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- Sabarimala Reference Women Entry LIVE Update; Muslim AIMPLB Supreme Court | CJI Surya Kant
नई दिल्ली7 मिनट पहले
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केरलम के सबरीमाला मंदिर सहित अन्य संप्रदाय के धार्मिक स्थलों में महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव से जुड़ी याचिकाओं पर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हो रही है।
मस्जिद दरगाह में महिलाओं के प्रवेश के खिलाफ दलील दे रहे एडवोकेट नजाम पाशा ने कहा कि अगर किसी मोहल्ले की मस्जिद सबके लिए खुली हो तो भी कोई जाकर घंटी नहीं बजा सकता। आरती नहीं कर सकता, क्योंकि उस जगह की अपनी धार्मिक मर्यादा है।
जो चीज सभी के लिए खुली है इसका मतलब ‘कुछ भी करने की छूट नहीं। कुरान बहुत संक्षिप्त है। उसमें हर प्रथा डिटेल में नहीं लिखी। पैगंबर की परंपरा भी धार्मिक प्रथा का हिस्सा है। मतलब सिर्फ किताब में लिखा होना ही “जरूरी अधिकार” तय नहीं करता।
23 अप्रैल को पिछली सुनवाई में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने कोर्ट से कहा था कि इस्लाम महिलाओं को नमाज के लिए मस्जिद आने से नहीं रोकता है, लेकिन यह बेहतर है कि वे घर पर ही इबादत करें।
7 सवाल, जिनपर सुप्रीम कोर्ट में बहस हो रही

सबरीमाला मामले पर 7 अप्रैल से 22 अप्रैल तक सुनवाई हुई
सबरीमाला मंदिर मामले पर 7 अप्रैल से सुनवाई शुरू हुई थी। इस दौरान केंद्र सरकार ने महिलाओं की एंट्री के विरोध में दलीलें रखीं। सरकार ने कहा था कि देश के कई देवी मंदिरों में पुरुषों की एंट्री भी बैन है, इसलिए धार्मिक परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए।
पिछले 7 दिन की सुनवाई में क्या हुआ, पढ़िए…
7 अप्रैल : केंद्र की दलील- मंदिर में महिलाओं की एंट्री का फैसला गलत
8 अप्रैल- जो भक्त नहीं, वो धार्मिक परंपरा को चुनौती कैसे दे रहा
9 अप्रैल- सुप्रीम कोर्ट बोला- मंदिरों में एंट्री रोकने से समाज बंटेगा
15 अप्रैल- सबरीमाला मैनेजमेंट बोला- अयप्पा मंदिर रेस्टोरेंट नहीं, यहां ब्रह्मचारी देवता
17 अप्रैल- SC बोला- संविधान सबसे ऊपर, निजी धार्मिक मान्यताओं से उठकर फैसला जरूरी
21 अप्रैल- सुप्रीम कोर्ट ने पूछा-छूने से देवता अपवित्र कैसे होते हैं
22 अप्रैल- सुप्रीम कोर्ट बोला- हिंदू एकजुट रहें, संप्रदायों में बंटे नहीं
लाइव अपडेट्स
7 मिनट पहले
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जस्टिस अमानुल्लाह बोले- जंगल धार्मिक स्थल होने लगे तो आदिवासी कहेंगे पूरा जंगल हमारा है
एडवोकेट माधवी दीवान: राजस्थान के Orans (पवित्र वन) का उदाहरण दिया।
Oran क्या है? जहां गांवों में पवित्र जंगल/वन क्षेत्र हो। वहां मंदिर हो सकता है, लेकिन असल दिव्यता खुद जंगल है। प्रकृति ही देवता मानी जाती है। अहिंसा, जीवों की रक्षा और कुछ चीजों से परहेज परंपरा का हिस्सा है।
हर Oran अलग है। यह संगठित बड़े धार्मिक संस्थान नहीं हैं, लेकिन फिर भी यह धार्मिक परंपरा और संप्रदाय या संस्था हो सकते हैं।
जस्टिस अमानुल्लाह: अगर जंगल को ही धार्मिक स्थल मान लिया जाए। तो कल आदिवासी कह सकते हैं पूरा जंगल हमारा है।
दीवान का जवाब: यह मनमाना दावा नहीं, कई जगह अदालतें पहले भी ऐसे धार्मिक स्थलों को मान चुकी हैं, जैसे उत्तराखंड के वॉटर टेंपल्स। अंतरात्मा की धार्मिक स्वतंत्रता बहुत निजी चीज है, लेकिन इसे जीने के लिए संस्थागत मदद चाहिए।
