नई दिल्ली4 घंटे पहले
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आईपीसी की धारा 354सी में ताक-झांक को लेकर नियम बताए गए हैं। फोटो- AI जनरेटेड
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि महिला अगर निजी पलों में नहीं है तो उसकी सहमति के बिना फोटो लेना या मोबाइल से वीडियो बनाना IPC की धारा 354C के तहत अपराध नहीं है। जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने कलकत्ता हाईकोर्ट के फैसले पर मुहर लगाते हुए एक आरोपी को बरी कर दिया।
बेंच ने पुलिस और ट्रायल कोर्ट को भी फटकार लगाई कि उन्होंने केस में ताक-झांक का आरोप इसलिए लगाया क्योंकि महिला को विवादित संपत्ति में जाते हुए वीडियो शूट किया था।
बेंच ने कहा- आरोप में मर्यादा भंग के तत्व पूरे नहीं होते
शिकायतकर्ता 18 मार्च 2020 को कुछ वर्कर्स के साथ एक प्रॉपर्टी में जा रही थी। इसी दौरान आरोपी ने उसका वीडियो बनाया था। महिला ने इस पर शिकायत की थी कि ये फोटो और वीडियो बनाना निजता में दखल है और मर्यादा भंग करता है। कोर्ट ने कहा कि इस केस में मर्यादा भंग से जुड़े अपराध के जरूरी तत्व पूरे नहीं होते।
कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि क्रिमिनल कोर्ट को कमजोर मामलों को सुनवाई तक पहुंचने से रोकने और कोर्ट के समय की बर्बादी को रोकने के लिए फिल्टर के रूप में कार्य करना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को सभी आरोपों से मुक्त कर दियाऔर कहा कि यह विवाद पूरी तरह सिविल था। इसे उसी तरह सुलझाया जाना चाहिए था, न कि क्रिमिनल के माध्यम से।
जानिए क्या है पूरा मामला
मामला कोलकाता के साल्ट लेक में एक प्रॉपर्टी को लेकर दो भाइयों के बीच विवाद से सामने आया था। आरोपी तुहिन कुमार बिस्वास ने कथित तौर पर मार्च 2020 में एक महिला को विवादित संपत्ति में प्रवेश करते हुए रिकॉर्ड किया था, जिसके बाद ममता अग्रवाल ने FIR दर्ज कराई थी।
सबूतों के अभाव और शिकायतकर्ता के बयान दर्ज करने से इनकार करने के बावजूद, पुलिस ने चार्जशीट फाइल की। ट्रायल कोर्ट और कलकत्ता हाईकोर्ट ने आरोप मुक्त करने की याचिका खारिज कर दी। इसके बाद आरोपी सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।