुड़ी शक्तियों को संघ को वापस करने और चुनाव आयोग की नियुक्तियों में मुश्किलों को खत्म करने जैसी चीजें शामिल हैं।

संवैधानिक अदालत क्या है?

फेडरल कॉन्स्टिट्यूशनल कोर्ट यानी संवैधानिक अदालत संविधान संशोधन का एक अहम प्रस्ताव है। यह अदालत खास तौर पर संविधान से जुड़े मामलों की सुनवाई करेगी। जैसे कि केंद्र और प्रांतीय सरकारों के बीच विवाद, कानूनों की संवैधानिक वैधता और संवैधानिक अधिकारों से जुड़े मामले।

अभी पाकिस्तान में सुप्रीम कोर्ट ही ऐसे मामलों की सुनवाई करता है, लेकिन नई अदालत बनने के बाद संवैधानिक मामलों की जिम्मेदारी अलग अदालत को मिल जाएगी। इससे सुप्रीम कोर्ट का बोझ कम होगा और संवैधानिक मुद्दों पर तेजी से फैसला हो सकेगा।

राज्यों को मिलने वाले फंड में भी बड़ा बदलाव

27वें संशोधन में एक बड़ा फैसला यह है कि अब केंद्र और राज्यों (प्रांतों) के बीच पैसों के बंटवारे के नियम बदल सकते हैं।

अभी पाकिस्तान में नेशनल फाइनेंस कमीशन (NFC) यह तय करता है कि टैक्स से मिलने वाली कमाई में से कितना पैसा केंद्र के पास रहेगा और कितना राज्यों को मिलेगा।

संविधान में एक नियम है, अनुच्छेद 160(3A)। इसमें लिखा है कि जब तक नया समझौता (NFC अवॉर्ड) नहीं होता, तब तक पुराना वाला ही चलता रहेगा और राज्यों का हिस्सा कम नहीं किया जा सकता। यानी राज्यों को कम से कम एक तय हिस्सा मिलना गारंटी होता है।

लेकिन अब नए संशोधन में इसी नियम को बदलने या हटाने की बात है। अगर ऐसा हुआ तो केंद्र सरकार जरूरत पड़ने पर राज्यों को मिलने वाला पैसा कम कर सकेगी।

मतलब अगर देश की आमदनी कम हो जाए या आर्थिक हालत खराब हो, तो सरकार कह सकती है कि राज्यों को अब पहले जितना हिस्सा नहीं दिया जा सकता।

केंद्र सरकार का कहना है कि अभी ज्यादातर टैक्स का पैसा राज्यों के पास चला जाता है, जबकि कर्ज, सेना और विकास परियोजनाओं का भारी खर्च केंद्र को उठाना पड़ता है। इसलिए पैसों के बंटवारे में लचीलापन जरूरी है।

दूसरी तरफ, सिंध और बलूचिस्तान जैसे राज्य इसका विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि इससे उनकी फंडिंग कम हो जाएगी और यह संविधान के खिलाफ है, जो राज्यों को वित्तीय अधिकार देता है।

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