दीवान: हम गांव के लोग हैं, बड़े संगठित संस्थान नहीं हैं। इसलिए संप्रदाय साबित करने के लिए हमारा पूरा सामाजिक-धार्मिक ढांचा ही एक संस्था है।
जस्टिस सुंदरश: संप्रदाय यानी विश्वासियों का सामूहिक अधिकार। वह सामान्य भक्तों के खिलाफ कैसे जा सकता है? मतलब संस्था भक्तों से ऊपर नहीं हो सकती।
दीवान: आज अधिकारों से ज्यादा उनकी सीमाओं पर जोर दिया जा रहा है। और ऐसा करने से लोग संस्थागत स्टेटस पाने की दौड़ में पड़ेंगे। ध्रुवीकरण बढ़ेगा, भाईचारा टूट सकता है।
जस्टिस नागरत्ना: अगर ध्रुवीकरण होगा राज्य आर्टिकल 25(2)(b) के तहत दखल देगा।
8 मिनट पहले
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एडवोकेट पोटराजू बोले- धर्म को उसे मानने वालों की नजर से समझना चाहिए
एडवोकेट पोटराजू: जब अदालत मेरे धार्मिक विश्वास को देख रही है, तो किसी गैर-विश्वासी के नजरिये से उसे नहीं परखा जाना चाहिए। मतलब कि धर्म को बाहर वाले की नजर से नहीं, मानने वालों की नजर से समझना चाहिए।
17 मिनट पहले
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एडवोकेट पोटराजू बोले- धार्मिक संप्रदाय की अपनी अलग स्वतंत्र पहचान होती है
एडवोकेट श्रीधर पोटराजू: लोगों के साथ जुड़ने का प्राकृतिक अधिकार है। वैसे ही आध्यात्मिक रूप से लोग उन लोगों के साथ रहना चुनते हैं जिनसे उनका विश्वास मेल खाता हो।
इसलिए धार्मिक संप्रदाय की अपनी अलग स्वतंत्र पहचान होती है। अदालत को संविधान की व्याख्या करते समय अपनी सीमाएं याद रखनी चाहिए। हर धार्मिक समूह की स्वायत्ता का सम्मान होना चाहिए।
22 मिनट पहले
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जस्टिस अमनुल्लाह बोले- हर संस्था के कुछ नियम-कायदे जरूर होने चाहिए

जस्टिस अहसानुद्दीन अमनुल्लाह: मैनेजमेंट का एक तरीका होता है। अराजकता नहीं हो सकती। किसी दरगाह या मंदिर का ही उदाहरण ले लीजिए। वहां संस्था से जुड़े कुछ तत्व होंगे, पूजा-पाठ का एक तरीका होगा और चीजों के किए जाने का एक क्रम होगा।
तो सवाल यह है कि वह कौन सी संस्था है जो यह प्रबंधन करती है? यहीं पर सुरक्षा का पहलू सामने आता है, क्योंकि रेगुलेशन जरूरी है। साथ ही, यह संवैधानिक सीमाओं का उल्लंघन नहीं कर सकता।
हर संस्था के अपने कुछ नियम-कायदे जरूर होने चाहिए। वे नियम-कायदे हर व्यक्ति द्वारा अपनी मर्जी से तय नहीं किए जा सकते। कोई न कोई मान्यता प्राप्त संस्था जरूर होनी चाहिए जो उन नियमों को निर्धारित करे, और इसी संस्था को सुरक्षा प्रदान की जाती है।
29 मिनट पहले
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एडवोकेट पाशा बोले- हिजाब धर्म में जरूरी लेकिन स्कूल में नहीं पहन सकते
पाशा : कोई व्यक्ति हिजाब को धार्मिक रूप से अनिवार्य मान सकता है। लेकिन स्कूल अनुशासन के नियम अलग हो सकते हैं। मतलब धार्मिक विश्वास हमेशा संस्थागत नियमों से ऊपर नहीं होगा।
47 मिनट पहले
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पाशा बोले: ‘Open to all’ का मतलब ‘कुछ भी करने की छूट नहीं
पाशा: आर्टिकल 25 व्यक्ति के धार्मिक अधिकारों की रक्षा करता है। जैसे पूजा करना, धार्मिक प्रथाएं मानना। जबकि आर्टिकल 26 धार्मिक समूह/संस्था के अधिकार बचाता है। जैसे अपने धार्मिक मामलों और पूजा स्थल का प्रबंधन करना। दोनों में थोड़ा ओवरलैप है। कुछ जगह दोनों टकरा सकते हैं, लेकिन दोनों एक जैसे नहीं हैं।
