फंदे से लटका मिला एक्टर कुणाल सिंह का शव:बाथरूम में थीं गर्लफ्रेंड, एक शक से हत्या की गुत्थी में तब्दील हुआ आत्महत्या का मामला

Actionpunjab
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बॉलीवुड एक्टर कुणाल सिंह महज 31 साल के थे, जब मुंबई के एक अपार्टमेंट में उनका शव मिला। शुरुआत में उनकी मौत को आत्महत्या माना गया, हालांकि पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट ने पूरे केस को पलटकर रख दिया। फोरेंसिक एक्सपर्ट ने इसे आत्महत्या नहीं बल्कि हत्या माना था। उनकी मौत हत्या थी या आत्महत्या, ये जानने के लिए दैनिक भास्कर ने केस की रिपोर्ट तैयार करने वाले AIIMS के पूर्व फोरेंसिक एक्सपर्ट तिरथ दास डोगरा से संपर्क किया। आज अनसुनी दास्तान के 4 चैप्टर में जानिए एक्टर कुणाल सिंह की मौत की कहानी- 29 सितंबर 1977 को कुणाल सिंह का जन्म हरियाणा में हुआ था। मॉडलिंग में पहचान बनाने के बाद कुणाल ने तमिल फिल्म कधालार धीनम (1999) से एक्टिंग डेब्यू किया था। फिल्म में उनके साथ सोनाली बेंद्रे लीड रोल में थीं। साउथ में ये फिल्म हिट रही, जिसके बाद इसकी हिंदी रीमेक फिल्म दिल ही दिल में (2000) बनाई गई, जिसमें कुणाल और सोनाली लीड रोल में रहे। ये फिल्म भी हिट रही, जिसका गाना ऐ नाजनीन सुनो न काफी पसंद किया गया था। इन दो फिल्मों की बदौलत कुणाल सिंह को एक-एक कर कई बड़ी साउथ फिल्में मिलने लगीं। वो अनीता हंसनंदानी के साथ 2002 की फिल्म ‘वरुशामेल्लम वसंतम’ और धनुष स्टारर फिल्म ‘देवथैयाई कंदेन’ जैसी कई पॉपुलर साउथ फिल्मों का हिस्सा रहे। साउथ फिल्मों में बढ़ती पॉपुलैरिटी के बीच उन्होंने अनुराधा सिंह से शादी की, जिससे उन्हें दो बच्चे हुए। साल 2007 तक कुणाल को फिल्मों में काम मिलना लगभग बंद हो गया। जो एक-दो फिल्में उन्होंने की थीं, उसमें भी उनका साइड रोल ही होता था। यही वजह रही कि कुणाल ने अपनी प्रोडक्शन कंपनी बालागिरी शुरू की। उन्होंने अपने प्रोडक्शन की पहली फिल्म योगी की तैयारियां शुरू की थीं, जिनमें उनके साथ एक्ट्रेस लवीना भाटिया लीड रोल में थीं। 2007 में फिल्म की शूटिंग शुरू हुई ही थी कि कुणाल सिंह और लवीना भाटिया की नजदीकियां बढ़ने लगीं और दोनों के अफेयर की खबरें सुर्खियों में आ गईं। जल्द ही ये खबरें कुणाल सिंह के परिवार तक भी पहुंच गईं। कुणाल की पत्नी अनुराधा इससे बेहद नाराज हुईं। दोनों के आए दिन झगड़े बढ़ने लगे और एक रोज अनुराधा दोनों बेटियों के साथ कुणाल को छोड़कर मायके चली गईं। कुछ समय बाद लवीना भाटिया कुणाल के साथ उनके मुंबई स्थित अपार्टमेंट में आकर रहने लगीं। 7 फरवरी 2008 कुणाल सिंह और लवीना भाटिया अपार्टमेंट में अकेले थे। देर रात लवीना ने मुंबई पुलिस को कॉल कर कुणाल की आत्महत्या की जानकारी दी। पुलिस पहुंची तो देखा कि कुणाल का शव पंखे पर लगे फंदे से लटक रहा था। लवीना पास बैठी रो रही थीं। पुलिस ने शव बरामद कर पोस्टमॉर्टम के लिए भेजा। शुरुआत में इसे आत्महत्या माना गया। पहली पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में भी फंदे से दम घुटने से मौत होने की संभावनाएं सामने आईं। कुछ दिन बीते ही थे कि कुणाल के पिता कर्नल राजेंद्र सिंह ने हत्या का शक जताते हुए पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई। शिकायत में उन्होंने 4 अहम सवाल खड़े किए। पहला सवाल- अगर कुणाल ने आत्महत्या की, तो उनके शरीर पर खरोंच के निशान कैसे आए। दूसरा सवाल- लवीना ने कहा था कि कुणाल उन्हें रात को घर छोड़ने