Chardham Dham Close Devotees Thronged Winter Seat Shitkalin Char Dham Yatra News Update | चारधाम कपाट बंद होते ही शीतकालीन गद्दीस्थलों पर उमड़े श्रद्धालु: 40 हजार भक्त पहुंचे, ओंकारेश्वर-नृसिंह मंदिर में बढ़ी भीड़; PM मोदी कर चुके तारीफ – Uttarakhand News

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बाबा केदार की रुद्रप्रयाग स्थित ओंकारेश्वर मंदिर में आरती होते हुए।

उत्तराखंड में चारधाम यात्रा के कपाट बंद होने के बाद अब शीतकालीन गद्दीस्थलों में श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ने लगी है। अब तक लगभग 40 हजार श्रद्धालु शीतकालीन यात्रा में शामिल होने आ चुके हैं। बड़ी संख्या में श्रद्धालु बाबा केदारनाथ के शीतकालीन गद्दीस्थल

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धार्मिक मान्यता के अनुसार, स्कंद पुराण में उल्लेख है कि शीतकालीन गद्दीस्थलों की यात्रा से वही पुण्य प्राप्त होता है, जो चारधाम यात्रा से मिलता है। ऐसे में जो श्रद्धालु मौसम या अन्य कारणों से चारधाम नहीं जा पाते, उनके लिए शीतकाल में गद्दीस्थलों के दर्शन उत्तम विकल्प माने जाते हैं।

खास बात यह है कि इन स्थलों तक पहुंचना चारधाम की तुलना में कहीं अधिक आसान है। शीतकालीन यात्रा इस साल 24 अक्टूबर से शुरू हुई थी। शीतकाल के दौरान भगवान बद्री विशाल की पूजा चमोली जिले के योग‑ध्यान बद्री मंदिर, पांडुकेश्वर (ज्योतिर्मठ) में होती है।

बद्रीनाथ के 25 नवंबर को और केदारनाथ के 23 अक्टूबर को कपाट बंद हुए थे।

बद्रीनाथ के 25 नवंबर को और केदारनाथ के 23 अक्टूबर को कपाट बंद हुए थे।

जानिए चारों धामों के शीतकालीन गद्दी स्थल के बारे में…

बद्रीनाथ धाम का शीतकालीन गद्दीस्थल- जोशीमठ (पांडुकेश्वर)

बद्रीनाथ का शीतकालीन गद्दीस्थल पांडुकेश्वर है। बद्रीनाथ धाम के कपाट शीतकाल के लिए बंद होते हैं, तब भगवान की डोली को परंपरा के अनुसार जोशीमठ क्षेत्र के पांडुकेश्वर में ले जाया जाता है जहां पर शीतकालीन पूजा होती है।

बद्रीनाथ हाईवे पर ज्योतिर्मठ से 24 किमी आगे 6,298 फीट की ऊंचाई पर स्थित योग‑ध्यान बद्री मंदिर सप्त बद्री मंदिरों में से एक है। शीतकाल में यहां भगवान बद्री विशाल के प्रतिनिधि उद्धव जी और कुबेर जी की पूजा होती है। यह मंदिर पांडव काल से जुड़ा माना जाता है।

जोशीमठ क्षेत्र के पांडुकेश्वर में बद्री विशाल विराजमान हैं।

जोशीमठ क्षेत्र के पांडुकेश्वर में बद्री विशाल विराजमान हैं।

केदारनाथ धाम का शीतकालीन गद्दीस्थल- उखीमठ (ओंकारेश्वर मंदिर)

भगवान केदारनाथ (भगवान शिव) की गद्दीस्थल शीतकाल में ऊखीमठ स्थित ओंकारेश्वर मंदिर में बाबा केदार विराजमान हैं। यह स्थान केदारनाथ जी का शीतकालीन निवास होता है। यहां 6 महीने तक केदारनाथ जी की पूजा वैदिक रीति से होती है।

4,300 फीट की ऊंचाई पर स्थित यह प्राचीन मंदिर भगवान केदारनाथ के साथ‑साथ द्वितीय केदार मध्यमेश्वर का भी शीतकालीन गद्दीस्थल है। यहां से श्रद्धालु गुप्तकाशी स्थित विश्वनाथ मंदिर, त्रियुगीनारायण, कालीमठ और महर्षि अगस्त्य मंदिर के दर्शन भी कर सकते हैं।