पाशा: आर्टिकल 26 को आर्टिकल 25 से ऊपर क्यों रखा गया? यह जानबूझकर किया गया है।
मैं एक कंपनी का उदाहरण देता हूं जहां व्यक्ति के अपने अधिकार होते हैं। लेकिन कंपनी में जाकर सब कुछ अपनी मर्जी से नहीं कर सकते। मैनेजमेंट के नियम होते हैं। वैसे ही धार्मिक संस्थाओं में भी।
पाशा: हर जगह ‘प्रवेश’ का मामला Article 25 के तहत नहीं आता। बाकी मामलों में धार्मिक संस्था तय करेगी कौन कैसे प्रवेश करेगा।
पाशा: हर धार्मिक स्थल का कोई न कोई अधिकारधारी होता है। वही तय करेगा वहां के नियम।
जस्टिस अमानुल्लाह: पूजा, प्रवेश, प्रबंधन। इन सबको संभालने वाला कोई निकाय होगा और उसके अधिकार सुरक्षित होने चाहिए।
पाशा: हां बिल्कुल, अगर किसी मोहल्ले की मस्जिद सबके लिए खुली हो तो भी कोई जाकर घंटी नहीं बजा सकता। आरती नहीं कर सकता, क्योंकि उस जगह की अपनी धार्मिक मर्यादा है।
मतलब ‘Open to all’ का मतलब ‘कुछ भी करने की छूट नहीं।
पाशा : “संवैधानिक नैतिकता” अदालत अपनी तरफ से नहीं तय करे। संसद इस पर कानून बनाकर तय करे।
उदाहरण: इस्लाम में शराब गलत मानी जाती है। लेकिन चर्च में वाइन धार्मिक प्रतीक हो सकती है। इसलिए नैतिकता सब पर एक जैसी लागू नहीं हो सकती।
पाशा : कुरान बहुत संक्षिप्त है। उसमें हर प्रथा डिटेल में नहीं लिखी। पैगंबर की परंपरा भी धार्मिक प्रथा का हिस्सा है। मतलब सिर्फ किताब में लिखा होना ही “जरूरी अधिकार” तय नहीं करता।
05:42 AM28 अप्रैल 2026
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नजाम पाशा बोले- शियाओं के मातम को राज्य रेगुलेट कर सकता है, पूरी तरह खत्म नहीं
एडवोकेट नजाम पाशा: निजामुद्दीन दरगाह मामले में उन्होंने कहा कि हर धार्मिक स्थल सबके लिए ‘ओपन पब्लिक प्लेस’ नहीं माना जा सकता। कोई व्यक्ति सिर्फ इसलिए अंदर आने का अधिकार नहीं मांग सकता क्योंकि वह ‘समानता’ (जैसे सबरीमाला केस) का हवाला दे रहा है।
सरकार की तरफ से कहा गया था कि दरगाह कोई अलग धार्मिक संप्रदाय नहीं है क्योंकि वहां हर धर्म के लोग जाते हैं।
पाशा ने इसका विरोध करते हुए कहा: सिर्फ दूसरे लोगों के आने से किसी समुदाय का धार्मिक अधिकार खत्म नहीं होता। सूफी परंपरा, दरगाह और उससे जुड़े मानने वालों की अपनी धार्मिक पहचान और प्रथाएं हैं, इसलिए इसे आर्टिकल 26 के तहत संरक्षण मिलना चाहिए।
पाशा: पूजा-स्थल सिर्फ इमारत नहीं, यह एक विश्वास है। जो उस विश्वास को नहीं मानता, उसे वहां प्रवेश का संवैधानिक अधिकार नहीं मिल सकता।
आर्टिकल 25(2)(a) धर्म को सीमित करता है, बताता है कि धर्म के नाम पर सब कुछ सुरक्षित नहीं है। आर्टिकल 25(2)(b) सामाजिक सुधार की बात करता है, लेकिन यह भी सरकारी आदेश की सीमा में ही रहेगा।
मतलब सामाजिक सुधार के नाम पर हर धार्मिक प्रथा में दखल नहीं हो सकता।
पाशा : पहले कोर्ट कहती थी कि जो ‘आवश्यक धार्मिक प्रथा’ है, उसे खास सुरक्षा है। बाद के फैसलों में यह टेस्ट बदल गया।
उदाहरण: शियाओं का मातम स्वास्थ्य के खिलाफ लग सकता है, लेकिन राज्य इसे रेगुलेट कर सकता है, पूरी तरह खत्म नहीं।
जस्टिस अमानुल्लाह: क्या आप कह रहे हैं कि दरगाहें खुद एक सूफी मजहब हैं?
पाशा : इस पर मैं मजहब या संप्रदाय वाली दलील में विस्तार से जवाब दूंगा।
05:27 AM28 अप्रैल 2026
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केरलम के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं का एंट्री विवाद

