Kailash Mansarovar Route Ruins | Traditional Path Disappearing

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कैलाश मानसरोवर का ऐतिहासिक मार्ग मिटने की कगार पर।

कैलाश मानसरोवर यात्रा का 400 किलोमीटर लंबा मार्ग, जिस पर कभी भक्तों के कदमों की आहट और ‘हर-हर महादेव’ के जयकारे गूंजते थे, अब सिमटता जा रहा है। यह मार्ग कहीं सड़क निर्माण में कट गया तो कहीं जंगलों में गुम हो गया है। यात्रियों और व्यापारियों के ठहरने

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कैलाश मानसरोवर यात्रा हिंदुओं की प्रमुख और पवित्र यात्राओं में गिनी जाती है। सड़कें न होने के दौर में पूरी यात्रा पैदल तय की जाती थी। श्रद्धालु हल्द्वानी के काठगोदाम से अल्मोड़ा, बागेश्वर या टनकपुर-चंपावत होते हुए पिथौरागढ़ पहुंचते थे। वहां से अस्कोट, धारचूला और गुंजी के रास्ते लिपुलेख दर्रे से तिब्बत (चीन) में प्रवेश करते थे। यह मार्ग सिर्फ धार्मिक ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर भी रहा है। कल्चरल एक्सपर्ट के मुताबिक इसका संरक्षण होना चाहिए, वरना अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा।

कैलाश मानसरोवर यात्रा मार्ग और किनारे बनी धर्मशाला।

कैलाश मानसरोवर यात्रा मार्ग और किनारे बनी धर्मशाला।

अब 3 प्वाइंट्स में जानिए आखिर क्यों सिमट रहा मार्ग…

1. सड़क आने से पहले यही था एकमात्र रास्ता

जब कुमाऊं का पहाड़ी इलाका सड़क से नहीं जुड़ा था, तब कैलाश यात्रा पूरी तरह पैदल होती थी। करीब 400 किलोमीटर लंबे इस दुर्गम मार्ग पर पहाड़, नदियां और घने जंगल यात्रियों की परीक्षा लेते थे।

2. सड़कें बढ़ीं, पैदल रास्ते सिमटते गए

1960 में पिथौरागढ़ तक सड़क पहुंची और 1970 के दशक में टनकपुर-तवाघाट राष्ट्रीय राजमार्ग बना। यात्री धारचूला तक वाहन से पहुंचने लगे, लेकिन आगे का सफर पैदल ही होता था। बाद में सड़क तवाघाट और फिर नजंग तक बन गई। हर नए सड़क खंड के साथ पैदल मार्ग छोटा होता चला गया।

कैलाश मानसरोवर यात्रा का पैदल मार्ग जर्जर हालत में।

कैलाश मानसरोवर यात्रा का पैदल मार्ग जर्जर हालत में।

3. 2020 के बाद पैदल मार्ग इतिहास बनने लगा

वर्ष 2020 में सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) ने सड़क को सीधे लिपुलेख दर्रे तक जोड़ दिया, जिसका ऑनलाइन उद्घाटन तत्कालीन रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने किया। दिल्ली से लिपुलेख तक वाहन पहुंचने लगे और परंपरागत पैदल मार्गों का उपयोग लगभग बंद हो गया। कई जगह रास्ते सड़क निर्माण में कट गए, जबकि कुछ हिस्सों में अब केवल निशान ही बचे हैं।

खंडहर में बदलती यात्रियों के ठहरने के लिए बनीं धर्मशालाएं।

खंडहर में बदलती यात्रियों के ठहरने के लिए बनीं धर्मशालाएं।

दानवीर जसुली देवी ने बनवाईं थी धर्मशालाएं

धारचूला के दारमा क्षेत्र के दातू गांव निवासी जसुली देवी ने कैलाश मानसरोवर यात्रा मार्ग पर धर्मशालाओं का निर्माण कराया था। पति जम्बू सिंह के निधन के बाद उन्होंने अपनी अपार संपत्ति गंगा में दान करने का फैसला किया, लेकिन अंग्रेज अधिकारियों ने धन को जनहित में लगाने की सलाह दी।

इसके बाद जसुली देवी ने धारचूला से पिथौरागढ़, अल्मोड़ा और काठगोदाम तक धर्मशालाएं बनवाईं। नेपाल में भी उन्होंने यात्रियों के लिए ठहरने की व्यवस्था कराई। आज लोग उन्हें दानवीर जसुली देवी बुढ़ि सौक्याणी के नाम से याद करते हैं।

दारमा घाटी की दानवीर जसुली देवी।

दारमा घाटी की दानवीर जसुली देवी।

उपयोग बंद होने से अब गिने-चुने ही बचे

करीब 1900 के आसपास इस यात्रा मार्ग पर लगभग 500 धर्मशालाएं बनी थीं, जहां कैलाश यात्री और व्यापारी विश्राम करते थे। सड़क बनने के बाद इनका उपयोग बंद हो गया और अब बहुत कम धर्मशालाएं सुरक्षित बची हैं।

धारचूला-पिथौरागढ़-टनकपुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर कनालीछीना के सतगढ़ गांव की धर्मशाला अभी अच्छी स्थिति में है। पिथौरागढ़-चंडाक पैदल मार्ग की एक धर्मशाला का हाल ही में नगर निगम ने सुधार कराया है, जबकि बाकी अधिकांश खंडहर बन चुकी हैं।

‘यह मार्ग सिर्फ रास्ता नहीं, धरोहर है’

पिथौरागढ़ के वरिष्ठ पत्रकार और कल्चरल एक्सपर्ट बद्री दत्त कसनियाल कहते हैं कि कैलाश मानसरोवर यात्रा मार्ग का धार्मिक, आध्यात्मिक और ऐतिहासिक महत्व है। हजारों श्रद्धालु सदियों तक इसी रास्ते से यात्रा करते रहे हैं। यह मार्ग एक हेरिटेज की तरह है, जिसे संरक्षित किया जाना चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ियां इसकी विरासत को जान सकें।

पांच पड़ावों में पूरी होती थी यात्रा

आधार शिविर धारचूला से वाहन से नजंग तक पहुंचने के बाद यात्री मालपा होते हुए बूंदी जाते थे। यहां पड़ाव के बाद यात्रा छियालेख, गर्ब्यांग होते हुए गुंजी पहुंचती थी, जहां दो दिन रुककर मेडिकल जांच कराई जाती थी। अनुमति मिलने पर यात्री कालापानी और फिर अंतिम पड़ाव नाविढांग पहुंचते थे। यहां से लिपुलेख पार करने के बाद भारतीय सुरक्षा बल यात्रियों को चीन के अधिकारियों को सौंपते थे।

1962 के युद्ध तक नहीं थी कोई रोक

साल 1962 तक कैलाश मानसरोवर यात्रा पर कोई रोकटोक नहीं थी। भारत से हजारों श्रद्धालु इस यात्रा पर जाते थे और तिब्बत की तकलाकोट व भारत की गुंजी मंडियों के बीच व्यापार भी होता था।

भारत-चीन युद्ध के बाद यात्रा और व्यापार बंद हो गए। वर्ष 1981 में यात्रा फिर शुरू हुई और 1992 में भारत-चीन व्यापार भी बहाल हुआ।

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