ऊखीमठ स्थित ओंकारेश्वर मंदिर में बाबा केदार विराजमान हैं।

ऊखीमठ स्थित ओंकारेश्वर मंदिर में बाबा केदार विराजमान हैं।

गंगोत्री धाम का शीतकालीन गद्दीस्थल- मुखबा

गंगोत्री धाम की देवी गंगा माता की गद्दीस्थल शीतकाल में मुखबा गांव स्थित मंदिर में मां गंगा विराजमान होती हैं। मुखबा गांव गंगा माता का परंपरागत निवास स्थल भी माना जाता है। सर्दियों में यहां विधिवत पूजा होती है।

उत्तरकाशी में भागीरथी नदी के तट पर 8,528 फीट की ऊंचाई पर स्थित मुखवा गांव को गंगा का मायका कहा जाता है। देवदार के घने जंगल, हिमाच्छादित चोटियां और बहती भागीरथी इसकी सुंदरता को और बढ़ा देती हैं। यहां लक्ष्मी‑नारायण मंदिर के दर्शन के साथ हर्षिल, बगोरी और लामा टॉप जैसे पर्यटन स्थलों की सैर भी की जा सकती है।

मुखबा गांव स्थित मंदिर में मां गंगा विराजमान हैं।

मुखबा गांव स्थित मंदिर में मां गंगा विराजमान हैं।

यमुनोत्री धाम का शीतकालीन गद्दीस्थल- खरसाली गांव

यमुनोत्री धाम की देवी माता यमुना की गद्दी शीतकाल में खरसाली गांव लाई गई है, जहां शीतकालीन यमुनोत्री मंदिर में नियमित पूजा हो रही है। यह गांव यमुनोत्री घाटी का सबसे पुराना और पवित्र स्थल माना जाता है।

8,200 फीट की ऊंचाई पर स्थित खरसाली गांव को यमुना का मायका कहा जाता है। यहां स्थित यमुना मंदिर और उनके भाई शनिदेव का प्राचीन मंदिर दर्शनीय है, जिसे पुरातत्व विभाग ने लगभग 800 साल पुराना बताया है। शीतकाल में भारी बर्फबारी के कारण यह क्षेत्र पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बन जाता है।

मां यमुना खरसाली गांव में विराजमान हैं।

मां यमुना खरसाली गांव में विराजमान हैं।

नृसिंह मंदिर, ज्योतिर्मठ

चमोली जिले के ज्योतिर्मठ में 6,150 फीट की ऊंचाई पर स्थित भगवान नृसिंह का भव्य मंदिर भी शीतकाल में श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र रहता है। यहां आदि शंकराचार्य की गद्दी और गरुड़ जी की पूजा होती है। मंदिर का हाल ही में जीर्णोद्धार किया गया है। यहां से श्रद्धालु औली, आदि बद्री, वृद्ध बद्री, शंकराचार्य मठ और पंचम केदार कल्पेश्वर के दर्शन भी कर सकते हैं।

भगवान नृसिंह में आदि शंकराचार्य की गद्दी और गरुड़ जी की पूजा होती।

भगवान नृसिंह में आदि शंकराचार्य की गद्दी और गरुड़ जी की पूजा होती।

यात्रा व ठहराव की सुविधा

सभी शीतकालीन गद्दीस्थल सीधे मोटर मार्ग से जुड़े हैं। ऋषिकेश से सार्वजनिक और निजी वाहनों के माध्यम से यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है। हालांकि कड़ाके की ठंड और बर्फबारी को देखते हुए श्रद्धालुओं को गर्म कपड़े और जरूरी दवाइयां साथ रखने की सलाह दी जा रही है।

खाने‑ठहरने के पर्याप्त इंतजाम

गद्दीस्थलों पर होटल, धर्मशालाएं और होम‑स्टे की पर्याप्त व्यवस्था उपलब्ध है। होम‑स्टे में पर्यटक पहाड़ी पारंपरिक व्यंजनों का स्वाद भी ले सकते हैं, जिनमें आलू के गुटखे, मंडुवा, फाफरा, चौलाई की रोटी और चौलाई का हलुवा प्रमुख हैं।

शीतकालीन यात्रा को लेकर उत्साह बढ़ने की एक प्रमुख वजह पीएम मोदी ने 30 नवंबर को मन की बात कार्यक्रम में इन स्थलों का उल्लेख किया। इसके बाद पूरे देश में इन पूजा स्थलों की लोकप्रियता और बढ़ी है। वहीं सीएम पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में राज्य सरकार भी शीतकालीन यात्रा को प्रोत्साहित कर रही है, ताकि श्रद्धालु निर्बाध रूप से दिव्य-भव्य दर्शन का अनुभव कर सकें।

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