Delhi HC: Refuse Marriage Post-Physical Relation Offence

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नई दिल्ली41 मिनट पहले

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दिल्ली हाइकोर्ट ने कहा कि फिजिकल रिलेशन के बाद शादी मना करना एक अपराध है। कोर्ट ने ये बात एक व्यक्ति की जमानत याचिका पर सुनवाई को दौरान कही।

कोर्ट ने कहा कि कुंडली मेल न खाने की वजह से शादी से मना करने पर भारतीय न्याय संहिता(BNS) का सेक्शन 69 लग सकता है, जो धोखे से सेक्सुअल इंटरकोर्स को अपराध मानता है।

जज ने कहा कि आरोपी ने प्रॉसिक्यूटर को बार-बार भरोसा दिलाया था कि उनकी शादी में कोई रुकावट नहीं है, जिसमें कुंडली मैच करना भी शामिल है। आरोपी ने इस आधार पर बेल मांगी कि रिश्ता आपसी सहमति से था, और दोनों एक-दूसरे को आठ साल से जानते थे।

वकील ने कहा- रेप का मामला नहीं बनता

आवेदक के वकील ने कहा था कि शादी का झूठा बहाना बनाकर रेप करने का मामला नहीं बनता और उसे रेगुलर बेल मिलनी चाहिए। 17 फरवरी को दिए गए अपने ऑर्डर में, कोर्ट ने कहा कि प्रॉसिक्यूटर ने पहली कंप्लेंट नवंबर 2025 में दर्ज कराई थी।

कोर्ट ने कहा कि आरोपी और उसके परिवार द्वारा कथित तौर पर शादी का भरोसा दिए जाने पर ही वापस ले ली गई थी, और बाद में कुंडली न मिलने के आधार पर शादी करने से मना कर दिया गया था। मौजूदा FIR जनवरी 2026 में IPC के सेक्शन 376 (रेप) और BNS के सेक्शन 69 के तहत अपराधों के लिए दर्ज की गई थी।

कोर्ट ने कहा कि घटनाओं के क्रम से पता चलता है कि यह सिर्फ रिश्ते खराब होने का मामला नहीं था, बल्कि आवेदक को कुंडली मिलाने पर उसके परिवार के जोर देने के बारे में पता होने के बावजूद बार-बार शादी का भरोसा दिया गया था।

कोर्ट ने कहा कि सिर्फ इसलिए क्रिमिनल लॉ नहीं लगाया जा सकता क्योंकि कोई रिश्ता टूट जाता है या शादी नहीं हो पाती। हालांकि, इस स्टेज पर मौजूदा केस एक अलग लेवल पर है।

दिल्ली हाइकोर्ट की पिछली मुख्य सुनवाई…

29 जनवरी: शादी के बाद साथ नहीं रहे तो रजिस्ट्रेशन औपचारिकता, तलाक से इनकार करने के लिए इसका इस्तेमाल नहीं हो सकता

दिल्ली हाइकोर्ट ने कहा कि शादी के बाद अगर पति पत्नी साथ नहीं रह रहे हैं तो शादी की रजिस्ट्रेशन एक औपचारिकता से ज्यादा कुछ भी नहीं है। जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस रेनू भटनागर की डिवीजन बेंच ने कहा कि इसका इस्तेमाल एक साल में तलाक लेने से इनकार करने के लिए नहीं किया जा सकता।

हाइकोर्ट 29 जनवरी को एक महिला की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। महिला ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें शादी की तारीख से एक साल पूरा होने से पहले आपसी सहमति से तलाक के लिए ज्वाइंट याचिका पेश करने की अनुमति खारिज कर दी गई थी। पूरी खबर पढ़ें…

25 नवंबर: पत्नी प्रेग्नेंसी को ढाल नहीं बना सकती, शुरुआत से पति को मानसिक प्रताड़ना दी

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक केस में पति को तलाक की परमिशन देते हुए कहा कि प्रेग्नेंसी को पति पर हुई क्रूरता के खिलाफ ढाल नहीं बनाया जा सकता है। कोर्ट ने माना कि पत्नी के व्यवहार से पति ने मानसिक प्रताड़ना झेली और इससे वैवाहिक संबंध भी पूरी तरह टूट गए।

हाईकोर्ट की जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस रेणु भटनागर की बेंच ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें पति की तलाक याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी गई थी कि पति क्रूरता साबित नहीं कर सका।

साथ ही 2019 की शुरुआत में पत्नी का मिसकैरेज यह दिखाता है कि रिश्ते सामान्य थे। कोर्ट ने साफ कहा कि यह तय करने के लिए कि किसी के साथ क्रूरता हुई या नहीं, पूरे रिश्ते और सारी घटनाओं को देखा जाता है। पूरी खबर पढ़ें…

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दिल्ली हाईकोर्ट बोला- बेरोजगार पत्नी आलसी नहीं, उसके काम को नजरअंदाज करना नाइंसाफी

दिल्ली हाईकोर्ट ने पति-पत्नी के बीच गुजारा भत्ता से जुड़े एक मामले पर कहा कि बेरोजगार पत्नी आलसी नहीं होती। घर संभालना, बच्चों की देखभाल और परिवार की मदद करना भी काम है, भले ही वह बैंक खाते में नजर न आए। ऐसे में गुजारा भत्ता तय करते समय पत्नी के योगदान को नजरअंदाज करना गलत है। पूरी खबर पढ़ें…

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