वाले थे, तो अगर कुणाल को आत्महत्या करनी ही थी, तो वो लवीना को छोड़ने के बाद भी कर सकते थे। तीसरा सवाल- लवीना ने कहा कि वो बाथरूम में थीं, अगर कुणाल आत्महत्या करने वाले थे, तो उन्हें इस बात का अंदाजा कैसे लगा कि वो कितनी देर में बाथरूम से बाहर आने वाली हैं। चौथा सवाल- कुणाल ने मौत से चंद घंटे पहले ही पॉपुलर म्यूजिक कंपोजर डब्बू मलिक को काम के सिलसिले में मैसेज किया था। उन्होंने जल्द ही डब्बू को अपने घर पर इनवाइट किया था। अगर कुणाल को आत्महत्या करनी थी, तो वो उसी रोज आगे की प्लानिंग क्यों कर रहे थे। जांच में सामने आया कि जिस दिन कुणाल का शव मिला, उसी दिन उन्होंने अपकमिंग फिल्म योगी की टीम से मुलाकात की थी और आगे की प्लानिंग बनाई थी। पिता की शिकायत के बाद मुंबई पुलिस ने कुणाल सिंह की गर्लफ्रेंड लवीना भाटिया को गिरफ्तार कर लिया गया। लवीना भाटिया ने पुलिस को दिए बयान में कहा कि वो सुबह नहाने गई थीं। करीब 10 मिनट बाद वो बाहर निकलीं तो देखा कि कुणाल फंदे पर लटके हैं। पुलिस के पास लवीना के खिलाफ कोई सबूत नहीं था, जिसके चलते उन्हें छोड़ दिया गया। पहले भी कलाई काटकर की जान देने की कोशिश पुलिस जांच के दौरान ये भी सामने आया कि कुणाल सिंह फिल्मों में ठीक काम न मिलने और निजी जिंदगी की उथल-पुथल से काफी परेशान चल रहे थे। परिवार और दोस्तों ने पुलिस को दिए बयान में कहा कि फरवरी 2008 में आत्महत्या करने से कुछ दिनों पहले भी उन्होंने कलाई की नस काटकर आत्महत्या करने की कोशिश की थी, हालांकि तब उन्हें बचा लिया गया था। जब पुलिस किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकी, तो ये केस CBI को सौंपा गया। जिसके बाद उनकी मौत के कारण की गहराई से जांच की गई। कुणाल की फोरेंसिक रिपोर्ट उस समय AIIMS के फोरेंसिक एक्सपर्ट रहे डॉक्टर टी.डी.डोगरा ने तैयार की थी। कुणाल सिंह की मौत का असल कारण जानने के लिए दैनिक भास्कर ने डॉक्टर टी.डी.डोगरा से संपर्क किया। उन्होंने हमसे बातचीत में शुरुआती जांच पर कहा, कुणाल के निधन के बाद 20 अगस्त 2008 को बॉम्बे में उनका पोस्टमॉर्टम किया गया। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में डॉक्टरों ने मृत्यु का कारण गर्दन पर लिगेचर (फंदे) द्वारा दबाव बताया, जो उनकी संभावित मृत्यु का कारण था।’ ‘मृतक के शरीर पर फांसी के सामान्य लक्षण मौजूद थे। जैसे गर्दन पर तिरछा लिगेचर मार्क, मुंह के दाहिने कोने से लार का बहना, जो हैंगिंग का एक महत्वपूर्ण संकेत होता है। उनकी जीभ दांतों के बीच फंसी हुई थी और हाथ-पैरों के नाखून नीले पड़ चुके थे। आंखों में पेटीकीअल हैमरेज पाया गया, जो इस तरह की मृत्यु में अक्सर देखा जाता है। निष्कर्ष में डॉक्टरों ने कहा कि मृत्यु दम घुटने से संभव है और सभी फाइंडिंग्स उससे मेल खाती हैं। शुरुआती पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में इसे आत्महत्या माना गया, लेकिन जब कुणाल सिंह के पिता की शिकायत पर केस सीबीआई को सौंपा गया, तो 27 जुलाई 2008 को फिर उनका पोस्टमॉर्टम किया गया। इस पर टी.डी.डोगरा कहते हैं, ‘नाखूनों की जांच की गई, जिसमें किसी प्रकार का खून या किसी अन्य व्यक्ति की कोशिकाएं नहीं पाई गईं। आमतौर पर हत्या के मामले में विक्टिम द्वारा स्ट्रगल किए जाने पर उनके नाखूनों में आरोपी की स्किन फंसी होती है। हालांकि रिपोर्ट में ऐसा कुछ सामने नहीं आया।’ ’27 फरवरी 2009 को कूपर अस्पताल के डॉक्टरों की राय ली गई। इसमें कहा गया कि जो लिगेचर मार्क दिखाई दे रहा है, वह किसी नरम सामग्री से बन सकता है। यदि गर्दन दाईं ओर झुकी हो तो निशान दाईं ओर होना संभव है। हाथ पर जो नीला निशान था, वह किसी कठोर वस्तु से बन सकता है। इस रिपोर्ट में आत्महत्या की संभावना से इनकार नहीं किया गया। विसरा में शराब या किसी अन्य जहर के प्रमाण नहीं मिले।’ ’20 जनवरी 2009 को ग्रांट मेडिकल कॉलेज बोर्ड की राय सामने आई। पहले कूपर अस्पताल का बोर्ड बना, उसके बाद ग्रांट मेडिकल कॉलेज का। उन्होंने कहा कि मृत्यु खाना खाने के 4 से 6 घंटे बाद संभव है और पोस्टमॉर्टम से 12 से 24 घंटे पहले मृत्यु हुई थी। मृत्यु का कारण पार्शियल हैंगिंग (दम घुटना) बताया गया। मृत्यु के समय को लेकर कोई विरोधाभास नहीं पाया गया।’ ’12 अगस्त 2009 को कूपर अस्पताल की एक बार फिर से राय ली गई, जिसमें मृत्यु को होमिसाइडल (हत्या) प्रकृति की बताया गया। जबकि पहले इसे सुसाइडल बताया गया था। यही विरोधाभास आगे चलकर एम्स की रिपोर्ट से टकराया। इन्हीं अलग-अलग रिपोर्टों के कारण सीबीआई यह मामला लेकर एम्स पहुंची।’ डॉक्टर टी.डी.डोगरा ने आगे कहा, ‘16 सितंबर 2009 को कूपर अस्पताल से तीसरी राय ली गई, जिसमें लिगेचर मार्क को होमिसाइडल डेथ यानी हत्या के पक्ष में बताया गया। मुट्ठी बंद होने को किसी ब्लंट ऑब्जेक्ट से जोड़ने की कोशिश की गई। यह राय भी एम्स की रिपोर्ट से मेल नहीं खा रही थी।’ ‘7 दिसंबर 2009 को फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी को कपड़े और अंडरवियर जांच के लिए भेजे गए। अंडरवियर पर खून नहीं था। शर्ट, जींस और बेडशीट पर न तो लार, न वीर्य और न ही संघर्ष के कोई निशान पाए गए। यौन हमले या संघर्ष का कोई प्रमाण नहीं मिला।’ कुणाल सिंह की मौत के 2 साल बीत गए थे, लेकिन सीबीआई के पास अब भी कुणाल सिंह की मौत की सटीक जानकारी नहीं थी। आखिरकार, 22 जनवरी 2010 को सीबीआई ने सभी दस्तावेज, रिपोर्ट्स और पेपर्स एम्स को सौंपे और सीन री-कंस्ट्रक्शन का अनुरोध किया। 12 फरवरी 2010 को सीबीआई ने एम्स को एक रिपोर्ट भेजते हुए 24 सवालों के जवाब मांगे। डी.टी.डोगरा कहते हैं, ’13 फरवरी 2010 को एम्स और सीएफएसएल की संयुक्त टीम मेरे चेयरमैन शिप में गठित की गई। टीम का मुख्य निष्कर्ष यह था कि कुर्सी पर खड़े होकर फांसी लगाना आसान और पूरी तरह संभव था। सूटकेस या सोफे पर खड़े होकर भी फांसी लगाई जा सकती थी, हालांकि वह थोड़ा कठिन होता। बेडशीट लंबी, मजबूत और मृतक जैसे व्यक्ति का वजन सहने में सक्षम थी। गांठ स्थिर और कसी हुई थी। किसी भी कपड़े पर खिंचाव, फटने या संघर्ष के निशान नहीं थे।सोफे का एक पैर और सूटकेस से छूना जीवित रहने की स्वाभाविक प्रतिक्रिया भी हो सकती है। पूरा दृश्य फांसी की प्रक्रिया से मेल खाता था।’ 2 साल बाद सीबीआई की जांच के बाद कुणाल की मौत आत्महत्या करार दी गई 2 साल की लंबी जांच के बाद आखिरकार बॉम्बे हाईकोर्ट ने कुणाल सिंह डेथ केस में फैसला सुनाते हुए इसे आत्महत्या करार दिया। हालांकि केस की जांच में लापरवाही करने के चलते बॉम्बे हाईकोर्ट ने 2 पुलिस अफसरों के सस्पेंशन का ऑर्डर दिया। आरुषि तलवार, इंदिरा गांधी की फोरेंसिक रिपोर्ट तैयार कर चुके हैं टी.डी.डोगरा टी.डी.डोगरा एम्स के पूर्व फोरेंसिक एक्सपर्ट रह चुके हैं। उन्होंने अपने मेडिकल करियर में इंदिरा गांधी की हत्या, आरुषि तलवार मर्डर केस, निठारी केस, बाटला हाउस एनकाउंटर केस, माधवराव सिंधिया एक्सीडेंट केस की रिपोर्ट भी तैयार की थी।

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